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जमीन खरीद के नियम बताते हैं कि अयोध्या मामले में गड़बड़ी है

जमीन खरीद के नियम बताते हैं कि अयोध्या मामले में गड़बड़ी है
  • खरीदा उससे खरीदा जाता है जो कानूनन जमीन का मालिक हो

  • ट्रस्ट के द्वारा की गयी रजिस्ट्री ही कानून सम्मत नहीं है

  • सिर्फ रजिस्ट्री से मालिकाना नहीं मिल जाता

विजय कुमार

कोलकाताः जमीन खरीद के नियम यह बताते हैं कि श्रीराम जन्मभूमि मंदिर ट्रस्ट ने

कानूनन बड़ी गलती की है। जिन मुद्दों की चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर हो चुकी है, उससे अलग

यहां के विधि विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी के जमीन खरीदने के लिए उसका कानूनन

मालिक होना आवश्यक शर्त होता है। यह हर कोई जानता है। जमीन की रजिस्ट्री होने भर

से कोई जमीन का मालिक नहीं हो जाता है। रामजन्मभूमि के लिए जिस जमीन पर बवाल

चल रहा है, उसमें भी ट्रस्ट वालों ने यह चूक की है। अब यह चूक क्यों हुई है और इतनी

जल्दबाजी क्यों की गयी है, इसका खुलासा तो जांच से हो सकता है।

कानून के जानकारों ने कहा कि जब कोई भी जमीन की रजिस्ट्री कराता है तो उसके बाद

की कानूनी प्रक्रिया सरकारी रिकार्ड में जमीन के मालिक का बदलना होता है। इसके लिए

सरकारी पंजी में बदलाव कर यह दर्शाया जाता है कि फलां जमीन उस व्यक्ति से रजिस्ट्री

के माध्यम से दूसरे व्यक्ति को बेची गयी है। इसके बाद रसीद निर्गत की जाती है, जिसे

कई राज्यों में करेक्शन स्लिप कहते हैं। उसके बाद जमीन के लगान का भुगतान होने के

बाद जब वह रसीद निर्गत हो जाती है। तभी रजिस्ट्री कराने वाला जमीन का मालिक

कहलाता है। जमीन खरीद का यही प्रचलित नियम है और इसे सभी लोग अच्छी तरह

जानते भी हैं।  इस ट्रस्ट की कार्रवाई में जिन दो लोगों पर पैसा उड़ेलने की मेहरबानी की

गयी है उन्होंने चंद मिनट पहले ही जमीन की रजिस्ट्री करायी थी। लिहाजा वे मात्र चंद

मिनटों में सरकारी दस्तावेजों में यह परिवर्तन कर जमीन के मालिक नहीं बन सकते थे।

अब जब वे जमीन के मालिक ही नहीं थे तो उन्हें इतनी बड़ी रकम का भुगतान कैसे किया

गया, यह तो ट्रस्ट के लोगों को जबाव देना है।

जमीन खरीद के बाद नाम परिवर्तन में समय लगता है

जमीन खरीद की रजिस्ट्री के बाद इस प्रक्रिया को काफी त्वरित गति से भी अगर पूरा

किया जाए तो इसमें कानूनन कमसे कम एक महीने का समय लगता है क्योंकि इसके

लिए विधिवत नोटिस जारी कर एक महीने का समय दिया जाता है ताकि किसी को अगर

इस पर कोई आपत्ति हो तो वह दर्ज करे। अगर कहीं से आपत्ति दर्ज हो गयी तो ऊपर के

अधिकारी उस आपत्ति पर सुनवाई कर अपना फैसला देते हैं। लिहाजा महज चंद मिनटों

में एक हाथ से दूसरे हाथ आयी जमीन को बेचने का अधिकार उन दोनों लोगों को नहीं था,

जिन्हें ट्रस्ट भुगतान किया है। कानून के जानकार कहते हैं कि इसके लिए बैंक अथवा

सरकारी कार्यालयों की कार्यपद्धति को भी देखा जा सकता है। बैंक भी किसी जमीन पर

किसी व्यक्ति को कर्ज तब देता है जब जमीन के सारे सरकारी दस्तावेज उसके नाम पर

हों। ऐसे में ट्रस्ट के लोगों ने इतनी जल्दबाजी में जो भुगतान किया है, वह निश्चित तौर

पर संदेह पैदा करने वाला है।

इस बीच तृणमूल खेमा से आ रहे संकेतों के मुताबिक उत्तर प्रदेश जाकर भाजपा से दो हो

हाथ करने की तैयारियों मे जुटी पार्टी इस मुद्दे को भी राष्ट्रीय स्तर पर उठाने वाली है।

इसके माध्यम से ही तृणमूल कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपना जनाधार बनाने का काम प्रारंभ

कर सकती है। पार्टी के अनुभवी लोगों को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गयी है। हो सकता है कि

पश्चिम बंगाल में जारी तोड़ फोड़ की वजह से इसमें थोड़ा विलंब हो क्योंकि अब राज्य में

भाजपा ही टीएमसी के निशाने पर हैं और उसके करीब एक तिहाई विधायक पार्टी बदलने

का मन बना रहे हैं।

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