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तीस हजार स्वयंसेवकों के साथ प्रारंभ हुआ कोरोना वैक्सिन का सबसे बड़ा परीक्षण

  • इस साल के अंत तक वैक्सिन लाने की पूरी कोशिश

  • इस परीक्षण को डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन प्राप्त

  • अधिकांश को अब भी ऑक्सफोर्ड का इंतजार

  • भारत में वैक्सिन उत्पादन की सभी की तैयारी

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः तीस हजार स्वयंसेवकों को अब सबसे बड़े कोरोना वैक्सिन के क्लीनिकल

ट्रायल में शामिल कर लिया गया है। यह दुनिया का सबसे बड़ा मानव वैक्सिन परीक्षण का

दौर है। आम तौर पर इसे किसी भी दवा अथवा वैक्सिन के परीक्षण के क्लीनिकल ट्रायल

का अंतिम दौर माना जाता है। इसके सफल साबित होने के बाद वैक्सिन को इस्तेमाल के

लिए अनुमति मिलने का सिर्फ एक और दौर शेष रह जाएगा। इस वैक्सिन को बनाने से

जुड़े वैज्ञानिक मान रहे हैं कि यदि यह दौर भी सफल रहा तो इस साल के अंत तक वे

कोरोना वायरस का वैक्सिन दुनिया को उपलब्ध करा सकेंगे। अमेरिकी कंपनी मार्डेना

इनकॉरपोरेशन और फाइजर ने यह परीक्षण प्रारंभ किया है। कल से प्रारंभ हुए इस दूसरे

दौर में एक साथ तीस हजार स्वयंसेवक भाग ले रहे हैं। इस परीक्षण को अमेरिकी प्रशासन

का भी समर्थन प्राप्त है। डोनाल्ड ट्रंप खुद भी किसी तरह एक सफल वैक्सिन के जल्द

आने के लिए हर संभव कोशिश करने की घोषणा पहले ही कर चुके हैं।

वैसे व्यापार जगत भी इस अनुसंधान पर लगातार नजर बनाये हुए है। इसी वजह से तीस

हजार लोगों पर वैक्सिन परीक्षण का एलान होते ही मार्डना का शेयर 9 प्रतिशत और

फाइजर का 1.6 प्रतिशत ऊपर चला गया। इसके साथ ही काम कर रही कंपनी बॉयोएनटेक

के शेयर भी 4.2 प्रतिशत उछाल पर गये।

तीस हजार स्वयंसेवकों पर जेनेटिक इंजीनियरिंग का प्रयोग

जिस वैक्सिन को बनाने की कवायद चल रही है, वह भी अन्य अधिकांश वैक्सिनों की तरह

जेनेटिक इंजीनियरिंग पर भी निर्भर है। कोरोना वायरस को दवाओं से बचाव प्रदान करने

वाले उसके स्पाइक प्रोटिन के आवरण के जैसा ही नकली प्रोटिन तैयार कर उसके जरिए

शरीर के अंदर प्रतिरोधक तैयार करने की तकनीक पर यह काम चल रहा है।

इस काम में सबसे आगे चल रही कंपनी मार्डना ने इसके पहले कभी कोई वैक्सिन नहीं

बनायी है। लेकिन अमेरिका सरकार ने उसे एक खबर अमेरिकी डॉलर की मदद की है। इस

धन के उपलब्ध होने की वजह से ही सारी कंपनियां युद्ध की तैयारी के स्तर पर सारा काम

निपटा रही है। इससे जुड़े वैज्ञानिकों की राय है कि पैसा का मसला देखना कंपनी के

व्यापारिक पदों पर आसीन लोगों का काम है। वैज्ञानिकों की चाहत है कि दुनिया के हर

व्यक्ति तक जल्द से जल्द यह वैक्सिन पहुंचे। योजना के तहत वैक्सिन को इस्तेमाल के

लायक घोषित किये जाते ही पहले चरण में 50 करोड़ वैक्सिन पूरी दुनिया में उपलब्ध करा

देना है। इसकी सारी तैयारियां भी हो चुकी हैं। दुनिया भर में फैले उन तमाम शोध केंद्रों को

तैयार किया गया है, जो तकनीक के सफल होने के बाद उसी तकनीक के आधार पर

वैक्सिन का उत्पादन प्रारंभ कर देंगे। इससे पूरी दुनिया तक वैक्सिन पहुंचान में अधिक

समय नहीं लगेगा।

हर वैक्सिन निर्माता अब भारत के संपर्क में

इस बीच अमेरिका में जॉनसन एंड जॉनसन का क्लीनिकल ट्रायल भी इसी सप्ताह प्रारंभ

होने की उम्मीद है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वैक्सिन की पद्धति पर दुनिया के

वैज्ञानिकों ने सबसे अधिक भरोसा जताया है। ऑक्सफोर्ड भी पूरी तरह से इसे सुरक्षित

मान लेने के बाद साल के अंत तक इसे लाने की तैयारियों में जुटा है।

दुनिया में अब तक साढ़े छह लाख लोगों को मार चुका यह वायरस अब तक काबू में नहीं

आ पाया है। साथ ही इसकी वजह से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था ही चौपट हो चुकी है।

इसलिए सभी मान रहे हैं कि बिना किसी कारगर दवा अथवा वैक्सिन के कोरोना की वजह

से उत्पन्न इस परिस्थिति में सुधार नहीं किया जा सकता है। कोरोना का आतंक समाप्त

होने के बाद ही दुनिया फिर से अपनी पटरी पर लौटती नजर आयेगी। फाइजर कंपनी की

तरफ से दूसरी परीक्षण के बाद आज यह बताया गया है कि इस दौर के सफल होने के बाद

अक्टूबर में इसका और बड़ा क्लीनिकल ट्रायल किया जाएगा। इसके लिए दूसरे दौर के

परिणाम आने के बाद भी अमेरिकी प्रशासन से अगले चरण की अनुमति के लिए आवेदन

दिया जाएगा।

वैसे दुनिया भर में चल रहे महत्वपूर्ण वैक्सिन परीक्षणों की खास बात यह है कि सभी ने

अपने व्यापारिक उत्पादन के साथ साथ बड़े क्लीनिकल ट्रायल के लिए भारत को ही चुना

है। यानी जो भी वैक्सिन पहले तैयार होगी, उसका उत्पादन मूल देश के साथ साथ भारत

में भी किया जाएगा। भारतवर्ष में उत्पादित होने वाली वैक्सिन की जिम्मेदारी एशिया के

अन्य देशों तक इसे कम समय में पहुंचाने की होगी।


 

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