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ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय ये कभी यह हंसाये कभी यह रुलाये

ज़िंदगी वाकई एक पहेली बनकर रह गयी है। फिलहाल हम कहां जा रहे हैं, कैसे जा रहे हैं,

चलते हुए कहां पहुंचेंगे, इसका कोई अता पता नहीं है। फिर भी यह इंसानी जज्बा है कि वह

चल रहा है। जी हां मैं इस कोरोना काल की बात कर रहा हैं। साफ है कि चुनावी लाभ के

लिए इसे जबरन हमारे ऊपर लाद दिया गया लेकिन इसके लिए हम खुद भी कम

जिम्मेदार नहीं हैं। छूट मिली तो कोरोना से बचाव के सारे नियम कानून तोड़कर खुद को

सबसे बेहतर साबित करने निकल पड़े थे। नतीजा हमारे सामने कोरोना की दूसरी लहर के

तौर पर है। कुछ दिन पहले तक को हर रोज चार लाख रोगी पाये जा रहे थे और चार हजार

से अधिक मौते हो रही थी। जाहिर है कि इन मौतों में गंगा, यमुना और अन्य नदियों में

बहायी जाने वाले वे लाशें नहीं है, जिन्हें किनारे से उठाकर उनका अंतिम संस्कार किया जा

रहा है। यह भी ज़िंदगी की अजीब पहेली बनकर रह गयी है। अगर कोरोना से नहीं मरा तो

कैसे मरा, और अगर कोरोना से मरा तो गंगा में लाश किसने बहा दी। लेकिन यह सवाल

फिलहाल कुछ वैसा ही है कि पहले मुर्गी या अंडा। इसे सुलझाने से तो बेहतर है कि गाड़ी

आगे बढ़ायी जाए। जिस वजह से कोरोना पर केंद्र सरकार ने ध्यान नहीं दिया था, उस

चुनाव का अब तियां पांचा हो चुका है। साबित हो गया है कि सत्ता, शक्ति और साधन ही

भारतीय लोकतंत्र के निर्णायक हथियार नहीं हैं। वरना भाजपा के इतने दिग्गजों और उतने

संसाधनो के इस्तेमाल के बाद भी अकेली महिला ने सबको धूल चटा दिया।

ज़िंदगी का रंग तो खुद भाजपा ने भी चुनाव में देख लिया

हालत यह है कि बंगाल में हिंसा हो रही है, इसकी शिकायत हर भाजपा नेता करता दिख

रहा है लेकिन इतना कुछ करने के बाद भी इतनी बुरी तरह हार क्यों गये,इस पर दलील

बड़ी हास्यास्पद है। सभी कहते हैं कि तीन से 77 पर आ गये। अरे भाई आपके नेताओं ने

तो दो सौ के पार का दावा किया था। सबसे ज्यादा दावा करने वाले नेता यानी अपना मोटा

भाई इन दिनों साइलेंट मोड में हैं। उनके चुनावी चाणक्य की उपाधि की तो प्रशांत किशोर

ने धज्जी उड़ा दी। अदना सा चुनावी मैनेजर दिसबंर महीने से बोल रहा था कि सौ सीटें हीं

आयेगी। भाजपा के मीडिया वाले इसे हर तरीके से तोड़ मरोड़कर कुछ और ही कहलवाना

चाहते थे। लेकिन अब पछताए का होत है जब चिड़िया चुग गयी खेत।

इसी बात पर एक और हिट फिल्म का सुपरहिट गीत याद आने लगा है। फिल्म आनंद के

लिए इस गीत को लिखा था योगेश ने और संगीत में ढाला था सलील चौधरी ने। इस गीत

को मन्ना डे ने अपनी स्वर में लाजबाव तरीके से गाया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

ज़िंदगी …, कैसी है पहेली, हाए
कभी तो हंसाये, कभी ये रुलाये
ज़िंदगी …

कभी देखो मन नहीं जागे , पीछे पीछे सपनों के भागे
एक दिन सपनों का राही , चला जाए सपनों के आगे कहाँ
ज़िंदगी …

जिन्होने सजाए यहाँ मेले, सुख-दुख संग-संग झेले
वही चुनकर ख़ामोशी, यूँ चली जाए अकेले कहाँ
ज़िंदगी …

हमारी यानी आम भारतीय की ज़िंदगी दरअसल क्या है, उसे समझने के लिए गंगा में

बहती लाशों को देख लीजिए। सरकार की नजर में हमारी और आपकी यही अहमियत है।

नेता के लिए अच्छे अस्पताल, बेहतर ईलाज, दवा सब कुछ मौजूद है।

नेताओं के लिए सारी सुविधाएं और आम आदमी का गंगा नदी

अगर उसके बाद भी टपक गये तो अंतिम संस्कार भी एक नंबर। और गांव देहात का

भारतीय आज चालीस मन लकड़ी खरीदने की हैसियत नहीं रखता तो मजबूरी में लाश को

गंगाजी में बहा दे रहा है। गंगा में बहती लाशों का अब कोई धर्म नहीं है। सारी लाशें ही लाशें

है। इसलिए ज़िंदगी का यह सबक भी हमारे और आपके लिए काम की चीज है। सरकार की

नजर में अपनी असली औकात समझ लीजिए। वैसे पश्चिम बंगाल की हार से सबक लेकर

अब मोदी जी का ध्यान शायद किसानों की तरफ गया है। इसी लिए किसानों के खातों में

पैसे भेजे गये हैं। अच्छा किया है। अब समझदार दिखाकर बात चीत से आंदोलन भी खत्म

करा लो। सरकार के मुखिया का इतना जिद देश के किस काम आ रहा है। आंदोलन के

दौरान और बाद में जितनी जानें गयी, उसकी भी राजनीतिक कीमत है, इसे मोटा भाई

अगर नहीं समझ पा रहा हो तो अपने योगी जी समझ चुके होंगे। इसी वजह से आजकल

फायर ब्रांड नेता कहलाने वाले योगी जी भी सोच समझकर बोल रहे हैं। पंचायत चुनाव का

जो हश्र हुआ है अगर वही हाल विधानसभा में रहा तो आगे क्या कहने। कुल मिलाकर

ज़िंदगी यह भी दिखा रही है कि पहले “मोदी जी के बदले कौन” का जो प्रश्न अनुत्तरित रह

जाता था, अब उसके एक नहीं कई उत्तर इस विधानसभा चुनाव के संपन्न होने  और

कोरोना संकट में नजर आने लगे हैं।

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