fbpx Press "Enter" to skip to content

लेजर किरणों ने चांद तक का सफर तय कर सही ढंग से वापसी की

  • चांद से टकराकर लौट आयी पृथ्वी से भेजी गयी खास तरंग

  • दूरी के लिहाज से बहुत अधिक दूरी तय करने में सफल

  • लूनार ऑर्बिटर के सहारे लेजर किरण को परावर्तित किया

  • अभी सिर्फ दसवां हिस्सा ही चांद से टकराकर लौट रहा है

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः लेजर किरणों पर खगोल विज्ञान के साथ साथ रक्षा विज्ञान में भी काफी काम

चल रहा है। रक्षा विज्ञान की बात करें तो खास तौर पर अब रक्षा वैज्ञानिक लेजर आधारित

वैसे हथियार बनाने की दिशा में लगातार प्रगति कर रहे हैं तो काफी दूर के किसी लक्ष्य पर

बिल्कुल सटीक निशाना साध सके। इसी दिशा में लेजर किरणों की गति और क्षमता का

आकलन पहली बार हो पाया है। वैज्ञानिकों ने पृथ्वी से खास लेजर किरणों को सीधे चांद

की तरफ भेजा था जो वहां रखे एक खास उपकरण से टकराने के बाद यथावत लौट आया

है। इससे साबित हो गया है कि खास किस्म के लेजर किरणें कमसे कम इतनी दूरी तो तय

कर ही सकती हैं। वैज्ञानिक अनुमान के मुताबिक पृथ्वी से चांद की दूरी 3,84,400

किलोमीटर आंकी गयी है।

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों ने अनुसंधान के बारे में जो विवरण सार्वजनिक किये हैं, उसके

मुताबिक फ्रांस के एक लूनार लेजर रेंजिंग स्टेशन से यह लेजर किरणें चांद की तरफ भेजी

गयी थी। यह लेजर किरणें सीधे चांद के अनुसंधान में जुटी एलआरओ( लुनार रिकोसिंनेस

ऑरबिटर) में लगे एक उपकरण पर केंद्रित थी। यह उपकरण कुछ इस तरीके से तैयार

किया गया था कि वह पृथ्वी से आने वाली लेजर किरण को आगे चांद की तरफ परावर्तित

कर दे। प्रयोग में कुछ ऐसा ही हुआ और चांद से टकराकर लौटने वाली किरण को वह फिर

पृथ्वी पर स्थापित अर्थ स्टेशन तक वापस भेज सके। अब बताया गया है कि कई दशक

से चल रहे इस शोध के तहत अब उल्लेखनीय सफलता हाथ लगी है। जिस सतह से यह

लेजर किरणें टकराकर लौटी हैं, वह चांद पर एक सामान्य पुस्तक के आकार की है।

लेजर किरणों एक किताब के आकार पर टकरायी

इससे समझा जा सकता है कि लेजर किरणों की गति और लक्ष्य तक पहुंचने की स्थिरता

कितनी मजबूत हो सकती है।

यह अनुसंधान नासा के वैज्ञानिकों ने फ्रांस के वैज्ञानिकों के एक दल के साथ मिलकर

किया था। नासा का लूनार ऑर्बिटर वर्ष 2009 से ही चांद के अनुसंधान में जुटा हुआ है।

नासा ने इसी याजन पर एक यंत्र लगा रखा है, जो लेजर किरणों को ग्रहण और परावर्तित

कर सकता है। चांद पर इस लेजर किरण के पहुंचे की पुष्टि के लिए वहां पहले के चंद्र

मिशनों के तहत वहां छोड़े गये सौर पैनलों का इस्तेमाल करने का काम किया था। लेकिन

इससे पहले के प्रयोगों में यह सौर पैनल काफी कमजोर तरंग वापस लौटा रहे थे, जिनका

वैज्ञानिक उपयोग कर पाना संभव नहीं था। यह तकनीक अपोलो चंद्र अभियान के समय

से ही आजमायी जा रही ती। चांद पर सीधे लेजर किरण भेजने के बदले लूनार ऑर्बिटर के

जरिए परावर्तित किरणों को भेजने और वापस प्राप्त करने का परिणाम अच्छा रहा है।

इसके जरिए जो लेजर किरणें चांद से टकराकर वापस लौंटी हैं, वे काफी मजबूत अवस्था में

हैं, जिनका वैज्ञानिक विश्लेषण और उपयोग किया जा सकता है। लेकिन इतनी दूरी तक

लेजर किरणों के इस सफर ने यह साबित कर दिया है कि भविष्य में खगोल विज्ञान के

साथ साथ रक्षा प्रबंध में भी इन लेजर किरणों की प्रमुख भूमिका होगी, जो किसी सुदूर

लक्ष्य तक और अंतरिक्ष में भी सटीक निशाना साध सकेंगे।

सुदूर में भी सटीक निशाना साधना आसान होगा

इसी प्रयोग के लगातार जारी रहने की वजह से वैज्ञानिक अब इस नतीजे पर भी पहुंचे हैं

कि चांद और पृथ्वी एक दूसरे से दूर जा रहे हैं। हालांकि इस दूर जाने की गति बहुत धीमी है

और साल में औसतन 3.8 सेंटीमीटर की है। फिर भी यह पता चल रहा है कि दोनों के बीच

गुरुत्वाकर्ण के बल का खिंचाव कम हो रहा है। सात अगस्त को इस शोध के बारे में

जानकारी देते हुए इस अनुसंधान से जुड़े वैज्ञानिक इरवान माजारिको ने बताया है कि

लेजर किरणों की उपलब्धि पर अभी और बहुत काम शेष है। उनके मुताबिक अभी जो

लेजर किरणें चांद से टकराकर लौट रही हैं, वह भेजे गये किरणों का दसवां हिस्सा क्यों हैं,

इसे समझने की कोशिश जारी है


 

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
More from अजब गजबMore posts in अजब गजब »
More from अंतरिक्षMore posts in अंतरिक्ष »
More from ताजा समाचारMore posts in ताजा समाचार »
More from रक्षाMore posts in रक्षा »

Be First to Comment

Leave a Reply