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झारखंड का विधानसभा चुनाव, सोशल मीडिया पर प्रचार का जोर







  • इस प्लेटफॉर्म पर भाजपा का मुकाबला झाविमो ने
  • सोशल मीडिया के जरिए रखी जा रही है बात
  • आजसू और झामुमो भी कांग्रेस से काफी आगे
  • नये वोटरों को अपने पाले में करने की कोशिश
संवाददाता

रांचीः झारखंड का विधानसभा चुनाव असली मुद्दों से भटकता हुआ सोशल मीडिया के प्रचार पर टिक गया है।

वैसे आम लोगों की नजर में इस किस्म के प्रचार मनोरंजन और टाइम पास के साधन तो हैं

लेकिन इससे आम वोटर अब राय नहीं बनाने जा रहा है।

सभी दलों के चुनावी घोषणा पत्रों में जिन बातों की चर्चा की गयी है, उन पर चौक चौराहों पर बहस हो रही है।

इस किस्म की बात-चीत से राजनीतिक दलों के छोटे कार्यकर्ता भी अच्छी तरह वाकिफ हैं।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सबसे ज्यादा प्रचार भाजपा का नजर आ रहा है।

फेसबुक सहित अन्य तमाम प्लेटफॉर्मों पर भाजपा का प्रचार अपनी तरफ के अलावा कुछ खास

वेबसाइटों के जरिए भी चल रहा है।

वैसे इन वेब साइट्स की पहले ही पहचान होने की वजह से अब उन पर पाठकों की रूचि कम रह गयी है।

दूसरी तरफ पुरानी अथवा तोड़-मरोड़कर पेश किये गये तथ्यों का प्रचार भी इस बार पाठकों को

अपनी तरफ आकर्षित नहीं कर पा रहा है।

सोशल मीडिया पर प्रचार के इस दौर में अप्रत्याशित तौर पर झारखंड विकास मोर्चा और बाबूलाल मरांडी भाजपा को लगभग बराबर की टक्कर देते नजर आ रहे हैं।

इसलिए माना जा रहा है कि जनसभाओं के माध्यम से अपनी बात रखने के अलावा भी झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री लगातार इस सोशल मीडिया के जरिए अपनी बातों को जनता तक पहुंचाने में दूसरों के मुकाबले ज्यादा कारगर रहे हैं।

झारखंड का विधानसभा चुनाव नये मतदाता नई चुनौती

इस किस्म के चुनावी हथियारों का इस्तेमाल अन्य राजनीतिक दल भी कर रहे हैं।

लेकिन इस दौर में कांग्रेस सबसे पिछड़ती हुई नजर आ रही है।

आजसू और झामुमो ने युवाओं को अपनी तरफ बांधे रखने के लिए निरंतर इस हथियार का उपयोग करना जारी रखा है।

इसमें कांग्रेस के चंद प्रत्याशी निश्चित तौर पर सक्रिय नजर आ रहे हैं लेकिन यह उनका व्यक्तिगत प्रयास भर है।

वैसे कुछ इलाकों में कांग्रेस प्रत्याशी को इस प्रचार का लाभ भी मिलता दिखने लगा है।

इस प्रचार की आवश्यकता के बारे में साइबर विज्ञापन के विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बार भी नये मतदाताओं की संख्या बढ़ी है।

लिहाजा इन नये वोटरों के पास कोई पुराना राजनीतिक आधार नहीं होने की वजह से वे इसी सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी प्राथमिकताएं निर्धारित करने का काम कर सकते हैं।

ऐसे में जो राजनीतिक दल सबसे अधिक बेहतर तरीके से अपनी बात स्मार्ट फोन का इस्तेमाल करने वाले

इस युवा वर्ग तक अपनी बेहतर पहुंच बना पायेगा, उसे निश्चित तौर पर इस चुनाव में अधिक फायदा होगा।



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