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जांच के बदले अपनी गरदन बचाने में जुटा है कोतवाली थाना




  • गिरफ्तारी की एक गलत कार्रवाई के बाद फंसे हैं पुलिस वाले

  • मामले की सिर्फ इधर उधर भटकाने की साजिशें जारी

  • एक गलती को छिपाने के लिए सौ झूठ का सहारा

  • बैंक में सच जानने नहीं पहुंचा कोई अधिकारी

संवाददाता

रांचीः जांच के बदले कोतवाली पुलिस अपनी गलती छिपाने में जुटी है।

पुलिस विभाग की एक गलत कार्रवाई की वजह से अब नीचे से ऊपर तक सभी पुलिस वाले एक मामले में सिर्फ इसे भटकाने की साजिशों में ही जुटे हैं।

मामले कोतवाली थाना क्षेत्र का है।

यह दरअसल शुद्ध तौर पर सिविल वाद का मामला था।

इसमें एक पक्ष के दबाव में आकर दूसरे पक्ष के व्यक्ति को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था।

अब मामले की सही जांच होने पर अगर जेल भेजा गया व्यक्ति बेगुनाह साबित होता है

तो पहले के सारे फैसले सवालों के घेरे में आ जाएंगे।

यही सोच पुलिस को जांच की गाड़ी आगे बढ़ाने से रोक रही है।

मामला अंकित अग्रवाल वनाम दिलीप पोद्दार का है

मामला अंकित अग्रवाल वनाम दिलीप पोद्दार का है।

दोनों के बीच यह पारिवारिक संपत्ति के बंटवारे से प्रारंभ हुआ विवाद था।

इस पूरी कहानी की पृष्टभूमि भी रोचक है।

लेकिन पुलिस की जांच के दायरे में जो मामला आया था वह कांड संख्या 328-2016 है।

इस मामले में मामा दिलीप पोद्दार ने किसी आर्यन द्वारा बैंक के गलत तरीके से पैसा निकाल लेने की शिकायत पुलिस में दर्ज करायी थी।

शिकायतकर्ता के मुताबिक वह किसी आर्यन को जानते तक नहीं हैं।

इसी आरोप में पुलिस ने अंकित अग्रवाल पर कार्रवाई की थी।

अंकित अग्रवाल पर बैंक से गलत हस्ताक्षर कर लाखों रुपये निकाल लेने का आरोप लगाया था।

उनका पुलिस इतने दिनों के बाद भी हस्ताक्षर के संबंध में बैंक से यह नहीं जान पायी है कि

दरअसल जो आरोप लगाये गये थे, वे सही भी हैं अथवा नहीं।

प्रारंभिक जांच में जो बातें सामने आयी हैं, उसके मुताबिक शिकायतकर्ता ने किसी आर्यन द्वारा उनके बैंक खाता से गलत तरीके से पचास लाख रुपये निकाल लेने की बात कही है।

वैसे इस मामले के आरोपी अंकित का घर का नाम भी आर्यन ही है।

प्रारंभिक तौर पर आर्यन उर्फ अंकित अग्रवाल पर संदेह होने के बाद भी मामूली जांच से ही स्थिति का खुलासा हो जाता है।

दरअसल आरोप के दायरे में जिन तिथियों का उल्लेख किया गया है, उन तिथियों के पहले भी आर्यन के नाम से ही बैंक से लेनदेन होते रहे हैं।

इतना ही नहीं मामले की जांच में संवाददाता ने यह पाया है कि दिलीप पोद्दार के भाई की फर्म का लेन देन भी किसी आर्यन के द्वारा ही किया जाता रहा है।

जांच के बदले फाइलों और शिकायतों में जुटी है पुलिस

आर्यन के नाम से पहले से ही और दो फर्मों में चेक जारी होने के बाद भी सिर्फ एक खास अवधि के

बारे में ही शिकायत के बाद भी पुलिस जांच के बदले इस मामले की गहराई तक अब तक नहीं पहुंच पायी है।

इस बीच पुलिस ने अंकित अग्रवाल उर्फ आर्यन को गिरफ्तार कर जेल भी भेज दिया था।

लेकिन उसके बाद से असली आर्यन कौन है, दिलीप पोद्दार द्वारा लगाये गये आरोपों के संबंध में

बैंक का क्या कहना है, उसे जानने को कोई पुलिस अधिकारी आज तक बैंक नहीं गया है।

इस बीच कांड और थाना में कई अफसर बदल चुके हैं।

पुलिस की तरफ से इस किस्म की लापरवाही बरतने के संबंध में अनुभवी जानकार मानते हैं कि

दरअसल एक किसी एक अधिकारी की गलत अथवा किसी साजिश के तहत कोई बेगुनाह जेल चला गया है

तो उसे नये सिरे से बेगुनाह मान लेने से अनेक अधिकारी इसकी लपेट में आ जाएंगे।

आने वाले दिन में यह सवाल उन अधिकारियों पर भी उठेगा, जिन्होने इस कांड का पर्यवेक्षण किया था।

गलत फैसले के लिए सभी बराबर के दोषी माने जाएंगे।

शायद इसी वजह से पुलिस के सारे लोग जांच के बदले जांच को सही दिशा में अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचाने में डर रहे हैं।



Rashtriya Khabar


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