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किलर ह्वेल की लंबी यात्रा का राज अब जाकर खुला

  • चमड़ी बदलने के लिए दूर आता है यह प्राणी

  • ग्यारह हजार किलोमीटर जाती है यह प्रजाति

  • गर्म पानी में जाने से सफाई अपने आप होती है

  • साढ़े पांच माह में दो बार चक्कर लगाया एक ने

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः किलर ह्वेल समुद्री जीवों में सबसे खतरनाक और आक्रामक प्रजाति की जीव

मानी जाती है। समुद्र की गहराई में इसके हमलों पर कई साइंस फिक्शन फिल्में भी बनी

हैं। इसके अलावा भी समुद्र में उन्हें झूंड में शिकार करते लोग अक्सर ही देख लेते हैं। कई

बार किसी द्वीप पर घिरे अन्य प्राणियों के समुद्र में उतरने की प्रतीक्षा में वे लगातार

चक्कर काटते रहते हैं। इन्हीं प्राणियों के बारे में पहली बार उनकी लंबी यात्रा का राज इतने

दिनों के बाद अब जाकर खुला है।

इस बारे में लगातार शोध करने वाले वैज्ञानिक अब जाकर इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि

समुद्र में रहने के दौरान उनकी चमड़ी को साफ करने की आवश्यकता होती है। अंटार्कटिका

के इलाके में जब इस किलर ह्वेल के समूह को देखा गया तो उनमें हल्के पीले रंग की छाप

नजर आयी थी। आम तौर पर यह रंग उनके शरीर का स्वाभाविक रंग नहीं होता। इसी

आधार पर शोध को आगे बढ़ाया गया।

कई बार वैज्ञानिक यह मानते रहे थे कि शायद समुद्र के एक इलाके में भोजन की कमी

होने की वजह से किलर ह्वेल लंबी यात्रा पर निकल जाते हैं। कई पीढ़ियों से उन्हें अपने

आने-जाने का रास्ता पता है। कुछ इसी तरह जंगली हाथियों का समूह भी पीढ़ी दर पीढ़ी

अपने एक ही मार्ग पर आवागमन किया करता है। किलर ह्वेल इस दौरान एक दूसरे के

संपर्क में भी बने रहते हैं।

किलर ह्वेल के इस आदत पर लंबा शोध हुआ

इस बारे में हर आंकड़ों के विश्लेषण के बाद वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि वे अन्यत्र

जाकर अपनी चमड़ी को सुधार लेते हैं। गर्म पानी के इलाकों में चले जाने के बाद उनकी

चमड़ी पर जमी पर्तें घुल जाती हैं। इससे किलर ह्वेल की चमड़ी फिर से साफ हो जाती है।

इस शोध से जुड़े समुद्र विज्ञानी रॉबर्ट पिटमैन कहते हैं कि अनेक आंकड़ों के विश्लेषण के

बाद ही यह नतीजा निकाला गया है। वह जब कैलिफोर्निया के साउथवेस्ट फिशरीज के

साथ कार्यरत थे, तभी उन्होंने इस पर गौर करना प्रारंभ किया था।

किलर ह्वेल प्रजाति के इस किस्म की लंबी यात्रा का रिकार्ड तो वैज्ञानिकों के पास करीब

एक सौ वर्ष पुराना है। लेकिन इससे पहले इस यात्रा का असली मकसद सामने नहीं आ

पाया था। हर तरीके से आंकड़े एकत्रित करने के बाद यह पाया गया है कि अंटार्कटिका के

ठंडे जल से जब वे गर्म पानी के इलाकों में पहुंचते हैं तो गर्म पानी ही उनकी चमड़ी पर लगी

पर्त को साफ कर देता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि अंटार्कटिका के ठंडे इलाके में रहने के

दौरान यह प्रजाति अपने खून का ढेर सारा हिस्सा चमड़ी के निचले हिस्से से प्रवाहित

करना जानती है। इसी वजह से उनपर हल्के पीले रंग का पर्त दिखने लगती है। इस तरीके

से वे अपने शरीर के तापमान को भी नियंत्रित कर लेते हैं। वहां से गर्म पानी के इलाके में

पहुंचने पर आतंरिक रक्त प्रवाह सामान्य हो जाती है। इससे चमड़ी के ऊपरी पर्त पर बने

दाग भी साफ हो जाते हैं। इससे उनके अंदर कोष निर्माण का प्रक्रिया भी पूर्ववत हो जाती

है और इससे उसे नया चमड़ा जैसा महसूस होने लगता है।

चमड़ी की पर्त से पानी में परेशानी भी होती है

इस बारे में वर्ष 2011 में पहली बार ऐसी संभावना व्यक्त की गयी थी। लेकिन उस वक्त

इसके विज्ञान सम्मत आंकड़े उपलब्ध नहीं थे। वैज्ञानिकों ने इसके बाद से किलर ह्वेल की

गतिविधियों का हर आंकड़ा एकत्रित किया। उनके विश्लेषण के बाद अब लंबी यात्रा का यह

राज सबके सामने आ पाया है। इन आंकड़ों के लिए वैज्ञानिकों ने 62 सैटेलाइटों का भी

सहारा लिया। अंतरिक्ष से भी इनकी 11 हजार किलोमीटर की यात्रा के सारे आंकड़े दर्ज

किये गये। शोध में पाया गया है कि यात्रा प्रारंभ होने के बाद वे लगातार आगे बढ़ते जाते

हैं। शोध के दायरे में आये एक किलर ह्वेल को साढ़े पांच महीनों में दो बार ऐसी यात्रा को

पूरी करते पाया गया है। इस आंकड़ा भी वैज्ञानिकों को हैरान कर गया है।

इसी शोध के तहत वैज्ञानिकों ने पाया है कि इस किलर ह्वेल के पेट के निचले हिस्से का

असली रंग सफेद होता है। लगातार ठंडे पानी में रहने की वजह से उसपर हल्के पीले रंग

की जो पर्त चढ़ जाती है। उसमें हानिकारक बैक्टेरिया भी होते हैं। इसलिए जब वे गर्म पानी

के इलाकों में पहुंचते हैं तो चमड़ी पर बनी इस पर्त के साथ साथ हानिकारक बैक्टेरिया से

भी वे छुटकारा पा लेते हैं।

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