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जेपीएससी क्या व्यापम बन कर मानेगा




जेपीएससी अपने गठन काल से ही विवादों से घिरा रहा है। अलग झारखंड राज्य बने 21 साल बीत चुके है। लेकिन इन 21 सालों में बीपीएससी से बना जेपीएससी शिशु अवस्था से बाहर नहीं आया है। अब लगता है कि मध्य प्रदेश का व्यापम बन कर ही रह जाएगा झारखंड का जेपीएससी।




इस बात की संभावना इस कारण प्रबल हो रही है क्योंकि व्यापम राजनीतिक अखाड़ा बन कर घोटाले का अड्डा बना था। ठीक इसी तरह झारखंड का जेपीएससी भी फिलहाल राजनीति का अखाड़ा बना हुआ है। सत्ता पक्ष जेपीएसी की दुर्दशा के लिए विपक्ष को जिम्मेदार बता रहा है तो विपक्ष जेपीएसी के दुर्दशा के लिए वर्तमान सरकार को।

जिस प्रकार व्यापम की हर नियुक्ति प्रक्रिया को संदेह की दृष्टि से देखा जाता था कुछ वहीं परिस्थिति जेपीएससी को लेकर है। जेपीएससी की लगभग हर नियुक्तियों को झारखंड हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक चुनौती दी गई है। जेपीएससी परीक्षा के परीक्षार्थियों ने परीक्षा को लेकर कई प्रकार के सवाल उठाये हैंजिन सवालों का जवाब देने वाला कोई नहीं है।

समस्या यह है कि झारखंड का सत्ता पक्ष या फिर विपक्ष जेपीएससी में राज्य हित ना देख कर अपना हित ही तलाशते रहते हैं, जिसका खामियाजा झारखंड के युवाओं को भोगना पड़ रहा है। झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य की रिक्तियों के लिए कई बार सीधे तौर पर राज्य सरकार को और जेपीएससी को जिम्मेदार बताया है

इसके बाद भी जेपीएससी को सुधारने की पहल किसी के द्वारा नहीं की गई है। यहां चौंकाने वाला तथ्य यह है कि रोजगार के मामले में हमसे पीछे चलने वाले राज्य बिहार की बीपीएससी आज की तारीख में जेपीएससी से तीन परीक्षा आगे चल रही है।

जेपीएससी तो अब बिहार से भी पिछड़ गयी है

हाल में ही बीपीएससी के जो परिणाम आये हैं इससे यह साफ पता चलता है कि झारखंड के युवावर्ग से काफी संख्या में युवा बीबीएससी के द्वारा बिहार में नियुक्त हुए हैं। इन परिस्थितियों से सबसे अधिक किसी को अगर कोई नुकसान हो रहा है तो वह है हमारे राज्य झारखंड को।

जिस युवा शक्ति से हमारे राज्य का विकास होना चाहिए वहीं युवा शक्ति अब किसी दूसरे राज्य का भविष्य तय करेगी। ऐसा नहीं है कि जेपीएससी की स्थिति बीते कुछ सालों में खराब हुई है। जेपीएससी के गठन के बाद से ही इसको लेकर जो भी तब की सरकारों ने नियुक्तयां की है वह कहीं न कहीं राजनीतिक नियुक्तियां दिखाई पड़ती है।




जिस कारण जेपीएससी अपने प्रारंभिक समय से ही राजनीतिक पहचान बना चुका है। रांची महिला कॉलेज से सीबीआई के द्वारा जेपीएससी के माध्यम से नियुक्त महिला प्रोफेसरों की गिरफ्तारी इस बात का जीता-जागता उदाहरण है। वर्तमान में एक बार फिर बीते दिनों हुई जेपीएससी की परीक्षा को लेकर छात्र आंदोलनरत हैं, इसकी ओट में खूब राजनीति भी हो रही है।

लेकिन इस सबके बीच कोई फंसा हुआ है तो वह है युवा जो अपने भविष्य को संवारने के लिए जेपीएसी के द्वारा आयोजित परीक्षा में शामिल होता है, लेकिन उसका भविष्य तब बर्बाद हो जाता है जब एक ही हॉल के 20 से अधिक छात्रों को लगभग बराबर नम्बर आते हैं और उनकी नियुक्तियां होती हैं, जब 6 साल में जेपीएससी परीक्षा परिणाम जारी करता है।

जरूरी है कार्य पद्धति में बदलाव की। जेपीएससी में होने वाले नियुक्तियों में पारदर्शी होने की जिससे जेपीएसी के द्वारा जो भी परीक्षा का आयोजन किया जाए वह पूरी तरह से पारदर्शी हो। जेपीएससी परीक्षा में शामिल छात्रों के साथ यही समस्या हो रही है।

उसकी विश्वसनीयता अब संदेह के घेरे में जा चुकी है

छात्रों के मन में जेपीएससी को लेकर जो सालों की छवि बनी हुई है, उससे वे भयभीत होते रहते हैंऔर हर परीक्षा के बाद जोरदार हंगामा होता है, एक बार फिर मामला हाई कोर्ट तक जाता है और नियुक्ति प्रक्रिया पुन: अनिश्चित समय के लिए फिर से लटक जाती है। जिससे युवा वर्ग निराश हो जाता है।

सबसे अधिक समस्या यह है कि राज्य के प्रशासन या फिर शासन वर्ग के द्वारा झारखड गठन के बाद से लेकर अबतक एक बार भी जेपीएससी को सुधारने की इच्छा शक्ति नहीं दिखाई गई है।

अगर यह स्थिति अब भी रही तो आने वाले कुछ सालों में जेपीएससी व्यापम बनने की रहा पकड़ ही लेगा और भस्मासुर की तरह अपना तो विनाश कर ही लेगा राज्य के युवाओं के लिए भी एक टीस बनकर रह जायेगा।

जरूरत है बिना किसी स्वार्थ के राज्य सरकार विपक्ष और प्रशासन में लगे अधिकारी को जेपीएससी को बचाने की। दूसरी तरफ इस आयोग पर प्रारंभ से ही हावी भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद के दर्जनों उदाहरण मौजूद होने तथा हर परीक्षाफल के प्रकाशन के बाद उसमें व्याप्त खामियों के उजागर होने की वजह से ऐसा संदेह होता है कि प्रारंभ से ही जो दीमक यहां घर कर गया था, वह दूर नहीं हुआ है और सत्ता चाहे किसी की भी हो, किसी ने ईमानदारी से उसे दूर करने का प्रयास भी नहीं किया है।



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