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शरीर से दूरी रखिये मन से नहीं जनाब दिल आपस में जोड़े रखिये

  • सोशल डिस्टेंसिंग का अर्थ सामाजिक दूरी नहीं होता है

  • कुष्ठ रोगियों के प्रति नजरिया अब भी नहीं बदला

  • यह वायरस ऊंच नीच देखकर हमला नहीं करता

  • लाश से संक्रमण नहीं हो, इसका पूरा इंतजाम

डा शरण की कलम से
(लेखक रांची के सुपरिचित चिकित्सक हैं)

रांचीः शरीर से दूरी बनाकर संक्रमण से बचना ही दरअसल सोशल डिस्टेंसिंग हैं। लेकिन

वर्तमान दौर में ऐसा भी नजर आ रहा है कि इस डिस्टेंसिंग के अर्थ लोगों ने सामाजिक दूरी

बनाये रखना मान लिया है। यह सोच पूरी तरह गलत है। हमें इसके लिए अपनी प्राचीन

सामाजिक परंपराओं को याद रखना चाहिए। किसी भी रोग और विशेषकर महामारी को

हमारा समाज हमेशा से ही दैवी आपदा या प्रकोप ही मानता रहा है। इतने सारे बदलाव

हमारे समाज में आये हैं, शिक्षा का स्तर बढ़ा है लेकिन अब भी यह धारणा पूरी तरह से ग‌ई

नहीं है। अभी तक कुष्ठ रोगियों के प्रति हमारे समाज का रवैया सुधरा नहीं है। यह आश्चर्य

का विषय है कि जैसे जैसे कोविड का प्रकोप बढ़ता जा रहा है, इन रोगियों के प्रति समाज

का रवैया भी बदलता जा रहा है। कितना बदनसीब था वह डाक्टर जो मरीजों का इलाज

करते करते खुद मौत के मुंह में चला गया और उसका समाज उसकी लाश को दो गज

ज़मीन देने को तैयार नहीं था। इस रोग की रोकथाम के लिए सारी दुनिया में सामाजिक

दूरी बनाये रखने की सलाह दी जा रही है। दिक्कत यह है कि काफी संख्या में लोग इस

शब्द को इसके शब्दार्थ में ले रहे हैं। आज कहीं कहीं यह हालत हो ग‌ई है कि कुछ कुछ

आवासीय कॉलोनियों में निवासियों को सुबह कैम्पस में घूमने से मना कर दिया गया है।

कुछ वृद्ध दम्पति जिन्हें बरसों से घूमने की आदत रही है, उनका स्वास्थ्य खराब हो रहा है।

कुछ मानसिक रोगी जो ठीक हो रहे थे फिर से बीमार हो रहे हैं। ऐसा लगता है कि अगर

अकेले रह रहे किसी वृद्ध की तबियत रात को खराब हो जाये, तो शायद कोई मददगार ना

मिले।

छोटा परिवार होने से संख्या बल की परेशानी अलगदूसरे राज्यों में फंसे लोगों को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दी बड़ी राहत

संयुक्त परिवार तो पहले ही बिखर चुके थे अब जो छोटा परिवार बचा है वह भी इस लटक

डाउन में लाचार। जरूरत पड़ने पर चार कंधे मिल जायेंगे, इसका भी विश्वास नहीं रह गया

है। आवश्यकता मात्र इतनी सी है कि सुरक्षा के पूरे उपायों के साथ ही दूसरों की सहायता

करें। विशेषज्ञों ने साफ कहा है कि बॉडीबैग में बन्द लाश को जमीन में दस फीट नीचे

दफनाने पर आस पास संक्रमण फैलने की कोई संभावना नहीं है। दफनाने का काम भी

बेचारे सरकारी कर्मचारी ही करते हैं पूरी प्रतिरोधक किट पहन कर। उसी तरह यह भी

स्पष्ट है कि शव को जलाने के बाद राख से संक्रमण की कोई संभावना नहीं है, इसलिए

अस्थि विसर्जन आदि करने में कोई खतरा नहीं है। मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कहना

चाहता हूं कि सामाजिक दूरी सही नारा नहीं है। इस बीमारी से लड़ने के लिए सही नारा

होना चाहिए, सामाजिक सौहार्द्र और शारीरिक दूरी। संकट के समय में सामाजिक

सम्बन्धों का मजबूत होना और अधिक आवश्यक है। बिना किसी आवश्यक कार्य के घर

से बाहर नहीं निकलना ही श्रेयस्कर है लेकिन किसी की मदद करने के लिये पूरी सुरक्षा के

बावजूद भी अपने घर के दरवाजे ना खोलना सामाजिक बंधनों को हमेशा के लिये नुकसान

पहुंचा सकता है।

शरीर से दूरी आगे शायद एक आदत सी बनेगी

हां, अगर आपको सर्दी, खांसी, बुखार हो तो आपको घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए। यह

संक्रमण हवा से नहीं फैलता। सही मास्क सही तरह से पहन कर निकलें और गज भर

शारीरिक दूरी बनाये रखें , किसी भी सतह को छूने के बाद सैनेटाइजर या साबुन से हाथ

साफ करें तो संक्रमण की संभावना नहीं के बराबर रह जाती है। जिन लोगों को संक्रमण की

संभावना सबसे अधिक है, जैसे स्वास्थ्य कर्मचारी, पुलिस के सिपाही, सफाई कर्मचारी

आदि, वे रोज घर से बाहर निकल कर आपकी सेवा में लगे हैं। बाल्कनी में खड़े हो कर

थालियां या तालियां बजाने से आपकी जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती। इनके प्रति आदर का

भाव होना आवश्यक है। हमें धीरे धीरे काम पर लौटना होगा। अपनी सुरक्षा का पूरा ख्याल

रख कर काम पर वापस लौटना होगा। शारीरिक दूरी बनाये रखनी होगी। हाथों को बार बार

साबुन से धोना होगा, स्वच्छता से रहने की आदत डालनी होगी। हां, एक बात और। नीम

हकीमों की सलाह पर ना जायें। हमारे और दुनिया भर के वैज्ञानिक लगे हुए हैं वैक्सीन

और इलाज खोजने में। हम अवश्य सफल होंगे। तब तक भाईचारा बनाये रखें

और शरीर से दूरी भी।

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