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झारखंड के बजट से तय होगा राज्य सरकार की सोच की दिशा

झारखंड के बजट के लिए ही विधानसभा का सत्र आहूत किया गया है। इस सत्र में

स्वाभाविक तौर पर राजनीतिक जोर आजमाइश होगी। यह भारतीय लोकतंत्र की प्रक्रिया

का एक हिस्सा है। इसके आसार सत्र प्रारंभ होने के पहले से ही नजर आने लगे थे। अब

विधानसभा के इस राजनीतिक कुश्ती के बीच बजट के पेश किये जाने से यह तय होगा कि

वर्तमान सरकार राज्य को किस दिशा में और किस रास्ते से आगे ले जाना चाहती है

बजट पर चर्चा के हाल के दिनों में अधिक महत्व मिलने का एक कारण दिल्ली का

विधानसभा चुनाव भी है। देश की राजधानी के इस विधानसभा चुनाव में आम आदमी

पार्टी ने फिर से ऐतिहासिक सफलता अर्जित की है। इस चुनाव के प्रचार के दौरान अनेक

अवसरों पर आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने

दिल्ली के बजट की चर्चा की थी। उन्होंने कहा था कि पिछले पांच वर्षों में दिल्ली का 30

हजार करोड़ का बजट अब 60 हजार करोड़ पर पहुंच गया है।

इस क्रम में उन्होंने यह भी कहा था कि पहले जहां दिल्ली के घाटे का बजट होता था अब

यह मुनाफे का बजट है। इसके बाद के घटनाक्रमों को समझे तो दिल्ली के उप मुख्यमंत्री

मनीष सिसौदिया केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मिले थे। विकास योजनाओं की

औपचारिक जानकारी के बीच यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि दरअसल दिल्ली ने केंद्रीय

करों में अपना हिस्सा मांगा है। इसी बात पर पहली बार यह जानकारी भी सामने आयी है

कि देश की राजधानी को केंद्र सरकार से पिछले काफी समय से कोई कोष आवंटित नहीं

किया गया है।

झारखंड के बजट से पता चलेगा पहले कितना पैसा मिला

याद रहे कि महाराष्ट्र के राजनीतिक उथलपुथल के बीच देवेंद्र फडणवीस के रातों रात

मुख्यमंत्री बनने के दौरान ही यह बात भी चर्चा में आयी थी कि उन्होंने मुख्यमंत्री पद का

शपथ लेने के बाद सबसे पहला काम यह किया कि दिल्ली के कोष का पैसा जो करीब

चालीस हजार करोड़ रुपया था वह केंद्र सरकार के खाते में स्थानांतरित कर दिया।

झारखंड में भी कोष की वास्तविक स्थिति क्या है, यह भी आने वाले दिनों में पेश होने

वाला बजट स्पष्ट कर देगा। इस क्रम में इस बात की परख भी हो जाएगी कि पिछले पांच

वर्षों में रघुवर दास की सरकार को केंद्र से केंद्रीय करों में कितना हिस्सा मिला है और राज्य

के अपने आंतरिक संसाधनों से राज्य ने कितना राजस्व कमाया है।

यह जानना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि पिछली सरकार में अनेक मंचों से राज्य सरकार

के मुखिया यानी रघुवर दास बार बार यह कहते रहे हैं कि केंद्र ने झारखंड के लिए खजाने

का मुंह खोल रखा है। वास्तव में कितना धन पिछले पांच वर्षों में झारखंड को मिला है, इस

बारे में आने वाले बजट में निश्चित तौर पर चर्चा होगी। यदि रघुवर दास का दावा सही

साबित होता है तो निश्चित तौर पर वर्तमान सरकार को भी इस क्रम को आगे जारी रखने

के लिए औऱ परिश्रम करना पड़ेगा।

दूसरी तरफ अगर केंद्र ने पिछले पांच वर्षों में झारखंड को उनके हिस्से का पूरा पैसा नहीं

दिया है तो रघुवर दास सहित भाजपा नये सिरे से सवालों के घेरे में खड़ी हो जाएगी। साथ

ही इस बजट से यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि हेमंत सोरेन की सरकार की वास्तविक

प्राथमिकताएं क्या है।

राज्य की वास्तविक वित्तीय स्थिति का खुलासा भी कर देगा यह

अब तक की हेमंत सोरेन की सोशल मीडिया पर हुई घोषणाओं को आधार मानें तो वह उन

तमाम पुरानी समस्याओं को प्राथमिकता के आधार पर निपटाना चाहते हैं, जिनकी वजह

से राज्य में बड़े बड़े आंदोलन और युवा आक्रोश पैदा होते रहे हैं। लेकिन इन तमाम मांगों

को पूरा करने के लिए आर्थिक संसाधनों की भी जरूरत है। दूसरी तरफ अनेक मदों में केंद्र

सरकार सहित अन्य सरकारी प्रतिष्ठानों के पास झारखंड सरकार का जो बकाया है, उसकी

वसूली भी एक बड़ी चुनौती है। इसलिए झारखंड के आने वाले बजट का महत्व अधिक हो

गया है। राज्य के वित्त मंत्री बजट के अलावा अन्य मुद्दों पर बात करने के लिए सहज

उपलब्ध है। लेकिन दरअसल में झारखंड का अगला बजट कैसा होगा, इस बारे में कोई

संकेत नहीं मिलते हैं। क्या वर्तमान सरकार भी पूर्व की भांति घाटे के बजट के आधार पर

आंकड़ों की औपचारिकता पूरी करेगी अथवा यह वास्तविकता आधारित बजट होगा, यह

भी नई सरकार के लिए बहुत बड़ा सवाल बनकर उभर चुका है। झारखंड में किन योजनाओं

को राज्य सरकार अपनी प्राथमिकता सूची में रखना चाहती है, यह भी इसी बजट से बहुत

हद तक स्पष्ट हो जाएगा। साथ ही हेमंत सोरन की सरकार को यह कमाल दिखाने की

चुनौती भी है कि वह राज्य के राजस्व संग्रह को किस तरीके से बेहतर बनाने की दिशा में

काम कर पाते हैं।


 

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