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किसान आंदोलन सारे दलों के लिए एक जनादेश




किसान आंदोलन अंततः स्थगित हो गया और दोनों पक्षो में जो सहमति बनी है उससे गतिरोध के भविष्य में समाप्त होने की उम्मीद की जा सकती है। लेकिन अगर इस बीच उत्तरप्रदेश का चुनाव भाजपा के खिलाफ चला गया तो नये सिरे से आंदोलन की सुगबुगाहट से इंकार भी नहीं किया जा सकता है। वैसे इस लंबे समय तक चले किसान आंदोलन को सिर्फ भाजपा विरोधी एक मुहिम नहीं माना जाना चाहिए।




यह दरअसल देश की तमाम राजनीतिक दलों के लिए एक स्पष्ट जनादेश है, जो यह कहता है कि जनता ने अगर आपको चुनकर भेजा है तो आप मनमर्जी न करें क्योंकि आप हर बार पांच साल में जनता के द्वारा ही चुने जाएंगे। इस किसान आंदोलन ने देश में फिर से श्रमिक आंदोलनों को भी जीवित करने का काम किया है।

हाल के वर्षों में सरकार ने ऐसे श्रमिक आंदोलनों को कुचलने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। दूसरी तरफ राजनीतिक समर्थन से चलने वाले श्रमिक आंदोलनों से भी देश का बहुत नुकसान हुआ है। हम रांची के एचईसी का वर्तमान हाल देख सकते हैं, जहां वेतन की मांग पर आंदोलन चल रहा है।

यहां भी भाई भतीजावाद और स्वजन पोषण की राजनीति ने धीरे धीरे कर एशिया के इस सबसे बड़े कारखाना को इस हाल में पहुंचा दिया है। दूसरी तरफ बिहार के बाद झारखंड के तमाम सरकारों ने इसे पुनर्जीवित करने की दिशा में अपनी तरफ से भी कोई कोशिश नहीं की है।

दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल के वाम मोर्चा शासन काल का श्रमिक आंदोलन भी विकास की राह में बाधा बना है। लेकिन हाल के दिनों में श्रमिक आंदोलनों ने अपनी धार कुछ ऐसी खो दी है कि कोयला तथा बैंक उद्योग में भी श्रमिक संगठन जायज बातों को भी जोरदार तरीके से नहीं रख पा रहे थे।

दरअसल परोक्ष तौर पर सत्ता या प्रबंधन की तरफ से यह मनोवैज्ञानिक भय बना दिया गया था कि श्रमिक आंदोलनों से कोई नतीजा नहीं निकलने वाला है। अब दिल्ली की सीमा पर चलने वाला किसान आंदोलन यह साबित कर गया है कि सत्ता चाहे किसी की भी हो, अगर आंदोलन में ताकत होगी तो सरकार किसी की भी हो, उसे झूकना पड़ेगा। भले ही नरेंद्र मोदी को पहली बार अपने फैसले से पीछे हटना पड़ा है लेकिन यह जनादेश सभी राजनीतिक दलों के लिए एक जैसा ही है।




किसान आंदोलन की वजह से भाजपा के पीछे हटने को अपनी जीत

आज जो दल इस किसान आंदोलन की वजह से भाजपा के पीछे हटने को अपनी जीत के तौर पर देख रहे हैं, उन्हें भी याद रखना होगा कि इस आंदोलन ने किसानों को भी यह बता दिया है कि उनकी असली ताकत क्या है और कैस किसी बहुत बड़े आंदोलन का कुशलतापूर्वक संचालन किया जा सकता है।

देखने लायक बात है कि भाजपा के जो नेता पश्चिमी उत्तरप्रदेश के इलाकों से आते हैं, आंदोलन की समाप्ति के बाद उनके भी चेहरे चहकने लगे हैं। यह भी भाजपा के अंदर का मतभेद है, जिसमें लोग सब कुछ जानते हुए भी अपनी बात नहीं रख पा रहे हैं। दरअसल पार्टी के अंदर यह खौफ पैदा हो गया है कि ऊपर के फैसले के खिलाफ कुछ भी कहना विद्रोह की श्रेणी में गिना जाएगा।

अब यही हाल कांग्रेस के अंदर भी है, जहां अध्यक्ष पद को लेकर ठनी हुई है। अन्य दलों में भी जो केंद्रित सत्ता है, उसके लिए भी यह किसान आंदोलन एक स्पष्ट जनादेश के जैसा ही है, जिसकी वजह से आने वाले दिनों में तमाम राजनीतिक दलों को यह सीख अवश्य मिल चुकी होगी कि जनता के सामने ज्यादा अकड़ना ठीक नहीं होता।

आज नरेंद्र मोदी की अकड़ ढीली पड़ी है तो आने वाले कल को किसी और को भी इसी परेशानी से गुजरना पड़ सकता है। दूसरी तरफ यह सबक तमाम श्रमिक संगठनों के लिए भी है जिन्हें इस आंदोलन से यह सीखना चाहिए कि धैर्य के साथ और आम लोगों को जोड़कर आंदोलन को अंजाम तक कैसे पहुंचाया जा सकता है।

दरअसल राजनीतिक दलों के अफसरशाही ने इस बात के लिए भ्रमित कर दिया है कि सेटिंग गेटिंग से किया जाने वाला आंदोलन ही सफल होता है। यह अफसरशाही की चाल है, जो अपने खिलाफ किसी बड़े आंदोलन को स्थापित होने नहीं देती। वैसे भी हम यह सोच ब्रिटिश राज से लेकर ही आये हैं।

आज भी ब्यूरोक्रेसी उस ब्रिटिश राज की सोच से मुक्त नहीं हो पायी है, जिसमें अधिकारी ही असली सत्ताधारक होने का भ्रम पालते हैं। मजबूत जन विरोध की कमी की वजह से सत्ता चाहे राजनीतिक दल की हो अथवा अफसर की, अपनी मनमानी चला पाती है। उम्मीद की जा सकती है कि इस किसान आंदोलन के बाद सभी स्तरों की सोच में जो जंग लग चुकी थी, वह साफ होगी और लोकतांत्रिक आंदोलनों को नया बल मिलेगा।



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