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कश्मीर पर हम अपनी सोच पर ही कायम रहे यही बेहतर होगा







कश्मीर पर नये सिरे से चर्चा होने लगी है। अब नये स्वरुप में हमारे बीच

आ रहा है। पूर्व में लिये गये फैसले के मुताबिक अब जम्मू कश्मीर का

इलाका तीन हिस्सों में विभाजित होने के बाद प्रशासनिक स्तर पर अलग

अलग काम करने लगेगा।

इस बीच नये सिरे से राजनीतिक चमकाने के लिए हर कोई अलग अलग

किस्म के बयान दे रहा है। इस पूरी बयानबाजी में अबतक यह स्पष्ट नहीं

हो पा रहा है कि दरअसल कश्मीर की वास्तविक स्थिति क्या है।

ऐसा इसलिए भी है कि पूरे देश के अब तक कश्मीर को काटे रखा गया है।

पर्यटकों और आम भारतीय नेताओं को जहां जाने की इजाजत नहीं है वहां

विदेशी राजनयिक दौरा कर रहे है। यह अच्छी बात है कि इन कूटनीतिज्ञों

ने वहां का दौरा करने के बाद भारत के पक्ष में बयान दिया है। लेकिन

इनलोगों के स्वदेश लौट जाने के बाद कश्मीर पर इनके क्या बयान आते हैं,

उन्हें देखना समझना ज्यादा जरूरी होगा। लेकिन इन विदेशी राजनयिकों के

इस दौरे ने भारत के अंदर भी नये सिरे से राजनीतिक बयानबाजी का नया

दौर प्रारंभ करने का अवसर अवश्य प्रदान कर दिया है।

कश्मीर पर विरोधी दल भी समझदारी नहीं दिखा रहे

कई विरोधी दलों ने इसके बारे में अपनी अपनी राय दी है और केंद्र सरकार

के इस फैसले को गलत बताया है। कांग्रेस ने इसे देश की संप्रभुता पर चोट

करार देने में जरा सी देर नहीं की। जाहिर है कि सभी दल इस कश्मीर मुद्दे

को भी राजनीतिक तौर पर अपने पक्ष में भूनाने की कोशिशों में लगे हैं।

कुल मिलाकर पूरे घटनाक्रम में इस फैसले के पक्ष और विपक्ष में आने वाले

बयानों में आम कश्मीरी कहीं भी शामिल नहीं है।

कश्मीर के पत्रकार भी इनदिनों इस किस्म के सरकारी प्रतिबंधों का

सामना कर रहे हैं। इस वजह से वहां के घटनाक्रमों के बारे में सही

स्थिति का पता नहीं चल पा रहा है। लेकिन पड़ोसी देश पाकिस्तान में

चल रही गतिविधियों से यह स्पष्ट है कि कश्मीर के मुद्दे पर भारत सरकार

का यह फैसला उसके लिए परेशानी खड़ी करने वाला साबित हुआ है।

पाकिस्तान को अपने इलाके यानी पाक अधिकृत कश्मीर सहित अन्य प्रांतों

में अधिक स्वायत्तता और बेहतर नागरिक सुविधाओं के साथ साथ चल रहे

अलगाववादी आंदोलनों से डर लगता है। कुछ मामलों में छनकर जो सूचनाएं

आयी हैं, उसके मुताबिक कश्मीर में हो रहे बदलावों की वजह से पाकिस्तान के

अंदर भी सुधार की मांग होने लगी है। पूर्व में लिये गये फैसले के तहत अब

जम्मू और कश्मीर अलग होने के साथ साथ लद्दाख का इलाका भी इस विशेष

राज्य की भौगोलिक परिस्थिति से बाहर आ चुका है। यह एक पुरानी मांग थी,

जिसकी पूर्ति से कमसे कम लद्दाख के लोगों को पूरे भारत के साथ जुडऩे का

पर्याप्त अवसर प्राप्त होगा।

अलगाववादी आंदोलनों का सच सामने आ चुका है

अब कश्मीर में अब तक चलने वाले अलगाव वादी आंदोलनों की स्थिति

पर गौर करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इन आंदोलनों को हवा देने के

पीछे पाकिस्तान की सक्रिय भूमिका रही है। वह कश्मीर के मुद्दे पर भारत को

लगातार एक छाया युद्ध के दायरे में बांधे रखना चाहता है।

अब भारतीय सेना के कड़े रुख की वजह से पाकिस्तानी सेना को वे अवसर

भी नहीं मिल रहे हैं, जो पहले भारत की सहनशीलता का लाभ उठाया करते

थे। इस बात से भी कोई इंकार नहीं कर सकता है कि वहां कड़ाई होने की

वजह से आतंकवादी घटनाओं में कमी आयी है। इससे और कुछ नहीं तो

वहां जारी हिंसा अगर कम हो रही है तो यह कोई छोटी बात नहीं है।

कश्मीर के कुछ इलाके दशकों से इस आतंकवाद की आग में झुलसते

आये हैं। इसलिए अब भी कश्मीर की समस्या को राजनीतिक चश्मे

से नहीं बल्कि इंसानी समझ के तहत आंका और देखा जाना चाहिए।

पाकिस्तान सच्चाई से कब तक मुंह मोड़ता रहेगा

पाकिस्तान लाख दलील दे लेकिन यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है

कि कश्मीर और विभाजन के पूर्व पाकिस्तान भी भारत का ही अभिन्न

अंग था। अब पाकिस्तान के अलग होने के वक्त जो भौगोलिक सीमा

तय हुई थी, उसे समझते हुए पाकिस्तान को तो पाक अधिकृत कश्मीर

का इलाका भी चुपचाप भारत को सौंप देना चाहिए क्योंकि यह ऐतिहासिक

सत्य है कि देश विभाजन के वक्त कश्मीर के इस इलाके पर पाकिस्तान

ने जबरन कब्जा किया था। उस वक्त भारतीय परिस्थितियां इतनी

विकट थी कि उसे वापस नहीं लाया जा सका क्योंकि भारत उस दौर में

युद्ध झेलने की स्थिति में नहीं था। लेकिन पाकिस्तान को यह अच्छी

तरह समझ लेना चाहिए कि अब परिस्थितियां पूरी तरह अलग है।

इसलिए कश्मीर पर अपनी अपनी राग अलापने वालों को कश्मीर की

आम जनता को जेहन में रखते हुए ही उनके विकास और फायदे के लिए

जो उचित हो, उसका समर्थन करना चाहिए।



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