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आंकड़ों की बाजीगरी का समय नहीं रहा अब

आंकड़ों की बाजीगरी की शिकायतें देश में आम रही है। अनेक अवसरों पर केंद्र सरकार इन

आंकड़ों की बाजीगरी से देश की जनता से जो स्याह हिस्सा छिपाना चाहती है, वह भी

सोशल मीडिया के विस्तार की वजह से बार बार असफल होता जाता है। कोरोना के

वैश्विक संकट की वजह से जो परिस्थितियां उपजी हैं, उनमें अब वास्तविकता के धरातल

पर काम करने की आवश्यकता है। हर कोई इस बात को महसूस कर सकता है कि देश

बेरोजगारी के बड़े संकट से गुजर रहा है । आज सरकार या अन्य कोई बेरोजगारी कम होने

का दावा करें तो बेमानी है। खरीफ की फसल के दौरान मिला रोजगार या मनारेगा से मिला

रोजगार स्थाई प्रकृति का नहीं है। इसके आधार पर जीवनयापन होना मुश्किल है। गैर-

सरकारी संगठन सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनामी (सीएमआईई) के इस दावे से

अनेक अर्थशास्त्री असहमत है कि भारत में बेरोजगारी की दर गिर रही है और वो महामारी

से पहले के स्तर पर आ चुकी है। थोड़ी देर के लिए यह मान भी लें, कि यह रिपोर्ट सही है तो

इसका मतलब है तालाबंदी में ढील दिए जाने के बाद जो आर्थिक गतिविधि फिर से शुरू हुई

है और उससे रोजगार का सृजन हुआ है। लेकिन, क्या वाकई ऐसा हुआ है? सीएमआईई ने

पिछले कुछ महीनों में कहा था कि जो बेरोजगारी दर मार्च में 8.75 प्रतिशत थी, वह अप्रैल

में बढ़ कर 23.5 और मई में 27.1 प्रतिशत तक चली गई थी, लेकिन जून में इसमें गिरावट

देखने को मिली।

आंकड़ों की बाजीगरी की वजह से उनकी विश्वसनीयता घटी है

संस्था के अनुसार जून में बेरोजगारी दर गिर कर पहले 17.5 पर पहुंची, फिर 11.6 पर और

फिर 8.5 प्रतिशत पर पहुंच गई। सीएमआईई के अनुसार यह गिरावट मुख्य रूप से

ग्रामीण बेरोजगारी के गिरने की वजह से आई है। उसके अनुसार शहरी बेरोजगारी में भी

गिरावट आई है, लेकिन यह अब भी 11.2 प्रतिशत पर है, जब कि तालाबंदी से पहले यह

औसत 9 प्रतिशत पर थी। इसके विपरीत, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार में बड़ा बदलाव आया

है।ग्रामीण बेरोजगारी दर तालाबंदी से पहले मार्च में 8.3 प्रतिशत थी, तालाबंदी के दौरान

यह औसत 20 प्रतिशत पर रही। सीएमआईई का कहना है कि वैसे तो तालाबंदी में ढील

दिए जाने से बेरोजगारी का दबाव सामान्य रूप से कम ही हुआ है, ऐसा लगता है कि

ग्रामीण क्षेत्रों में फायदा मनरेगा के तहत गतिविधियों के बढ़ने से और खरीफ की फसल

की बोआई में हुई वृद्धि की वजह से हुआ है। ये सब आंकड़ेबाजी की बात है मई में मनरेगा

के तहत 56.5 करोड़ श्रम दिन दर्ज किए गए और 3.3 करोड़ परिवारों को इस योजना का

लाभ मिला, यह सिर्फ तालाबंदी से पहले के मुकाबले ही नहीं, बल्कि एक साल पहले की भी

अवधि के मुकाबले भी बड़ी उछाल है। सीएमआईई का यह भी कहना है कि दक्षिण-

पश्चिमी मानसून समय से शुरू हुआ और मध्य और पश्चिम भारत में समय से पहले

पहुंचा।

देश में कृषि उपज से उम्मीद है तो ध्यान भी उसी पर रहे

पहले पखवाड़े में लंबी अवधि के औसत से 32 प्रतिशत ज्यादा बारिश हुई और इसकी वजह

से खरीफ की बोआई पिछले साल के मुकाबले 39.4 प्रतिशत ज्यादा हुई। कुछ अर्थशास्त्री

कहते हैं कि सीएमआईई का डाटा काफी विश्वसनीय रहा है, इसलिए कोई कारण नहीं है

कि इस डाटा पर विश्वास नहीं किया जाए. लेकिन वो यह भी कहते हैं कि समस्या यह है

कि रोजगार के आंकड़ों में उछाल के बावजूद खपत नहीं बढ़ी होगी और आर्थिक विकास से

सीधा जुड़ाव खपत का है। कुछ और विशेषज्ञ तो मनरेगा और मौसमी कृषि गतिविधि के

दम पर दर्ज की गई रोजगार में इस वृद्धि को असली वृद्धि मानते ही नहीं हैं। उनका मानना

है कि सबसे पहले तो सीएमआईई जिस आधार पर आंकड़ों का आकलन कर रहा है वो

पुराने हैं और अब प्रासंगिक नहीं हैं। कुछ और भी अर्थशास्त्री सीएमआईई के आंकड़ों को

सही नहीं मानते क्योंकि उनका कहना है कि वो जिन दूसरे तथ्यों को देख रहे हैं वो इन

आंकड़ों की जरा भी पुष्टि नहीं करते। शहरों से तो अभी भी गांवों की तरफ पलायन ही चल

रहा है, जो कि शहरों में नौकरियां ना होने का सबूत है। जहां तक गांवों की बात है कहीं तो

लोगों के अभी तक मनरेगा के जॉब-कार्ड ही नहीं बने हैं और जहां बने हैं वहां 5-7 दिनों में

एक दिन काम मिलने की खबर आ रही है। अब बात मौजूदा रोजगार और स्थाई

रोजगार की है । देश में सब को सरकारी नौकरी या शहर में नौकरी देना संभव नहीं है और

स्कूल कालेज से निकले युवाओं के हाथ में हुनर नहीं है । लिहाजा आंकड़ों की बाजीगरी के

बदले सरकार कृषि क्षेत्र में इसका समाधान खोजे, जहां अभी अधिकांश प्रवासी मजदूर

काम में लगे हुए हैं।


 

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