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अंतिम पंद्रह मिनट ही भारतीय अंतरिक्ष यान के लिए निर्णायक साबित होंगे




  • चंद्रयान 2 के चांद पर उतरने की तैयारियां शुरु

  • धरती से सारा कुछ नियंत्रण करेंगे वैज्ञानिक

  • इसके चार पैरों पर टिका रहेगी लैंडिंग

  • हल्के से उतरेगा भारतीय यान


प्रतिनिधि

नयीदिल्लीः अंतिम पंद्रह मिनट की चिंता वैज्ञानिकों को परेशान किये जा रही है।

जैसे जैसे चंद्रयान 2 चंद्रमा के करीब पहुंच रहा है, यह चिंता बढ़ती जा रही है।

दरअसल यह चिंता चंद्रयान 2 के चांद पर सकुशल उतरने को लेकर ही है।

चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश करने के बाद यह भारतीय अंतरिक्ष यान धीरे धीरे घूमते हुए करीब पहुंच रहा है।


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उसके आगे बढ़ने के लिए वैज्ञानिकों ने यही रास्ता पहले से तय कर रखा था।

अब तक इसरो द्वारा तैयार इस यान ने सारे काम सही तरीके से पूरे कर लिये हैं।

इनमें पांच बार कक्षा बदलने जैसा कठिन काम भी शामिल हैं।

अब उसके चांद पर उस जगह उतरने की बारी है, जहां इससे पहले कोई यान नहीं उतारा गया है।

वैज्ञानिकों ने चंद्रमा पर इस यान को उतारने के लिए उसे विक्रम लैंडर से लैश कर भेजा है।

यह लैंडर अंतिम समय में उल्टी दिशा में गति प्रदान करते हुए यान को धीरे धीरे चांद की धरती पर उतारने का काम करेगा।

आगामी 20 अगस्त से चांद के चारों तरफ चक्कर काटते हुए यह धीरे धीरे चांद के करीब पहुंचेगा।

निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक इस दौरान उसकी गति भी कम होती जाएगी।

फिर आगामी 7 सितंबर को वह चांद पर आहिस्ते से उतरेगा।

अंतिम पंद्रह मिनट में ही अभियान पूरा होगा

इस अभियान के अंतिम चरण में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इस विक्रम को चार पैरों के डिजाइन पर तैयार किया गया है। यह आम तौर पर अंतरिक्ष रॉकेट की शक्ल का नहीं है।

कुल 1471 किलो वजन के इस लैंडर में एक रोवर भी है, जिसका अपना वजन 27 किलो है।

चांद पर उतरने के बाद यह रोवर अलग से कई अनुसंधान करेगा।

वैज्ञानिकों ने यह तय किया है कि चांद पर उतरने के अंतिम तीस किलोमीटर को इसी विक्रम की मदद से पूरा किया जाएगा।


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उस दौरान इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और काम बहुत जटिल होगा।

इस क्रम में यह यान हर पंद्रह मिनट में अपनी गति और ऊर्जा को बदलता रहेगा ताकि उतरने की गति आहिस्ता आहिस्ता इतना कम हो जाए कि यह यान चांद पर आहिस्ते से उतर सके।

इस काम को पूरा करने के लिए विक्रम के अंदर के रॉकेट उल्टी दिशा में गति तैयार कर यान की गति को नीचे आने के दौरान कम करते चले जाएंगे।

यही तकनीक अंतिम पंद्रह मिनट के लिए वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय है।

उस दौरान नियंत्रण कक्ष को भी अत्यंत जटिल संदेशों को आनन फानन में निर्देशित करना पड़ेगा

ताकि जरूरत के मुताबिक यह लैंडर अपने आप को सुधार सके और खड़ी अवस्था में चंद्रमा की सतह पर उतर जाए।

यान को चंद्रमा की तरफ भेजने के पहले वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में इस विधि का भी सफलता पूर्वक परीक्षण कर लिया है।

अंतिम समय में त्वरित संकेतों के आदान प्रदान के लिए यान के अंदर रेडियो सिग्नल डॉपलर लगाये गये हैं।

इसमें एक आणविक घड़ी भी है, जो इंडियन डीप स्पेस नेटवर्क के संदेशों को तुरंत पकड़ सकता है।

इस माध्यम से वैज्ञानिकों को वास्तविक समय में सारी स्थिति की जानकारी मिलती रहेगी।

विक्रम लैंडर पर लगे हैं नियंत्रण के अनेक उपकरण

वहां से मिले संकेतों के आधार पर ही नियंत्रण कक्ष से इस यान को नीचे उतरने का अंतिम संदेश भेजा जा सकता है।




वैज्ञानिक सिर्फ इस नीचे उतरने के दौरान यान की गति को लेकर चिंतित है

क्योंकि गति नियंत्रित नहीं होने की स्थिति में यह यान बहुत तेजी से नीचे गिरकर क्षतिग्रस्त हो सकता है।

इसी वजह से अंतिम पंद्रह मिनट को इस पूरे अभियान के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


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इस यान में कई ऐसे उपकऱण पहले से लगाये गये हैं, जो यान से चांद के सतह की दूरी का विश्लेषण कर आवश्यक गति सुधार भी कर सकते हैं।

यान के अंदर लगे कैमरे भी वास्तविक तौर पर इस स्थिति से वैज्ञानिकों को अवगत कराते रहेंगे।

ताकि जरूरत पड़ने पर यान को अतिरिक्त संकेत भेजकर उसकी गति और दिशा में आवश्यक सुधार भी किया जा सके।

इसके अलावा इस लैंडर के चारों पैर में भी खास किस्म के सेंसर लगाये गये हैं जो अपने स्तर पर भी यान की गति को रोक सकते हैं।

इन चारों यांत्रिक पैरों में शॉक ऑबजर्बर भी लगे हुए हैं तो सामान्य किस्म के झटकों को झेल सकते हैं।

इतना कुछ इंतजाम होने के बाद भी जैसे जैसे समय करीब आ रहा है इसरो के नियंत्रण कक्ष के वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ती ही जा रही है।


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