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झारखंड चुनाव में नरेंद्र मोदी के अलावा और क्या कुछ

झारखंड चुनाव में भाजपा के पास सबसे मजबूत पक्ष नरेंद्र मोदी का
होना है। निश्चित तौर पर वह अब भी देश के सबसे लोकप्रिय नेता है।
इस लिहाज से उन्हें सुनने भीड़ आती है। लेकिन विधानसभा चुनाव में
जो स्थानीय तत्व होते हैं, उनके बारे में भाजपा अब तक कुछ स्पष्ट
तौर पर तय नहीं कर पा रही है।

नरेंद्र मोदी के बाद बाकी सारा बोझ सीधे सीधे रघुवर दास के कंधे पर
डालकर बाकी नेता चैन की सांस ले रहे हैं। इससे चुनाव की गाड़ी
निश्चित तौर पर आगे बढ़ पायेगी, इसकी उम्मीद करना बेमानी है।

विधानसभा चुनाव कुछ ऐसा होता है, जहां रात भर में पांसा पलट
जाया  करता है। अभी भाजपा निश्चित तौर पर नरेंद्र मोदी की वजह से
बढ़त की  स्थिति में आयी है, लेकिन उस बढ़त को बनाये रखने की
जिम्मेदारी तो कमसे कम नरेंद्र मोदी की नहीं है।

पार्टी के राष्ट्रीय नेता भी इसमें कोई मदद नहीं कर सकते। प्रदेश स्तर
पर और खास तौर पर हर विधानसभा सीट पर जब तक मिलकर यह
प्रयास  जारी नहीं रखा जाएगा, भाजपा मतदान के दिन तक इस
माहौल को कायम नहीं रख पायेगी। दूसरी तरफ अन्य दलों और
निर्दलीय प्रत्याशी बिना नरेंद्र मोदी के ही जिन स्थानीय मुद्दों की बात
कर रहे हैं, उन्हे साफ तौर पर नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।

यह सिर्फ झारखंड चुनाव की ही बात नहीं है। महाराष्ट्र और हरियाणा
में भी राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों पर भाजप को बढ़त मिली थी लेकिन
स्थानीय मुद्दों के आधार पर अन्य दलों ने भी अपनी ताकत में बढ़ोत्तरी कर ली है।

झारखंड चुनाव में स्थानीय नेतृत्व की जिम्मेदारी

इसलिए झारखंड चुनाव में भाजपा के स्थानीय नेतृत्व की जिम्मेदारी
अभी बढ़ गयी है। झारखंड में भाजपा के लिए यह चुनौती इसलिए भी
अधिक कठिन है क्योंकि इस बार उसे सम्मिलित विपक्ष का सामना
करना पड़ रहा है।

पिछले विधानसभा चुनाव में ऐसी स्थिति नहीं थी। लिहाजा भाजपा को
अपने पूर्व रिकार्ड के मतदान प्रतिशत को बढ़ाये बिना सफलता नहीं
मिल सकती, इस साधारण तथ्य को आम कार्यकर्ता भी सरलता के
साथ समझता है। झारखंड चुनाव में भाजपा के लिए एक चुनौती
सरयू राय का मैदान में होना भी है। दरअसल यह मुद्दा सिर्फ किसी
व्यक्ति का नहीं है। बल्कि सरयू राय ने भाजपा मंत्रिमंडल में कैबिनेट
मंत्री रहते हुए जो मुद्दे उठाये थे, उनसे प्रत्यक्ष तौर पर जुड़ा हुआ है।

लिहाजा मतदाताओं का पढ़ा लिखा वर्ग अपने फैसले के पहले इस मुद्दे
पर भी निश्चित तौर पर विचार विमर्श कर अपना फैसला लेगा।

दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी की जनसभा में भारी भीड़ होने के बाद भी हत्या
के एक आरोपी को श्री मोदी के बगल में खड़ा होने की स्थिति किसके
निर्देश पर पैदा की गयी थी, यह भी बड़ा सवाल बनकर उभरा है।

भाजपा के पलामू के नेताओं के लिए इस सवाल का उत्तर देना कठिन
हो चुका है। दरअसल यह चंद ऐसे मुद्दे हैं, जो भाजपा के अंदर से ही
आग बनकर उभरे हैं।

लिहाजा घर के चिराग से लगी इस आग को बूझाने की जिम्मेदारी भी
भाजपा की अकेले की है। लेकिन भाजपा के नाम पर हर जिम्मेदारी
रघुवर दास पर डाल दिये जाने के पीछे भी एक सोच दिखायी देती है।

पार्टी के अंदर अब भी मौजूद है गुटबाजी

इससे स्पष्ट हो जाता है कि रघुवर दास के नेतृत्व के सवाल पर
भाजपा के अनेक नेता अब भी एक राय नहीं है।

इस बीच कल शाम  तक महाराष्ट्र में बहुमत के परीक्षण का परिणाम
भी सामने आने जा रहा है। वर्तमान परिदृश्य में जो कुछ खुली आंखों से
नजर आ रहा है, उसके मुताबिक बहुमत परीक्षण में भाजपा की पराजय निश्चित है।

कानूनी दांव पेंच की बात अलग कर दें तो विधायकों का बहुमत वहां के
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के खिलाफ ही नजर आ रहा है। अदालत का
का फैसला आने के पहले कल शाम ही इसका सार्वजनिक प्रदर्शन भी कर दिया गया है।

जो कुछ विधायक किन्हीं कारणों से लापता हो गये थे, वे सब के सब
इस खेमा में वापस लौट चुके हैं।

विपक्ष में 162 विधायकों का सामूहिक उपस्थिति का सीधा नतीजा यही निकला है कि 288 विधायकों की इस  विधानसभा में देवेंद्र
फडणवीस के साथ बहुमत नहीं है।

ऐसे में महाराष्ट्र का फैसला आते ही विरोधी दल इसे भी एक चुनावी
मुद्दा बनायेंगे। इस मुद्दे पर जनता को संतुष्ट करने अथवा भरोसा
दिलाने की जिम्मेदारी अकेले नरेंद्र मोदी अथवा रघुवर दास की नहीं है।

इसलिए झारखंड चुनाव में किसी एक के प्रयास से चुनावी वैतरणी पार
करने की कोशिश पूरी पार्टी का लुटिया भी डूबो सकती है, इस बात को
याद रखना होगा।

वर्तमान में बढ़त दिलाने में नरेंद्र मोदी भले ही कामयाब हो गये हैं लेकिन
मतदान होने तक इस बढ़त को बनाये रखने की जिम्मेदारी श्री मोदी
की तो कतई नहीं है।

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