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चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों




चलो इक बार का गाना सिर्फ भाजपा और आजसू ही नहीं गा रहे हैं। सभी

दलों में यह गीत जोर शोर से सुनाई पड़ रहा है। इसलिए अब यह

सार्वजनिक सत्य के तौर पर स्वीकार किया जाना चाहिए कि नेताओं

की वफादारी की जब भी कोई बात हो तो तुरंत उनसे लिखित में एफिडेविट

ले लिया जाए। वरना क्या पता कब पलटी मार कर नैतिकता की दुहाई

देकर दूसरे दरवाजे पर चले जाए। इस बार के चुनाव में यह आंधी कुछ

ज्यादा ही तेज चलने लगी है।

महाराष्ट्र में क्या से क्या हो गया देख लीजिए

अब महाराष्ट्र को ही देख लीजिए। इतनी पुरानी दोस्ती टूट गयी सिर्फ

कुर्सी के झंझट में। मेरा तो चिल्ला चिल्लाकर गाने का मन कर रहा है

कि दोस्त, दोस्त ना रहा, प्यार, प्यार ना रहा। जिंदगी हमें तेरा एतवार

ना रहा। कहां भाजपा और शिवसेना की दोस्ती और कहां एनसीपी और

कांग्रेस का साथ। इतने दिनो की जुगलबंदी को भूलाने में भी समय लगेगा।

पता नहीं आंधी की रफ्तार और बढ़ी तो कौन कौन सा बड़ा पेड़ उखड़कर

जमीन पर आ गिरेगा। वैसे इतना तो तय हो ही गया है कि जब तूफान आया

है तो कुछ पेड़ तो गिरेंगे ही। देखें नहीं अभी बुलबुल तूफान आया था तो

सुंदरवन के जंगल के अधिकांश पेड़ उसकी चपेट में आकर धरती पर लेट

गये। खैर सुंदरबन का जंगल तो खुद नुकसान उठाकर पश्चिम बंगाल और

बांग्लादेश के लाखों लोगों को बचा ले गया लेकिन यहां झारखंड के

राजनीतिक जंगल में जो पेड़ गिर रहे हैं वह नुकसान ही पहुंचा रहे हैं।

बुलबुल को देखिये और सब कुछ समझिये

नुकसान सिर्फ जनता का नहीं बल्कि नीति और आदर्श की दुहाई देने

वाले दलों को भी समान रुप से घाटा हो रहा है। कल तक जिंदाबाद

जिंदाबाद का नारा लगाते थे और आज अचानक सुबह से ही मुर्दाबाद

की बांग दे रहे हैं, पता नहीं इतनी जल्दी पलटी कैसे मार जाते हैं।

रहने दे भाई नीति और आदर्श की बात। तू तो अपनी बात कर कि कितने

दिनों तक इस पार्टी में रहेगा और जब जायेगा तो कैसे कैसे कोसेगा।

इसी धक्कमपेल में इस पुराना गीत याद आ रहा है। इस फिल्म का नाम था

गुमराह। इस गीत को लिखा था साहिर लुधियानवी ने और उसे संगीत में

ढाला था रवि ने। इस गीत को अपने अनोखा अंदाज में गाया था महेंद्र कपूर

ने। वैसे महेंद्र कपूर आम तौर पर देश भक्ति गीतों के लिए ज्यादा याद

किये जाते हैं। लेकिन यह गीत उनकी यादगार गीतों में से एक है। इस बात

से कोई इंकार भी नहीं कर सकता। इस गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

चलो इक बार फिर से, अजनबी बन जाएं हम दोनो

चलो इक बार फिर से, न मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की

न तुम मेरी तरफ़ देखो गलत अंदाज़ नज़रों से, न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाये मेरी बातों से

न ज़ाहिर हो तुम्हारी कश्म-कश का राज़ नज़रों से

चलो इक बार फिर से

तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेशकदमी से

मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जलवे पराए हैं

मेरे हमराह भी रुसवाइयां हैं मेरे माझी की

मेरे हमराह भी रुसवाइयां हैं मेरे माझी की

तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साये हैं

चलो इक बार फिर से …

तार्रुफ़ रोग हो जाये तो उसको भूलना बेहतर

ताल्लुक बोझ बन जाये तो उसको तोड़ना अच्छा

वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन

वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन

उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा

चलो इक बार फिर से …

इसलिए अगर गीत का राजनीतिक विश्लेषण किया जाए तो यह आजसू

और भाजपा के रिश्तों पर सबसे सटीक तो बैठता है लेकिन खेमा बदल

करने वालों पर भी यह उतना ही परफेक्ट लगता है। इसलिए एफिडेविट

का पेपर जेब में हमेशा तैयार रहिये। किसी ने अबकी बार पार्टी की नीति

और आदर्श की बात की तो झट से एफिडेविट पर हस्ताक्षर (कुछ लोग तो

अब भी शायद अंगूठा छाप ही है) दर्ज करा लेना है। तय करा लेना है कि

भाई साहब अभी ही बता दीजिए के अगले चुनाव में आप इसी पार्टी में

नजर आयेंगे या कोई और टोपी पहनकर हमलोगों को फिर से टोपी

पहनाने चले आयेंगे।

सब नेता लोगों से अब एफिटेविट मांगना होगा

वइसे खुराफात करना है तो इसी इलेक्शन में इस दांव को आजमा सकते

हैं। सीरियसली नहीं लेना है सिर्फ आने वाले नेता से इस बात की गारंटी

लेनी है कि वह अगले चुनाव में भी इसी पार्टी में रहेंगे और टिकट मिले

चाहे नहीं पार्टी के लिए ही काम करेंगे। यह एक सवाल हो सकता है कि

कई विधानसभा क्षेत्रों में रामवाण जैसा असर दिखा जाए। इसकी छ्न्ना

में छाने गये नेता दोबारा से सोच समझकर ही पार्टी और आदर्श की बात

करेंगे। उन्हें हमेशा याद रहेगा कि लोगों ने इसी सवाल पर उनसे एफिडेविट

ले रखा है। दोबारा पल्टी मारे तो जनता सिर्फ उसी एफिडेविट का हवाला

देते हुए उन्हें भी पलट देगी।



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