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शनि ग्रह की धुरी के करीब से निकलेगा अब तक का सबसे बड़ा उल्कापिंड

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वर्ष 2031 में यह हमारे सौरमंडल में होगा
पृथ्वी को इससे कोई खतरा नहीं होगा
पहली बार इसके बारे में पता चला है
कई सौरमंडलों को पार कर आ रहा है
राष्ट्रीय खबर

रांचीः शनि ग्रह की धुरी के करीब से जो उल्कापिंड निकलेगा, वह वैज्ञानिकों के लिए अब तक का देखा गया सबसे बड़ा उल्कापिंड हैं। उसकी धुरी का अनुमान लगाते हुए खगोल वैज्ञानिकों ने कहा है कि यह उल्कापिंड अगर अपनी सही धुरी पर चल रहा है तो यह हमारे सौरमंडल में 3.5 मिलियन वर्ष बाद लौट रहा है।




इसलिए इससे पहले इस उल्कापिंड को देखे जाने की कोई वैज्ञानिक उम्मीद नहीं थी। इसके आकार प्रकार के बारे में वैज्ञानिकों ने बताया है कि विज्ञान की जानकारी के मुताबिक यह अब तक देखा गया सबसे बड़ा उल्कापिंड है।

सूर्य की सीमा यानी हमारे सौरमंडल में प्रवेश करने के बाद वह कई ग्रहों के करीब से गुजरता हुआ फिर से इस सौर मंडल से बाहर निकल जाएगा। इस दौरान शनि ग्रह की धुरी से उसकी सबसे कम की दूरी रहेगी। इस उल्कापिंड का नाम बर्नाडिनेली बर्नस्टेइन है।

इसके बारे में नजर आ रहा है कि यह वर्ष 2031 में शनि ग्रह की धुरी के करीब से गुजरेगा। यानी आज से करीब दस वर्ष बाद यह हमारे सौरमंडल की सीमा में प्रवेश करेगा।

वैसे खगोल विज्ञान में इस उल्कापिंड को सी-2014 यूएन 271 के नाम से भी जाना जाता है। यह आकार में करीब एक सौ किलोमीटर चौड़ा है। इसलिए वैज्ञानिक इसे अब तक नजर आने वाले उल्कापिंडों में सबसे बड़ा मान रहे हैं।

इसकी दूसरी विशेषता यह है कि यह अन्य सौर पिंडों के मुकाबले अत्यधिक भारी है क्योंकि इसका ठोस स्वरुप दूसरे उल्कापिंडों के मुकाबले एक हजार गुणा ज्यादा होने की उम्मीद व्यक्त की गयी है। शनि ग्रह की धुरी के करीब से निकलने वाले इस पिंड को पहली बार देखकर वैज्ञानिकों को यह भ्रम हुआ था कि यह कोई मृत ग्रह है लेकिन बाद में यह पता चला कि यह दरअसल एक विशाल उल्कापिंड ही है।

शनि ग्रह की तरफ आने वक्त मृत ग्रह समझा गया था

बर्नाडिनेली बर्नस्टेइन पर वैज्ञानिकों की नजर पहली बार जून 2021 में पड़ी थी। उसके बाद से ही इस पर नजर रखी जा रही थी ताकि यह पता चल सके कि यह किस दिशा में और कितनी गति से आगे बढ़ रहा है।

वर्तमान में यह हमारे सौरमंडल से खरबों मील की दूरी पर है। इसपर लगातार नजर रखने की वजह से ही इस खगोलीय पिंड के पीछे बनते पूछल्ले से स्पष्ट हो गया कि यह दरअसल एक उल्कापिंड है। अब तक के शोध के मुताबिक यह अत्यंत कठोर पत्थर का एक पिंड है जो अत्यंत ठंडा भी है।




अब हमारे सौरमंडल में आने तथा सूर्य के प्रकाश के प्रभाव में आने के बाद इस पर क्या असर होता है, इसे भी वैज्ञानिक देखना और समझना चाहते हैं। इतने दिनों के बाद अपनी धुरी पर यहां से गुजरते हुए इस उल्कापिंड पर सूर्य की गर्मी का क्या प्रभाव पड़ेगा, इसे पहली बार समझा जा सकेगा। इससे पूर्व जब यह इस इलाके से गुजरा होगा उस समय का कोई विवरण हमारे पास मौजूद नहीं है।

वैसे वैज्ञानिकों ने पहले ही यह भांप लिया है कि इस उल्कापिंड के करीब आने से पृथ्वी को कोई खतरा नहीं है। इतना बड़ा पत्थर पृथ्वी के उतने करीब नहीं पहुंचेगा, जिससे दोनों पर कोई प्रभाव पड़ सके।

जिस इलाके से यह आता हुआ नजर आ रहा है वह पृथ्वी से सूर्य की दूरी का 29 गुणा अधिक है। शनि ग्रह की धुरी के करीब पहुंचने के दौरान ही यह पृथ्वी के करीब से भी गुजरेगा लेकिन जब भी यह सूर्य से धरती की दूरी के मुकाबले 10.91 गुणा अधिक दूरी पर रहेगा।

इसका घनत्व भी दूसरों के मुकाबले बहुत अधिक है

शनि ग्रह की धुरी के बिल्कुल करीब से गुजरने के दौरान दोनों के आपसी खिंचाव का क्या प्रभाव हो सकता है, उसे भी खगोल वैज्ञानिक समझना चाहते हैं। वैसे अब तक की गणना के मुताबिक पिछले बार जब यह इस इलाके से गुजरा होगा तब शायद इसकी दूरी थोड़ी अधिक रही होगी।

उसके बाद से यह सुदूर महाकाश में काफी दूर तक अपनी धुरी में आगे निकल गया था। वहां से चक्कर काटकर लौटने में उसे इतना समय लगा है। आधुनिक विज्ञान में अब तक अंतरिक्ष में इस तरीके से मंडराने वाले आठ सौ अज्ञात पिंडों की पहचान हुई है।

इसके बीच वैज्ञानिकों ने तीन सौ मिलियन सौरमंडलों के होने का भी पता लगाया है। इन्हीं सौर मंडलों में से किसी एक से निकला यह विशाल उल्कापिंड अपनी गति और आकार की वजह से तब से ही अंतरिक्ष में एक सौर मंडल से दूसरे सौरमंडल की चक्कर काटता हुआ घूम रहा है।

चूंकि इस सौर मंडल में शनि ग्रह की धुरी तक पहुंचने में अभी काफी समय है। इसलिए वैज्ञानिक उसके बारे में अधिक से अधिक जानकारी हासिल कर लेना चाहते हैं। वैज्ञानिकों की रूचि इसके खनिज संरचना को समझने की भी है, जिससे प्राचीन महाकाश की सृष्टि पर नई जानकारी मिल सकती है।



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