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पिगासूस की जासूसी की वजह से पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या







  • सारी सरकारें पर्दा डालने की पूरी कोशिशों में जुटी हुई
  • साइबर जासूस नजर रखे थे पत्रकार के साथी पर
  • हत्यारों को मिल गयी थी खशोगी की पूर्व सूचना
  • ट्विटर के जरिए बनायी गयी थी पैठ
रजत कुमार गुप्ता

रांचीः पिगासूस स्पाईवेयर की वजह से सऊदी के बागी पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या हुई है।

दरअसल सऊदी अरब सरकार उसकी कलम से परेशान थी।

इसी वजह से उनकी हर गतिविधि पर नजर रखने के लिए इजराइल की कंपनी द्वारा तैयार

इस पिगासूस स्पाईवेयर का इस्तेमाल किया जा रहा था।

अब क्रमवार तरीके से पिगासूस की अनैतिक और आपराधिक इस्तेमाल के संबंध में जो तथ्य सामने आये हैं

उसमें यह सबसे बड़ा खुलासा है।

मजेदार स्थिति यह है कि जैसे जैसे स्वतंत्र साइबर विशेषज्ञ इसके राज खोल रहे हैं,

वैसे वैसे अनेक देशों की सरकार इस पर पर्दा डालने का भरसक प्रयास कर रही है।

साइबर विशेषज्ञ इसके नये नये राज खोल रहे हैं

लेकिन इंटरनेट के इस युग में सूचनाओं को दबाने की यह साजिश बार बार विफल हो रही है।

अब नई जानकारी यह है कि सऊदी अरब की राजसत्ता के खिलाफ लिखने वाले

पत्रकार जमाल खशोगी को चुप कराने के लिए उसकी हत्या की साजिश रची गयी थी।

चूंकि वह तुर्की में रहता था इसलिए बाहर से उसकी हर गतिविधि पर नजर रखना संभव नहीं था।

अमेरिका के मीडिया से जुड़े होने की वजह से सऊदी एजेंसियां सीधे उसके मोबाइल पर जासूसी करने से बच रही थी।

इसके लिए पिगासूस स्पाईवेयर की मदद ली गयी थी।

अमेरिकी एजेंसियों की नजर से बचने के लिए सीधे जमाल खशोगी के मोबाइल पर कोई घुसपैठ नहीं की गयी।

एक मानवाधिकार कार्यकर्ता को इसके लिए निशाना बनाया गया था।

यह मानवाधिकार कार्यकर्ता जमाल के संपर्क में रहता था।

इसलिए जब उसके मोबाइल पर जासूसी होने लगी तो उसके जरिए ही जमाल खशोगी

कब क्या कर रहा है, उसकी सूचनाएं भी सऊदी अरब तक पहुंचने लगी थी।

पिगासूस बता रहा था कि खशोगी अपने दोस्त से क्या बात करते हैं

साइबर विशेषज्ञ मानते हैं कि इसी वजह से पिगासूस के जरिए सऊदी अरब की एजेंसियों को

पहले से इस बात की जानकारी हो गयी थी कि जमाल खशोगी कब तुर्की में सऊदी अरब के दूतावास में जाने वाला है।

इसी पूर्व सूचना की वजह से वहां पहले से पेशेवर लोगों को उसकी हत्या के लिए भेजा जा सका था।

अब मामले में पिगासूस के नाम की चर्चा आने के बाद अमेरिकी की सिटीजंस लैब ने उस मानवाधिकार

कार्यकर्ता के मोबाइल पर हुई जासूसी के तार खंगाले हैं। जिससे इस राज का पर्दाफाश हुआ है।

अब तो इसके बारे में एक के बाद एक खुलासा होता चला जा रहा है।

सऊदी अरब के युवराज की आलोचना करने के बाद सरकार की आंखों की किरकिरी बने

उमर अब्दुल अजीज ने वहां से भागने के बाद कनाडा में राजनीतिक शरण ली थी।

सबसे पहले उन्हें ही अपनी मोबाइल पर आये एक लिंक पर संदेह हुआ था।

एक मोबाइल के लिंक पर संदेह से शुरु हुई थी जांच

जिसकी बाद में अमेरिकी प्रयोगशाला सिटीजेंस लैंब में जांच की गयी थी।

इस मामले में सऊदी पत्रकार जमाल खशोगी के तार इस वजह से भी जुड़ते नजर आ रहे हैं

क्योंकि अब्दुल अजीज उनके करीबी लोगों में से एक थे।

वैज्ञानिक जांच में सिटिजंस लैब ने यह खोज निकाला था इसी दौरान अब्दुल अजीज का

मोबाइल हैक कर लिया गया था।

हैक होने की  वजह से वह जमाल खशोगी से क्या कुछ संदेश आदान प्रदान कर रहे हैं अथवा बात कर रहे हैं,

इसे जासूसी कान सुन रहे थे।

जांच के प्रारंभ होने की खबर सार्वजनिक होते ही कई अन्य देशों के सरकार विरोधियों ने भी

अपने मोबाइल हैक होने की शिकायत कर दी।

इस जांच के जारी रहने के क्रम में सऊदी अरब के एक अन्य सरकार विरोधी सामाजिक कार्यकर्ता

अहमद मंसूर का भी मोबाइल हैक किये जाने की जानकारी मिली।

पत्रकार का यह साथी भी सऊदी सरकार का विरोधी था

चूंकि मंसूर घोषित तौर पर सऊदी युवराज के प्रवल विरोधी माने जाते थे।

इसलिए सभी पक्षों का ध्यान आकृष्ट होने लगा।

जांच में पता चला है कि इस सामाजिक कार्यकर्ता को जो खास संदेश मिला था, उसकी गहन जांच की गयी।

मंसूर को यह संदेश दिया गया था कि सऊदी अरब की जेलों में बंद सामाजिक कार्यकर्ताओं को उत्पीड़न किया जा रहा है।

इसकी जांच में पूरा राज भी खुलकर सामने आ गया।

दो वर्षों तक इसकी गहन छान-बीन में 45 देशों में इस स्पाईवेयर के इस्तेमाल की पुष्टि होती चली गयी।

इन देशों में भारत के अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश, ब्राजिल और हांगकांग भी शामिल हैं।

इसके अलावा मैक्सिको सहित कई अमेरिकी महाद्वीप के देशों में भी इस किस्म की जासूसी किये जाने की पुष्टि हो गयी।

इसकी गंभीरता तब और बढ़ी जबकि अंतर्राष्ट्रीय संगठन अमनेस्टी इंटरनेशल ने

सऊदी अरब में फोन हैक किये जाने की शिकायत की।

अमनेस्टी इंटरनेशनल की शिकायत की जांच में पाया गया कि छह सौ विभिन्न छोर तक

सारी सूचनाएं पहुंचायी जा रही है।

यह सारे छोर किसी न किसी बेव साइट के नाम पर थे लेकिन सारे फर्जी थे।

इसकी भी और जांच हुई तो सभी के तार सीधे सीधे पिगासूस से जुड़ते चले गये।

उस वक्त अमनेस्टी इंटरनेशनल ने सार्वजनिक तौर पर इसकी शिकायत की थी कि

इजरायल के गुप्तचर उनके संगठन की गतिविधियों पर अनैतिक तरीके से नजर रख रहे हैं।

अमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी इजरायल की शिकायत की थी

विवाद बढ़ने के बाद एनएसओ कंपनी की तरफ से बार बार यही सफाई दी गयी कि

इस स्पाईवेयर का विकास आतंकवादी गतिविधियों और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों पर

नजर रखने के लिए किया गया है। इसे किसी भी गैर सरकारी संगठन को उपलब्ध भी नहीं कराया गया है।

इसका मकसद सिर्फ अपराध और आतंकवाद रोकना है।

लेकिन घटनाक्रम यह साबित करते चले गये कि दरअसल सरकारों ने इसका इस्तेमाल

सिर्फ राजनीतिक विरोध को दबाने के लिए किया है।

इस स्पाईवेयर की जांच से जुड़े सिटिजंस लैब के वैज्ञानिक जॉन स्कॉट रेलटन ने कहा कि

यह दरअसल स्पाईवेयर को खरीदने वाले देशों के द्वारा किया गया दुरुपयोग ही है।

अब इस पिगासूस कंपनी और उसकी गतिविधियों के साथ साथ उसके स्वामित्व पर भी सवाल उठ खड़े हुए हैं।

एनएसओ कंपनी का गठन वर्ष 2010 में किया गया था।

इसके संस्थापन सालेव हुलिया और ओमरी लावी को ही इस स्पाई वेयर को विकसित किये जाने का श्रेय दिया जाता है।

स्मार्ट मोबाइल को हैक करने की क्षमता वाले इस तकनीक को कुछ ऐसे तरीके से बनाया गया था कि

यह किसी भी पद्धति से चलने वाले मोबाइल में अपनी पैठ बना सकता है।

सभी देशों की सरकारों को पिगासूस की इन सूचनाओं का जबाव देने में परेशानी

अब जो जानकारी अन्य देशों की सरकारों के लिए परेशानी खड़ी कर रही है

वह इस कंपनी के स्वामित्व के रिश्ते हैं।

एक ब्रिटिश कंपनी नोपालपिना फर्म के पास कंपनी के सत्तर प्रतिशत शेयर हैं।

यह बदलाव पिछले फरवरी महीने में हुआ है।

दूसरी तरफ यह भी स्पष्ट हो चुका है कि इस एनएसओ के सह संस्थापक हुलिया दरअसल इजरायल सेना के एक पूर्व अधिकारी हैं।

अब मामला सार्वजनिक होने के बाद पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या के लिए ट्विटर को भी जिम्मेदार ठहराया गया है।

इस बारे में एक और मामला दर्ज किया जा चुका है।

ट्विटर पर आरोप है कि गोपनीयता की शर्त का उसने उल्लंघन किया।

इस गड़बड़ी की वजह से संबंधित व्यक्ति, उसके परिवार और तमाम गतिविधियां सार्वजनिक हो गयी।



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