Press "Enter" to skip to content

प्रयोगशाला में बने कृत्रिम पत्ते का भी अब प्राकृतिक इस्तेमाल होगा




  • प्रारंभ में दवा निर्माण का प्रयोग पूरी तरह सफल रहा
  • नकली पत्ते से पहली बार तैयार होगी दवाइयां
  • सिर्फ सूर्य की रोशनी से शुरु करता है काम
  • इस कारखाना को आप कहीं भी ले जाएं
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः प्रयोगशाला में बने नकली पत्ता अब दुनिया में औद्योगिक कमाल करने वाला है।

वैज्ञानिकों ने एक करामाती कृत्रिम पत्ता तैयार किया है।

इस नकली पत्ते की विशेषता है कि यह सूर्य की रोशनी से प्रतिक्रिया कर कई चीजों का निर्माण कर सकती है।

इस विधि के सफल होने के बाद खास तौर पर दवाइयों के उत्पादन में इसकी सबसे अधिक उपयोगिता की बात सामने आ रही है।

प्रयोग सफल होने के बाद अब इसके व्यापारिक इस्तेमाल की तैयारियां हो रही हैं।

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इसका सबसे पहले उपयोग दवा उद्योग में ही किया जाना तय हो गया है।

वैज्ञानिकों ने सौर ऊर्जा अनुसंधान के तहत ही इस कृत्रिम पत्ते का प्रयोगशाला में  निर्माण किया है।

इसके पहले सौर ऊर्जा से खास तौर पर विद्युतीय उपकरणों को संचालित करने पर ध्यान दिया जाता रहा है।

यह पहला अवसर है जबकि सौर ऊर्जा का कोई और उपयोग किया जाने वाला है।

इस वजह से भी इस पत्ते को वैज्ञानिक जगत में महत्वपूर्ण उपलब्धि के तौर पर आंका जा रहा है।

दरअसल सौर ऊर्जा उद्योग में भी इससे पहले बिजली के उत्पादन के अलावा

किसी अन्य काम में सौर ऊर्जा के उपयोग पर कोई नया काम भी नहीं हुआ है।

अब वैज्ञानिकों ने पहली बार सौर ऊर्जा के नये इस्तेमाल का यह सफल मॉडल दुनिया के सामने प्रस्तुत किया है।

इसमें पता चला है कि उचित तकनीक की मदद से सौर ऊर्जा से प्राप्त ऊर्जा की बदौलत अन्य काम भी किये जा सकते हैं।

प्रयोगशाला में बने इस पत्ते के अनेक उपयोग

इस कृत्रिम पत्ते की मदद से फोटोन आधारित अन्य उत्पादन को सफलता पूर्वक कर दिखाया गया है।

दरअसल इस विधि में सौर ऊर्जा से प्राप्त शक्ति का उपयोग पत्ते में मौजूद सेंसर की मदद से किसी भी काम में लाया जा सकता है।

अलबत्ता अलग अलग काम के लिए पत्ते के अंदर की संरचना अलग अलग होना तय है।

इस पत्ते के अंदर अति सुक्ष्म रियेक्टर लगाये गये हैं।

सूर्य की गर्मी के आधार पर यह अपने लिए निर्धारित काम करने लगते हैं।

इसी पूर्व निर्धारित काम की वजह से सौर ऊर्जा के संपर्क में आने के बाद यह पत्ता अपने आप ही अपना काम प्रारंभ कर देता है।

दरअसल इसे एक अति सुक्ष्म कारखाना भी माना जा सकता है,

जो सिर्फ सूर्य की रोशनी में अपने आप ही काम करने लगता है।

यानी सूर्य की रोशनी के संपर्क में आने के बाद इससे उत्पादन अपने आप ही प्रारंभ हो जाता है।

आइंडहोवन यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने इस लघु सौर ऊर्जा संयंत्र को बनाने में सफलता पायी है।

प्रयोग में यह नकली पत्ता सौर ऊर्जा के आधार पर अपने अंदर ही रसायन तैयार करने में सफल रहा है।

प्रयोग के दौरान वैज्ञानिकों के दल ने इसके जरिए दवा, मलेरिया रोधी यौगिक

और पक्षाघात में काम आने वाले रसायन तैयार करने में सफलता पायी है।

प्रयोगशाला में पहले भी बनाये गये हैं ऐसे नकली पत्ते

इसके पहले भी प्रयोगशाला में कृत्रिम पत्ते तैयार किये गये थे।

उस दौरान यह नकली पत्ते सिर्फ फोटो सिंथेसिस का काम किया करते थे।

अब उसी विधि को आगे बढ़ाते हुए सौर ऊर्जा से अन्य यौगिक बनाने का यह काम प्रारंभ हो पाया है।

इस विधि के सफल होने के बाद वैज्ञानिक इस बात से भी संतुष्ट है कि

अब कारखानों में उत्पादन के दौरान जो प्रदूषण फैला करता था,

इस विधि से वह पूरी तरह रूक जाएगा।

साथ ही कारखानों के संचालन के लिए ईंधन के खर्च और ईंधन के जलने से

होने वाले पर्यावरण के नुकसान को भी स्थायी तौर पर समाप्त किया जा सकेगा।

दूसरी तरफ इस काम के लिए जो संसाधन आवश्यक है, वह प्राकृतिक तौर पर पूरी दुनिया में सहज ही उपलब्ध है।

इससे हर किस्म के उत्पादन की लागत भी तेजी से कम हो जाएगी।

इस सुक्ष्म संयंत्र के बारे में वैज्ञानिकों ने बताया है कि इस नकली पत्ते के अंदर

उनलोगों ने एक सिलिकॉन रबर के साथ साथ अत्यंत पतले आकार के ऐसे

उपकरण लगाये हैं, जो सौर ऊर्जा के घनीभूत करते हैं।

इसके लिए पत्तों की संरचना को ही आधार बनाया गया है।

पत्तों के अंदर भी पतली पतली शिराएं होती हैं, जो फोटो सिंथेसिस में मदद करते हैं।

इन्हीं के जैसा बना नकली सिरा ही सौर ऊर्जा को अपने अंदर केंद्रित कर उसमें लगे संयंत्र को काम प्रारंभ करने की ऊर्जा प्रदान करता है।

जब यह घनीभूत सौर ऊर्जा अंदर पहुंचती है तो पूर्व निर्धारित प्रोग्राम के मुताबिक इसमें से उत्पादन अपने आप ही प्रारंभ हो जाता है।

संरचना में फेरबदल कर कुछ भी बनाया जा सकता है




इस विधि के सफल होने के बाद वैज्ञानिक मानते हैं कि अब अनेक कामों के लिए ऐसे नकली पत्तों के पेड़ भी लगाये जा सकते हैं,

जो एक मध्यम आकार के कारखाना जैसा उत्पादन दे सकते हैं।

इनमें ईंधन के तौर पर सिर्फ सूर्य की रोशनी की जरूरत होगी, जो प्राकृतिक तौर पर हमारे पास पहले से ही मौजूद है।

यानी इसकी मदद से अनेक किस्म के उत्पादन करने के साथ साथ लागत को कम करने में मदद मिलेगी।

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक और एसोसियेट प्रोफसर टिमोथी नोएल ने कहा कि यह एक लघु आकार का कारखाना है।

इसे आप कहीं भी ले जा सकते हैं। वहां के सूर्य की रोशनी से इससे उत्पादन प्रारंभ किया जा सकता है।

इस विधि से उत्पादन के परिवहन की लागत को भी कम करने से दुनिया की अर्थव्यवस्था को अंततः फायदा ही होगा।

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •   
  •  
  •  
More from Hindi NewsMore posts in Hindi News »

Be First to Comment

Leave a Reply