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धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा सब्र करो फल मीठा होता है


 

धीरे धीरे कोरोना के चले जाने का पड़ाव अब भी दूर है। मैं अपनी बात कर रहा हूं क्योंकि मैं

रेड जोन यानी लाल घेरे में हूं, यहां पता नहीं कितने और जानलेवा वायरस लिये हमारे

आस पास घूम रहे हैं। कोई मशीन बननी चाहिए थी, एक्सरे मशीन की तरह। सामने खड़ा

हुआ तो अंदर छिपा हुए वायरस कुलबुलाता हुआ नजर आ जाता। लेकिन ऐसा है नहीं।

पहले को मास्क पहनने पर सांस में घुटन सी महसूस होती थी। कई बार स्कूटर के शीशे में

भी खुद को पहचान नहीं पाता था। अब तो लगातार लॉक डाउन से आदत हो गयी है। अब

तो मास्क पहनकर दूर से आते परिचित को भी पहचान पा रहा हूं।

लेकिन यह धीरे धीरे हमारे राजनेताओं की समझ से बाहर की चीज है। शुरु के कुछ दिनों

तक तो सब्र किया लेकिन जल्द ही पजामे से बाहर आ गये। अपने पड़ोस का कोई खाना

खाया या नहीं उसकी चिंता नहीं है। ढेर सारे विज्ञप्तिवीर इनदिनों पता नही किस बिल में

छिपे हुए हैं। स्थिति में सुधार होते ही अब शायद बिल से बाहर निकलेंगे। लेकिन जो बाहर

हैं उन्हें भी अपनी पुरानी बीमारी सताने लगी है। उसके अपने विरोधी का हर काम गलत

और अपना हर काम जायज लगने लगा है। अरे शर्म करो यार, यह भी कोई पॉलिटिक्स

करने का टाईम है। अभी तो यह संकट टल जाए, इस पर काम करो। वरना कोरोना और

फैला तो दो चार नेता भी अगर टपक गये तो कमाल ही हो जाएगा। लोगों को नेताओं पर

हमले का नया हथियार मिल जाएगा। अभी तो हमले की कानूनी पाबंदी है। वायरस लेकर

उनके पास चले गये तो पता नहीं क्या होगा। वैसे भी सफल नेता बनते बनते अक्सर ही

लोग साठ की देहरी लांघ ही जाते हैं।

अपने नेता लोग किसी भी टैम सुधर नहीं सकते क्या

लेकिन मेरी समझ में यह बात भी आयी कि नेता लोग चाहे जितनी भी कोशिश

कर लें, अगले चुनाव में यह कोरोना भी एक पॉलिटिकल मुद्दा जरूर रहेगा। इस बीमारी के

मौके पर किसने क्या किया, इसे तो पब्लिक देख समझ रही है। जाहिर है कि वोट डालने के

वक्त इस बार जनता भी नेता के गायब होने का सवाल पूछेगी। दरअसल हर बार पैसा

देकर वोट मैनेज करने का सारा खेल ही इस कमीने कोरोना से बिगाड़ दिया है। लगातार

तंगी और घरों में कैद लोगों ने निश्चित तौर पर अपने अपने तरीक से पॉलिटिकल आत्म

चिंतन किया होगा और किसी न किसी नतीजे पर तो पहुंचे ही होंगे।

इसी बात पर फिर से एक फिल्मी गीत याद आने लगा है। मेरे मिजाज के लिहाज से यह

नया गाना है। लेकिन आज के युवाओं के लिए बता दूं कि यह वर्ष 1990 में बनी फिल्म

आशिकी का गीत है। इस गीत को लिखा था रानी मलिक ने और संगीत में ढाला था नदीम

श्रवण की जोड़ी ने। इस गीत को स्वर दिया था अनुराधा पौड़वाल और कुमार सानू ने। गीत

के बोल कुछ इस तरह हैं।

धीरे धीरे से मेरी ज़िन्दगी में आना

धीरे धीरे से दिल को चुराना

तुमसे प्यार हमें है कितना जान-ए-जाना
तुमसे मिलकर तुमको है बताना
धीरे -2 से मेरी ज़िन्दगी में आना (2)

तुमसे प्यार हमें है कितना जान-ए-जाना
तुमसे मिलकर तुमको है बताना

जब से तुझे देखा, दिल को कही आराम नहीं
मेरे होठों पे एक तेरे सिवा कोई नाम नहीं
अपना भी हाल तुम्हारे जैसा है साजन
बस याद तुझे करते हैं और कोई काम नहीं
बन गया हूँ मैं, तेरा दीवाना
धीरे धीरे से दिल को चुराना

धीरे-2 से मेरी ज़िन्दगी में आना, धीरे-2 से दिल को चुराना
तूने भी अक्सर मुझको जगाया रातों में
और नींद चुरायी मीठी मीठी बातों में
तूने भी बेशक़ मुझको कितना तड़पाया
फिर भी तेरी हर एक अदा पे प्यार आया
आजा आजा अब कैसा शर्माना

धीरे-2 से दिल को चुराना, धीरे-2 से मेरी ज़िन्दगी में आना

तुमसे प्यार हमें है कितना जान-ए-जाना
तुमसे मिलकर तुमको है बताना

धीरे-2 से मेरी ज़िन्दगी में आना (2)

लगे हाथ झारखंड में रांची और हिंदपीढ़ी की भी धीरे जय बोल ही लें। चोरी चुपके पता

नहीं कौन कहां क्या गुल खिला रहा है कि सारे राज्य की स्थिति सुधर रही है तो रांची में

यह सुधरने का नाम भी नहीं ले रही। दूसरी तरफ कुछ लोगों की ऐय्याशी देखकर तो यही

दोहा याद आने लगा है कि अजगर करे ना चाकरी पंछी करे ना काम, दास कबीरा कह गये

सबके दाता राम। सुबह उठे एक बार माल टानकर खाना बंटने वाले इलाके में पहुंच गये।

दोपहर को दो ठिकानों से झोला में भरकर खाना लिया। गाड़ी से सूखा राशन भी मिल चुका

है। अब चिंता किस बात की।

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