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कश्मीर सीमा पर फिर से भारत-पाकिस्तान युद्ध जैसी परिस्थिति

कश्मीर सीमा पर भारत और पाकिस्तान की सेना के बीच टकराव जैसी स्थिति है।

वहां अक्सर ही इस किस्म की घटनाएं होती रहती हैं।

जब कभी इस किस्म की गोलीबारी में सैनिक हताहत होते हैं

तो यह समझा जाना चाहिए कि स्थिति गंभीर है। इस बार भी भारतीय सैनिकों ने पाक अधिकृत कश्मीर के

कुछ खास केंद्रों पर गोले बरसाये हैं।

इस कार्रवाई के बारे में भारत ने औपचारिक तौर पर कहा है कि जहां  यह गोले बरसाये गये हैं, वे दरअसल पाक

अधिकृत कश्मीर के वैसे ठिकाने हैं, जहां आतंकवादी कैंप था। इतना कुछ होने के बाद भी पाकिस्तान अपने

आतंकवाद प्रेम को क्यों नहीं छोड़ पा रहा है, इसे अब आर्थिक तौर पर समझने की जरूरत है।

इस बात से अब कोई इंकार नहीं कर सकता कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था अत्यंत दयनीय स्थिति में है।

लेकिन पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का असली नियंत्रण पाकिस्तान की सेना के हाथों में हैं,

इस बात को पाकिस्तान खुले तौर पर स्वीकार नहीं करता। पाकिस्तान की सेना ने अपने लंबे सैनिक शासन

और तानाशाही राज के दौरान वैसे मुखौटे तैयार किये हैं, जो औद्योगिक गतिविधियों से जुड़े हुए हैं।

ऐसे संगठन और कंपनियों वहां औद्योगिक उत्पादन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। जाहिर तौर पर दुनिया इन

कंपनियों का नाम जानती है लेकिन यह राज पाकिस्तानी की सेना छिपाये रहती है कि दरअसल इन कंपनियों

पर परोक्ष नियंत्रण पाकिस्तान की सेना का है। अब अर्थव्यवस्था के डांवाडोल होने के बाद पाकिस्तान की

जनता जब सवाल पूछने लगती है तो इन सवालों के दूसरी दिशा में मोड़ देने का सबसे आसान और कारगर कदम

होता है भारत का विरोध।

कश्मीर सीमा पर यह आक्रामकता धारा 370 हटाने के बाद से

कश्मीर से धारा 370 हटाये जाने को पाकिस्तान अपने लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बना चुका है।

जाहिर है कि इससे यह भी साफ हो गया है कि अब तक कश्मीर सीमा से सटे इलाके में जितने भी राष्ट्र

विरोधी आंदोलन चला करते थे, उन्हें पाकिस्तान का समर्थन प्राप्त था।

अब जैसे जैसे कश्मीर के इलाके में आतंकवादी घटनाओं में कमी आ रही है वैसे वैसे पाकिस्तान की बेचैनी बढ़ती

जा रही है। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस सच को अब भारत के अलावा पाकिस्तान और दुनिया के

अन्य देशों को भी समझ लेना चाहिए। जिस आतंकवाद के समर्थन के मुद्दे पर पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध

के कगार पर पहुंच चुका है, उसे यूं ही छोड़ देना उसके लिए आंतरिक चुनौती बन जाएगा।

इस बात को पाकिस्तान के हुक्मरान भी अच्छी तरह समझते हैं।

लिहाजा ऐसी किसी भी परिस्थिति के उत्पन्न होने पर भारत के कश्मीर  सीमा में तनाव पैदा करना समस्या को

दूसरी तरफ मोड़ देने का एक आजमाया हुआ तरीका है। इस बार भी पाकिस्तान की तरफ से कुछ ऐसी ही चाल

चली जा रही है। दूसरी तरफ इस घटना से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि पाकिस्तान ने अपने इलाके में आतंकवादियों

को संरक्षण और प्रोत्साहन देना अब भी बंद नही किया है।

दरअसल यह पाकिस्तान की सेना के छद्म युद्ध का एक हथियार है, जिसके बिना वह भारत के अंदर तो क्या अपने

पाक अधिकृत कश्मीर के अलावा बलूचिस्तान सहित अन्य इलाकों में चल रहे लोकतंत्रवादी आंदोलनों को नियंत्रित

नहीं कर पायेगी। दूसरी तरफ भारत में भी चुनाव में जब स्थानीय मुद्दे ज्यादा हावी होने लगे और सरकार के पास

ऐसे प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर नहीं हो तो राष्ट्रप्रेम के नाम पर लोगों का ध्यान भटकाना एक आसान तरीका है।

भारत में भी यह नुस्खा कारगर चुनावी लाभ दिलाता आ रहा है

शायद यह भी एक वजह है कि दो राज्यों में होने वाले चुनाव के दौरान भारत-पाकिस्तान की कश्मीर सीमा पर होने

वाली गोलीबारी का चुनावी प्रचार ज्यादा किया जा रहा है। कश्मीर सीमा पर अक्सर ही इस किस्म की घटनाएं होती

रहती हैं। सिर्फ चुनाव के मौके पर इनका प्रचार कुछ ज्यादा होता है।

यह भी देश की जनता का ध्यान भटकाने का नया नुस्खा है, जो अब तक कारगर साबित हो रहा है।

दरअसल देश विभाजन के वक्त जो परिस्थितियां उत्पन्न हुई थी, उसके जख्मों को कुरेदना राजनीतिक लाभ दिलाने

जैसा ही है। हाल के दिनों में विरोध के स्वर को दबाने के लिए भी इस तरकीब को लगातार आजमाया जा रहा है।

अब देश की जनता महंगाई, रोजगार और अन्य चुनावी वादों पर सवाल खड़ी करे, उससे पहले ही राष्ट्रीय चुनौती का

सवाल उनके सामने रखा गया है। जाहिर है कि ऐसे मौके पर हर समझदार भारतीय राष्ट्रीयता को ही प्राथमिकता देगा।

इससे चुनावी गाड़ी तो पार लग सकती है। लेकिन असली सवाल तब भी यही रहेगा कि जिन सवालों से अभी सरकार

और नेता बचते फिर रहे हैं, चुनाव के बाद भी वे सवाल यथावत ही रहेंगे। इस प्रश्नों के समाधान का कौन सा तरीका

आजमाया जा रहा है, इस पर आज नहीं तो कल सरकार को अपनी बात रखनी ही होगी।

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