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कोरोना से जान बचाने वाली दवा का पता चला

  • सस्ती और सहज उपलब्ध दवा है डेक्सामेथासोन

  • ब्रिटेन में परीक्षण के बाद दी गयी जानकारी

  • गंभीर रोगियों पर अधिक प्रभावकारी है दवा

  • गठिया और सूजन के लिए बनाया गया था

प्रतिनिधि

लंदनः कोरोना से जान बचाने वाली दवा सामने आयी है। विशेषज्ञों ने इसे जांच परख लेने

के बाद ही इसके बारे में यह जानकारी सार्वजनिक की है। यह स्पष्ट कर दिया गया है कि

यह कोरोना की दवा नहीं है लेकिन इसके इस्तेमाल से गंभीर रुप से बीमार लोगों की मौत

को टाला जा सकता है। परीक्षण में इसकी पुष्टि हो चुकी है। ब्रिटेन के विशेषज्ञों का कहना

है कि कम मात्रा में इस दवा का उपयोग कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई में एक बड़ी कामयाबी

की तरह सामने आया है। जिन मरीज़ों को गंभीर रूप से बीमार पड़ने की वजह से वेंटिलेटर

का सहारा लेना पड़ रहा है, उनके मरने का जोखिम क़रीब एक तिहाई इस दवा की वजह से

कम हो जाता है। जिन्हें ऑक्सीजन की ज़रूरत पड़ रही है, उनमें पांचवें हिस्से के बराबर

मरने का जोखिम कम हो जाता है। इस तरह यह कोरोना से जान बचाने वाली एक दवा

बनी है।  डेक्सामेथासोन 1960 के दशक से गठिया और अस्थमा के इलाज में इस्तेमाल

होने वाली दवा है। कोरोना के जिन मरीज़ों को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ रही है, उनमें से

आधे नहीं बच पा रहे हैं इसलिए इस जोखिम को एक तिहाई तक कम कर देना वाकई में

काफ़ी बड़ी कामयाबी है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि अगर इस दवा का इस्तेमाल

ब्रिटेन में संक्रमण के शुरुआती दौर से ही किया जाता तो फिर क़रीब पाँच हज़ार लोगों की

कोरोना से जान बचाई जा सकती थी। चूंकि यह दवा सस्ती भी है, इसलिए ग़रीब देशों के

लिए भी काफ़ी फ़ायदेमंद साबित हो सकती है।

कोरोना से जान बचाने में यह सस्ती दवा भी है

दुनिया को इस संकट से उबारने में जुटे तमाम वैज्ञानिक मानते हैं कि अन्य महंगी दवाओं 

के मुकाबले यह सस्ती दवा खास तौर पर गरीब देशों के लिए रामवाण साबित हो सकती

है। ब्रिटेन में गंभीर रुप से बीमार रोगियों पर इसे आजमाया गया था। उसके सफल

परिणाम निकले हैं। वैश्विक महामारी के इस दौरान में यह दवा एक वरदान के तौर पर

सामने आयी है। गठिया और सूजन कम करने के काम आने वाली इस दवा के प्रयोग से

कोरोना पीड़ित रोगियों को भी तेजी से फायदा हुआ है। इस दवा से मृत्युदर भी कम हुई है।

शोध से जुड़े वैज्ञानिक मानते हैं कि इस दवा के इस्तेमाल से मौत की दरों में करीब 66

प्रतिशत की कमी आयी है। इस दवा को गंभीर रुप से बीमार रोगियों पर ही आजमाया गया

था और वैसे मरीज, जो सांस लेने की दिक्कत की वजह से परेशान थे, उनमें यह दवा और

भी कारगर साबित हुई है। इस श्रेणी के रोगियों में भी मृत्युदर में बीस प्रतिशत की कमी

देखी गयी है। शोध और ट्रायल के बाद इससे जुड़े वैज्ञानिकों की राय है कि सिर्फ गंभीर

किस्म के कोरोना रोगियों पर ही इन्हें आजमाया जाना चाहिए।

शोध निष्कर्षों को निष्पक्ष जांच के लिए भेजा गया है

शोध के इस निष्कर्ष की अभी निष्पक्ष जांच हो रही है। दुनिया के अन्य वैज्ञानिक भी इसमें

उल्लेखित आंकड़ों की जांच कर रहे हैं ताकि विश्व भर में इस निष्कर्ष पर कोई एक राय

कायम हो सके। वैसे ब्रिटेन में इस दवा के सफलता को सोशल मीडिया में चर्चित देखा जा

रहा है। इंग्लैंड के मुख्य चिकित्सा अधिकारी क्रिस व्हीटी ने कहा कि इसे अब तक का

सबसे सफल और महत्वपूर्ण ट्रायल माना जा सकता है।

पहली बार विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी अपने तेवर बदलते हुए इस निष्कर्ष पर जांच को

आगे बढ़ाने की बात कही है। वरना इससे पहले हर ऐसे बाहरी सर्वेक्षण को यह संगठन

खारिज कर दिया करता था। लगातार आलोचनाओं में घिर रहे डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि

वह भी इस दवा यानी डेक्सामेथासोन के ट्रायल के आंकड़ों की जांच कर रहा है और वह

अपने स्तर पर भी आंकड़ों की पुष्टि होने के बाद जांच को और आगे बढाना चाहेगा।

संगठन ने पहले ही साफ कर दिया है कि अगर आंकड़ों के सही प्रमाणित होने की पुष्टि हो

जाती है तो कोरोना के किन रोगियों को और किस तरीके से यह दवा दिया जाना है, उसके

बारे में भी संगठन अपनी तरफ से पूरी दुनिया को संदेश प्रसारित करेगी।

इस बीच रिकवरी ट्रायल के अनेक दौर एक साथ आगे बढ़ रहे हैं। ब्रिटेन में होने वाले इस

ट्रायल के लिए अब तक ग्यारह हजार लोगों ने अपने नाम दर्ज कराये हैं। यह सभी कोविड

19 की ईलाज के क्लीनिकल ट्रायल का हिस्सा बनने को तैयार हैं।


 

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