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प्रकाश की नये गुण का पता चला वह खुद दिशा बदल सकती है




  • भौतिकीशास्त्र के शोध में नई जानकारी मिली

  • कई देशों के संस्थानों के संयुक्त शोध का नतीजा

  • किसी स्थिर केंद्र के चारों तरफ गतिमान हो सकती है यह

  • अंतरिक्ष अभियान में छोटे से छोटे वस्तु का पता लगा सकता है


प्रतिनिधि

नईदिल्लीः प्रकाश जीवन का प्रमुख अंग है। इसके बारे में लगातार शोध होता आ रहा है।

इसी शोध के तहत अब पहली बार वैज्ञानिकों ने इस बात का पता लगाया है कि

प्राकृतिक तौर पर भी प्रकाश आवश्यकता और परिस्थिति के अनुसार खुद को ढालकर अपनी दिशा भी बदल सकता है।

इस शोध को प्रमाणित करने के लिए वैज्ञानिकों ने सौर मंडल के आंकड़ों के आधार पर कई शोध भी किये हैं।

इन्हीं शोधों में प्रकाश के नये गुण की पुष्टि भी हुई है।

स्पेन और अमेरिका के कई संस्थानों ने मिलकर इस शोध के निष्कर्षों की घोषणा की है।

इसे भी पढ़ें प्रकाश की गति से चल पाना क्या वाकई संभव होगा

वैज्ञानिक परिभाषा में प्रकाश के इस नये गुण को सेल्फ टार्क बताया गया है।

यानी वह खुद को किसी खास केंद्र के चारों तरफ घूमा भी सकता है।

इस शोध से जुड़े शोधकर्ताओं ने इसके बारे में विस्तार से जानकारी दी है।

शोध के सफल होने के बाद वैज्ञानिकों ने इसके प्रयोग के लाभों की भी गहन व्याख्या कर दी है।

इसके पहले तक प्रकाश के बारे में यही वैज्ञानिक राय थी कि यह एक तरंग है।

जो आम तौर पर सीधी दिशा में ही चलती है।

लेकिन इस शोध से पता चला है कि कोणीय गति के तहत इसी प्रकाश को मोड़ा भी जा सकता है।

किसी खास कोण पर प्रकाश मुड़ भी सकता है, इसकी कल्पना पहले नहीं की गयी थी।

वैज्ञानिकों ने इस स्थिति को आर्बिटल एंगूलर मोमेंटम की संज्ञा दी है।

यह खास तौर पर ऊंची आधार के प्रकाश पुंजों पर आजमाया जा चुका है।

इस प्रयोग के तहत किसी एक खास केंद्र के चारों तरफ प्रकाश को फैलाने में वैज्ञानिकों ने सफलता पायी है।

इससे साबित हो गया है कि प्राकृतिक तौर पर भी प्रकाश अपनी सीधी रेखा के चलन को त्यागकर मुड़ भी सकता है।

प्रकाश के बारे में पहले पता था कि यह सीधी रेखा में बढ़ती है

अनुसंधान के दौरान वैज्ञानिकों ने किसी सपाट धरातल पर इसका जब प्रयोग किया

तो जो आकार बना, वह किसी गोलाकार स्वरुप में था।

इसी गोलाकार स्वरुप का पता चलने के बाद उसके मुड़ने की परिस्थितियों की जांच प्रारंभ की गयी थी।

क्योंकि पहले ऐसा संभव है, इस बारे में सोचा तक नहीं गया था।

इसी शोध को आगे बढ़ाते हुए वैज्ञानिकों ने दो लेजर बीमों का भी इस्तेमाल किया।

इसमें यह ध्यान रखा गया था कि आर्गेन गैस के ऊपर प्रकाश की किरणें इस तरीके से छोड़ी जाए कि वे एक दूसरे को केंद्र के पहले ही काटें।

पहले के वैज्ञानिक सिद्धांत के मुताबिक इस परिस्थिति में एक दूसरे को काटने के बाद

दोनों ही प्रकाश किरणों को अपनी अपनी सीधी रेखा में आगे बढ़ जाना चाहिए थे।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ और प्रकाश की यह दोनों ही किरणें एक दूसरे से जुड़कर

इस गैसीय धरातल के दूसरी तरफ एक साथ चली गयीं।

इससे साबित हुआ कि प्राकृतिक तौर पर भी प्रकाश की किरणें किसी एक केंद्र बिंदू के चारों तरफ मुड़ सकती हैं।

प्रकाश किरणें आपस में जुड़कर एक साथ ही अलग दिशा में आगे बढ़ी




प्रकाश की इन्हीं किरणों को जब ध्यान से देखा गया तो वैज्ञानिकों ने यह पाया कि वे आपस में मुड़ते हुए आगे की तरफ एकसाथ आगे बढ़ीं।

गहन शोध में पाया गया कि प्रकाश किरणों का पहला फोटोन एक खास केंद्र के चारों तरफ मुड़ता चला गया।

उसके बाद के फोटोन भी इसी नये रास्ते की तरफ बढ़ते चले गये।

इससे पहले इसकी कभी कल्पना भी नहीं की गयी थी। अब इसी निष्कर्ष के आधार पर यह भी माना जा रहा है कि अंतरिक्ष की किरणों में भी यही गुण विद्यमान होता है।

जिसकी वजह से वह कई बार सामने आने वाले ग्रहों, तारों अथवा उल्कापिडों को केंद्र मानकर उससे तिरछी होकर आगे निकलने में सक्षम होती हैं।

इस प्रयोग के सफल होने के बाद वैज्ञानिकों ने यह सुझाव दिया है कि इस तकनीक का इस्तेमाल अब सौर अनुसंधान के क्षेत्र में बेहतर तरीके से किया जा सकता है।

यानी जिस तरीके से ध्वनि तरंगों में बदलाव कर उनकी दिशा बदली जाती है,

ठीक उसी तरीके से प्रकाश की इन किरणों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

इसकी मदद से खास तौर पर अंतरिक्ष में छोटे से छोटे वस्तु का भी बेहतर तरीके से पता लगाया जा सकता है।


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Rashtriya Khabar


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