fbpx Press "Enter" to skip to content

संसार है इन नदिया सुख दुख दो किनारे हैं

संसार है इक नदिया यानी संसार भी एक नदी जैसी है, जिसके एक किनारे पर सुख है तो

दूसरे किनारे पर दुख है। हम सभी इसी नदी में बहते हुए कालचक्र में चले जा रहे हैं। यह

स्थिति कमोबेशी दुनिया के हर इंसान के लिए अभी एक जैसी ही है। दुनिया का कोई भी

व्यक्ति हो, उसने सोचा नहीं होगा कि अचानक से सारी परिस्थितियां इतनी बदल जाएंगी।

कोरोना के वैश्विक दुष्काल ने सभी के जीवन को उलट पलटकर रख दिया है। एक ऐसा

अदृश्य शत्रु, जिसे अब तक खोजने का ही काम चल रहा है। अंतर बस इतना है कि अब हमें

अच्छी तरह पता है कि हमारी जिंदगी की गाड़ी में कभी भी यह अदृश्य शत्रु हमला कर

सकता है। लेकिन वह हमला कब और कहां होगा या फिर कितना अधिक मारक होगा, इस

बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। जानकारों ने अदृश्य शत्रु से बचने के तरकीब तो बताये हैं

लेकिन हम भी अपनी आदतों से बाज नहीं आते। वैसे यह सीखने लायक बात है कि जिन

देशों ने बहुत कम समय में इस महामारी को अपने यहां नियंत्रित कर लिया, वहां के लोगों

का लाईफ स्टाईल हम इंडियन लोगों से बेहतर है। मैं लाईफ स्टाईल का मतलब बेहतर

स्वास्थ्य अथवा खान पान को नहीं बता रहा हैं। अगर गलती से भी कोई किसी के करीब

चला जाए तो सामने वाला खुद पीछे हटकर दूरी बना लेता है। नतीजा है कि अनेक देशों

अब कोरोना का प्रकोप न्यूनतम से शून्य तक जा पहुंचा हैं। इधर अपने इंडिया में हर दिन

80 हजार से अधिक रोगी पाये जा रहे हैं। इसी अनुपात में मौत की तादाद भी बढ़ रही है।

कइसा रोग है कि ईलाज कम और कंफ्यूजन बहुत जियादा है

लेकिन इसमें कंफ्यूजन की बहुत गुंजाइश भी है। निजी लैब में कोरोना पॉजिटिव और

सरकारी लैब में नेगेटिव। अब इन दो परस्पर विरोधी रिपोर्टों में से किस पर भरोसा करें।

कोई तो एक गलत है लेकिन किसे गलत ठहरायें। जिन्हें सही गलत की पहचान करनी

चाहिए, वे भी सीना ठोंककर किसी एक रिपोर्ट पर मुहर लगाने के बदले फिर से जांच कराने

की बात कहकर पतली गली से निकल रहे हैं। इसी वजह से फिर से एक गीत याद आने

लगी है। यह पुरानी फिल्म का ही गीत है। इस फिल्म का नाम था रफ्तार। इस गीत को

लिखा था अभिलाष ने और उसे संगीत में ढाला था सोनिक ओमी ने। इस गीत को स्वर

दिया था आशा भोंसले और मुकेश कुमार ने। गीत के बोल इस तरह हैं।

संसार है इक नदिया, दुःख-सुख दो किनारे हैं
न जाने कहाँ जाएं, हम बहते धारे हैं

चलते हुए जीवन की, रफ़्तार में इक लय है
इक राग में इक सुर में, सँसार की हर शय है
सँसार की हर शय है …

इक तार पे गर्दिश में, ये चाँद सितारे हैं
धरती पे अम्बर की आँखों से बरसती है
इक रोज़ यही बूँदें, फिर बादल बनती हैं
इक रोज़ यही बूँदें, फिर बादल बनती हैं

इस बनने बिगड़ने के दस्तूर में सारे हैं
कोई भी किसी के लिए, अपना न पराया है
रिश्ते के उजाले में, हर आदमी साया है
रिश्ते के उजाले में, हर आदमी साया है

कुदरत के भी देखो तो, ये खेल पुराने हैं
है कौन वो दुनिया में, न पाप किया जिसने
बिन उलझे काँतों से, हैं फूल चुने किसने
हैं फूल चुने किसने …
बे-दाग नहीं कोई, यहाँ पापी सारे हैं

संसार है इक नदिया, दुःख-सुख दो किनारे हैं

न जाने कहाँ जाएं, हम बहते धारे हैं

सिचुयेशन देखकर तो यही लगता है कि फिलहाल सारे लोग एक ही किनारे से लगकर बहे

जा रहे हैं। जिन्हें अच्छी तरह तैरना नहीं आता, वे डूब भी रहे हैं। लेकिन जिंदगी की गाड़ी

तो इसी नदी के माफिक लगातार आगे बढ़ रही है।

यानी कुल मिलाकर मास्क भी अब ड्रेस के माफिक शरीर का एक हिस्सा हो गया है। पहले

पहले इसे पहनने में न सिर्फ दिक्कत होती थी बल्कि कई बार उसे साथ ले जाना भी भूल

जाते थे। अब तो घर से निकलते वक्त सबसे पहले मास्क नाक और मुंह पर लगाना भी

दिनचर्या का एक हिस्सा बन गया है। जिनलोगों को बहादुर बनने का शौक था, अब पुलिस

के डंडे और फाइन से वे भी पटरी पर आने लगे हैं। अरे भाई पहले ही इसे आजमा लिया

होता तो आज इतनी बुरी हालत तो हम सभी की नहीं होती। लेकिन उस वक्त तो हीरोगिरी

की पड़ी थी। सोचते थे कि मेरा कोरोना क्या बिगाड़ लेगा। अब अपने अगल बगल की

हालत देखकर भी अनुशासित नहीं हो पा रहे हो तो ऊपर वाला तो तुम्हे इस संसार में

आकर सीखाने नहीं आने वाला। पुरानी कहावत थी कि ऊपर वाले की लाठी में आवाज नहीं

होती मगर चोट बहुत लगती है। इतने दिनों के बाद यह बात अच्छी तरह समझ में आयी है

कि वाकई ऊपर वाले की लाठी में आवाज नहीं होती है।


 

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
More from HomeMore posts in Home »
More from ताजा समाचारMore posts in ताजा समाचार »
More from देशMore posts in देश »
More from लाइफ स्टाइलMore posts in लाइफ स्टाइल »
More from स्वास्थ्यMore posts in स्वास्थ्य »

Be First to Comment

Leave a Reply