fbpx Press "Enter" to skip to content

मानव तस्करी के मामले में झारखंड और उत्तर पूर्व का रिकार्ड सबसे खराब

  • देश के 25 प्रतिशत मामले इन्हीं राज्यों के

  • सब कुछ जानकर भी सरकार ने नहीं की कार्रवाई

  • मानव तस्करी के यह आंकड़े भी सरकार के ही हैं

  • झारखंड के ऐसे इलाके भी दर्ज हैं इसकी रिकार्ड में

भूपेन गोस्वामी

गुवाहाटी : मानव तस्करी के मामले में झारखंड और उत्तर पूर्व सहित असम देश के ऐसी

तस्करी केंद्र के रूप में उभरा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो 2020 की रिपोर्ट में कहा गया

है कि 1494 मामलों के साथ, झारखंड और उत्तर पूर्व राज्य सहित असम पूरे भारत में

तस्करी के कुल मामलों का 25% मामलों में है।यह मानव के लिए मुख्य चुनौती है लेकिन

किसी भी सरकार ने पूरे भारत में तस्करी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है।यह

झारखंड, बिहार पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर भारत में बाल शोषण और बाल अधिकारों के

उल्लंघन के मामलों में भारी वृद्धि को दर्शाता है। राज्य में सबसे अधिक बाल तस्करी

(1317) मामले हैं, जो राष्ट्रीय आंकड़े का 42% है। रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्तर पूर्व के

राज्यों में असम, मणिपुर, मिजोरम और अरुणाचल में मानव तस्करी के केंद्र हैं। झारखंड

में हर 10 लाख की आबादी पर 12,700 लोग मानव तस्करी के शिकार हो रहे हैं। इनमें से

80 फीसद से ज्यादा लोग इस चंगुल से निकल नहीं पाते हैं। यह आकड़ा नीति आयोग की

रिपोर्ट ने जारी किया है। नीति आयोग की सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल की रिपोर्ट के

अनुसार, इस मामले में झारखंड देश में चौथे स्थान पर है। पहले स्थान पर पूर्वोत्तर राज्य

मिजोरम है। यहा हर 10 लाख पर 57,400 लोगों की तस्करी होती है। दूसरी तरफ सबसे

बेहतर स्थिति अरुणाचल प्रदेश, अंडमान निकोबार और नागालैंड की है। यहा एक भी

मानव तस्करी के मामले सामने नहीं आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, देश में प्रति 10 लाख की

आबादी में औसतन 0.46 फीसद यानी 4600 लोग मानव तस्करी का शिकार होते हैं। वहीं

झारखंड में यह आकड़ा 1.27 फीसद है। यानी हर साल 12,700 लोग इसके शिकार होते हैं।

इस प्रकार राज्य का औसत राष्ट्रीय औसत से 0.81 फीसद ज्यादा है।

मानव तस्करी के लिए चलाये जाने वाले अभियानों पर सवाल

ऐसे में मानव तस्करी को लेकर राज्य में चलाए जा रहे अभियान पर भी सवालिया निशान

खड़े होते हैं। राज्य में संथाल समेत सिमडेगा, गुमला, खूंटी व अन्य मामलों में मानव

तस्करी के मामले सामने आते हैं। यहा दलाल बच्चों के साथ-साथ लड़कियों को भी बाहर

काम दिलाने के नाम पर बहला-फुसला कर ले जाते हैं। इनसे महानगरों में काम कराया

जाता है। इसके लिए बकायदा कई प्लेसमेंट एजेंसी भी सक्रिय हैं। वहीं कुछ बच्चों को

राज्य के दूसरे शहरों में भी काम कराया जाता है। आए दिन किसी न किसी रेलवे स्टेरशन

से पुलिस की टीम तस्करी के लिए ले जाए जा रहे बच्चों को रेस्क्यू भी करती है।

टॉप-10 राज्य हर दस लाख पर सबसे ज्यादा तस्करी

मिजोरम – 57,400,गोवा – 36,800, दिल्ली – 22,200, झारखंड – 12,700,

राजस्थान – 12,100, तेलंगाना – 11,800, मणिपुर – 10,300, असम – 9500,

आध्र प्रदेश – 6500, महाराष्ट्र- 5500,

टॉप-10 राज्य जहां हर दस लाख पर सबसे कम तस्करी

जम्मू-कश्मीर – 100, उत्तर प्रदेश – 300, पंजाब – 300, गुजरात – 300,

हरियाणा – 800, तमिलनाडु – 2,800, उत्ताराखंड – 3,600

तीन राज्यों में एक भी मानव तस्करी के मामले दर्ज नहीं, इनमें नागालैंड, अरुणाचल

प्रदेश और अंडमान निकोबार शामिल हैं।रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल ही में कोरोना

वायरस संकट के दौरान मूल्यांकन और पोस्ट आपदा की निगरानी की गई, जिसमें पाया

गया कि कोरोना वायरस संकट ने आजीविका के लिए परिवार के सदस्यों के प्रवासन को

प्रभावित किया है और बच्चों की तस्करी एजेंटों द्वारा की जा रही है। चाय बागान का बंद

होना इस क्षेत्र को बाल श्रम और तस्करी के लिए उपजाऊ बनाने का एक और कारण है।इस

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि ‘बच्चों की निरक्षरता’ का कारण, श्रम और यौन

शोषण के लिए बाल तस्करी और युवा लड़कों और लड़कियों के प्रवास संभावित हस्तक्षेप

के मुद्दों के रूप में सामने आते हैं।

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
More from HomeMore posts in Home »
More from अपराधMore posts in अपराध »
More from उत्तर पूर्वMore posts in उत्तर पूर्व »
More from झारखंडMore posts in झारखंड »
More from ताजा समाचारMore posts in ताजा समाचार »
More from राज काजMore posts in राज काज »

2 Comments

... ... ...
%d bloggers like this: