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निजी स्कूलों की फीस के मुद्दे पर झामुमो और कांग्रेस आमने सामने

  • शिक्षा मंत्री ने शुल्क माफ करने की बात कही

  • कांग्रेस ने कहा दबाव बनाना उचित नहीं

  • अभिभावकों ने कांग्रेस का विरोध किया

रांची : निजी स्कूलों में शिक्षण शुल्क के मुद्दे पर सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर ही मतभेद

हैं। राज्य के शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो ने जहां निजी स्कूल प्रबंधकों से लॉकडाउन

अवधि का शिक्षण शुल्क और बस भाड़ा नहीं लेने का अनुरोध किया है। वहीं कांग्रेस ने कहा

है कि निजी स्कूलों पर शुल्क माफ के लिए दबाव बनाना उचित नहीं। वैसे अभी तक

सरकार ने इस संबंध में कोई आदेश जारी नहीं किया है लेकिन कई बार इस बात को निजी

स्कूल प्रबंधकों के सामने रखा है कि लॉकडाउन अवधि का शुल्क माफ किया जाए। इस को

लेकर स्कूल प्रबंधन और अभिभावक भी असमंजस की स्थिति में हैं। इधक कांग्रेस ने

सरकार के निर्णय का विरोध करते हुए कहा है कि लॉकडाउन के दौरान निजी स्कूल

प्रबंधन पर शुल्क नहीं लेने का दबाव बनाने या इस तरह का कोई आदेश जारी करने से

राज्य में संचालित करीब 20 हजार निजी स्कूलों के समक्ष संकट की स्थिति उत्पन्न हो

गयी है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता आलोक कुमार दूबे ने कहा कि निजी स्कूलों पर

ट्यूशन शुल्क माफ करने का दबाव बनाना उचित नहीं है, लेकिन निजी स्कूलों को

डेवलपमेंट शुल्क, कंप्यूटर शुल्क और लाइब्रेरी शुल्क को माफ करना चाहिए। परंतु यह

सर्वथा अनुचित होगा कि निजी स्कूल प्रबंधन पर पूरी तरह से ट्यूशन शुल्क माफ करने

का दबाव बनाया जाए, ऐसा होने पर इन स्कूलों में कार्यरत करीब तीन लाख शिक्षक और

शिक्षकेत्तर कर्मियों के समक्ष संकट की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। निजी स्कूलों के

शिक्षकों और शिक्षकेतर कर्मचारियों के वेतन भुगतान पर आंच आने से लाखों लोग

प्रभावित होंगे और एक नई समस्या उत्पन्न हो जाएगी एवं साथ ही साथ स्कूल के

अस्तित्व पर भी गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है जिस पर गंभीरता से विचार करने की

जरुरत है।

निजी स्कूलों के फीस पर दोनों की अलग अलग राय

प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता ने बताया कि निजी स्कूल प्रबंधन को अपने शिक्षक और अन्य

कर्मचारियों के बीच वेतन भुगतान के अलावा प्रत्येक महीने आधारभूत संरचना तथा 1

दिन के लिए भी एक बड़ी राशि खर्च करनी होती है। इसके अलावा स्कूल बंद रहे या खुले

रहे इससे स्कूल प्रबंधन को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है इस दौरान भी सभी निजी स्कूलों

प्रबंधन द्वारा अपने कर्मचारियों और शिक्षकों के वेतन का भुगतान किया जाता है। श्री दुबे

ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा सूबे के 20 हजार से अधिक निजी स्कूल प्रबंधन को कोई

अनुदान या वित्तीय सहायता नहीं दी जाती है, इन स्कूलों द्वारा अपने सारे खर्चों का वहन

ट्यूशन शुल्क के माध्यम से किया जाता है। उन्होंने कहा कि क्वालिटी एजुकेशन और

गरीब बच्चों के लिए सीट आरक्षित रखने का दबाव स्कूल प्रबंधन पर पहले से ही होता है,

ऐसे में राज्य सरकार को भी इन स्कूल प्रबंधन की समस्याओं पर सहानुभूति पूर्वक विचार

करना चाहिए और इसके लिए जरूरी खर्चे तथा वित्त पोषण में सहयोग करने की भी

आवश्यकता है ताकि राज्य के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलती रहे।

कांग्रेस के बयान का अभिभावकों ने किया विरोध

इधर कांग्रेस द्वारा निजी स्कूलों के समर्थन में शिक्षण शुल्क माफ नहीं किये जाने के

बयान का अभिभावकों ने पुरजोर किया है। उनका कहना है कि लॉकडाउन की अवधि में

छात्र घरों में हैं। अधिकांश अभिभावकों के काम-काज, रोजी-रोटी के धंधे बंद है। खाने के

लाले पड़े हुए हैं। ऐसे में शिक्षा मंत्री द्वारा निजी स्कूलों से इस दौरन तीन महीनों का

शिक्षण शुल्क माफ किये जाने का अनुरोध करना काबिले तारीफ है। लोग उनके इस बयान

का स्वागत कर रहे हैं। वहीं कांग्रेस अपनी ओछी हरकत से बाज नहीं आ रही है और इस

संकट की घड़ी में भी अभिभावकों को मुसीबत में डालने का काम कर रही है। अभिभावकों

ने कहा कि शिक्षा मंत्री का बयान स्वागत योग्य है और हम झारखंडी उनके साथ हैं।

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