झामुमो और झाविमो अध्यक्ष का जन्मदिन मनाया गया

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संवाददाता

रांची: झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन और झाविमो सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी। शिबू सोरेन शुक्रवार को 75 साल के हो गये, वहीं बाबूलाल मरांडी 61 साल के।

झामुमो और झाविमो के कार्यकतार्ओं ने अपने-अपने पार्टी सुप्रीमो का जन्मदिन धूमधाम से मानने की तैयारी कर रखी थी।

जन्मदिन के बहाने 2019 में होनेवाले चुनाव पर दोनों राजनीतिक धुरंधरों की नजर है।

शिबू सोरेन और बाबूलाल मरांडी झारखंड के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं और दोनों अपनी-अपनी पार्टी के प्रमुख भी हैं।

शिबू सोरेन और बाबूलाल मरांडी का राजनीतिक सफर संघर्ष से भरा रहा है।

राजनीतिक उतार-चढ़ाव से भरा राजनीतिक जीवन का यह साल दोनों नेताओं के लिए खास है।

नेमरा से आदिवासियों के हक की लड़ाई से अपनी राजनीति का सफर शुरू करते हुए शिबू सोरेन मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री बने।

झारखंड में शिबू सोरेन गुरुजी और दिशोम गुरु के नाम से प्रसिद्ध हैं।

वहीं, बाबूलाल मरांडी का शिक्षक से राजनेता बनने का सफरनामा भी कम दिलचस्प नहीं है।

झारखंडी जनता और राज्य की राजनीति के लिए यह नाम कई मायनों में अहम है।

झारखंड की जनता जब शोषण, दमन और उत्पीड़न का शिकार हो रही थी, तब झारखंडी अवाम की आवाज बनकर उभरे नामों में से एक नाम शिबू सोरेन का था।

शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को तत्कालीन बिहार के रामगढ़ स्थित नेमरा गांव में हुआ था।

इनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के स्कूल में हुई।

शिबू सोरेन अपने गांव में महाजनों द्वारा हो रहे शोषण को देख आक्रोशित हो उठे।

महाजनी प्रथा को खत्म करने के लिए इन्होंने जोरदार आंदोलन चलाया और गरीब आदिवासियों के मसीहा बन गये।

शिबू सोरन राज्य के पहले नेता रहे, जिनके आंदोलन का विस्तार संतालपरगाना से छोटानागपुर तक रहा।

झामुमो अध्यक्ष शिबू सोरेन ने रात्रि पाठशाला चलाकर बीहड़ में जलायी शिक्षा की ज्योति

शिबू सोरेन का आंदोलन नेमरा से शुरू होकर टुंडी के पोखरिया आश्रम पहुंचा,

जहां गुरुजी ने रात्रि पाठशाला को शुरू कर बीहड़ में शिक्षा की ज्योति जलाने का प्रयास किया।

साथ ही, धनकटनी आंदोलन के माध्यम से मजदूर-किसानों को गोलबंद किया।

आंदोलन यहीं नहीं रुका, पूरे झारखंड के लोग इस कारवां से जुड़ते चले गये।

04 फरवरी 1972 को धनबाद के गोल्फ ग्राउंड में एके राय, बिनोद बिहारी महतो के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा की बुनियाद रखी।

यहीं से एक बार फिर अलग राज्य की मांग को बल मिला।

2005 में पहली बार मुख्यमंत्री बने गुरुजी

शिबू सोरेन पहली बार दो मार्च 2005 में दस दिन के लिए मुख्यमंत्री के पद पर काबिज हुए।

दूसरी बार 27 अगस्त 2008 से 18 जनवरी 2009 तक 144 दिन के लिए मुख्यमंत्री के रूप में

झारखंड की बागडोर अपने हाथों में थामा, लेकिन यह सरकार भी लंबे समय तक नहीं चल सकी।

तमाड़ उप-चुनाव में गोपाल कृष्ण पातर उर्फ ह्वराजा पीटर से नौ हजार से अधिक मतों से हार गये और झामुमो की सरकार गिर गयी।

बाबूलाल के लिए खास है उम्र का 62वां वसंत

झारखंड की राजनीति में बाबूलाल मरांडी का 62वां जन्मदिन खास है।

इस वर्ष होनेवाले झारखंड विधानसभा और लोकसभा चुनाव में पार्टी को अपने बल पर फिर से शिखर तक पहुंचाने की चुनौती है।

बाबूलाल मरांडी के चेहरे की चमक नये हुंकार की ओर इशारा कर रही है।

बाबूलाल मरांडी को उनकी 61वीं सालगिरह पर बधाई देनेवालों का तांता सुबह से लगा रहा।

झाविमो कार्यकतार्ओं ने पार्टी के केंद्रीय कार्यालय में पहुंचकर उनका जन्मदिन समर्पण दिवस के रूप में मनाया।

शाम में बाबूलाल मरांडी ने संत मिखाइल ब्लाइंड स्कूल के बच्चों के साथ मिलकर केक काटा।

इस मौके पर बाबूलाल मरांडी ने अपने शिक्षक से मुख्यमंत्री तक के जीवनकाल एवं राजनीतिक संघर्षों को कार्यकतार्ओं के साथ साझा किया।

बाबूलाल संघ के पुराने कार्यकर्ता रह चुके हैं।

आरएसएस से उन्होंने राजनीति में पदार्पण किया।

राज्य का पहला मुख्यमंत्री बनने का गौरव भी इन्हें प्राप्त है।

2006 में भाजपा से अलग होने के बाद बाबूलाल मरांडी ने झाविमो का गठन किया।

दो बार लोकसभा सीट से सांसद भी रहे।

संघ परिवार से जुड़ने के बाद बढ़ता गया राजनीतिक कद

बाबूलाल मरांडी का जन्म गिरिडीह जिले के तिसरी प्रखंड के कोदाईबांग गांव में 11 जनवरी 1958 को हुआ था।

गांव से ही स्कूली शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद गिरिडीह कॉलेज से इंटरमीडिएट किया और फिर स्नातक की पढ़ाई की।

बाबूलाल मरांडी इस दौरान शिक्षक भी बने। एक बार शिक्षा विभाग में उन्हें कुछ काम पड़ गया।

जब वह कार्यालय पहुंचे, तो उनसे रिश्वत मांगी गयी।

इस घटना से दु:खी बाबूलाल ने इस्तीफा दे दिया और सक्रिय रूप से राजनीति में आ गये और वह संघ परिवार से जुड़े।

यहीं से उनका राजनीतिक कद बढ़ता चला गया।

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