जापान का तीसरा रोवर यान भी उल्कापिंड पर सकुशल उतरा

जापान ता तीसरा अंतरिक्ष यान उतरा
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  • दो यान पहले से ही उल्कापिंड पर काम कर रहे

  • वहां से आंकड़े और चित्र भेज रहे हैं यान

  • सौरमंडल की संरचना कैसे हुई पर हो रही खोज

  • 2020 में मिट्टी के नमूनों के साथ लौटेगा यान

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः जापान का तीसरा स्वचालित रोवर यान भी उल्कापिंड पर उतर गया है।

रियूगु नामक इस उल्कापिंड पर जापान ने अपने हाईबासा अभियान के तहत पहले ही दो इसी किस्म के यान उतारे थे।

अभी उल्कापिंड पर जापान के इस अंतरिक्ष अभियान के तहत तीन यान काम कर रहे हैं।

इन तीनों यानों को अलग अलग आंकड़ा एकत्रित करने के लिए उस पर उतारा गया है।

जापान की अंतरिक्ष एजेंसी जाक्सा ने बताया कि अंतरिक्ष यान से यह तीसरा यान सही समय पर अलग हो गया

और उसके नाम पर बने ट्विटर एकाउंट से उसके उतरने की घोषणा भी कर दी गयी।

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उल्कापिंड पर उतरने के बाद अंतरिक्ष केंद्र का इस यान के साथ संपर्क भी स्थापित होने की सूचना अब तक नहीं दी गयी है।

इसके पूर्व भी अभियान के लिए अंतरिक्ष में भेजे गये यान से दो रोवर उसी उल्कापिंड पर उतारे गये थे।

दोनों ने उतरने के बाद वहां की तस्वीरें भी भेजी थी। इन दोनों यानों से मिले आंकड़ों का वैज्ञानिक अध्ययन कर रहे हैं।

इस उल्कापिंड को सौर मंडल का अन्यतम प्राचीन उल्कापिंड समझा गया है।

इस वजह से वैज्ञानिक यह मान रहे हैं कि इसकी संरचना के बारे में पता चलने से यह समझना आसान होगा कि

पूरे सौरमंडल की संरचना का वैज्ञानिक कारण क्या क्या रहा है।

जापान ने अपने इस अंतरिक्ष अभियान का नाम हाईबासा -2 रखा है।

जापान के इस तीसरे यान का वजन दस किलो है

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इस अभियान दल के नेता माकाटो योशिकावा ने बताया कि इस तीसरे यान का वजन दस किलोग्राम है।

यह एक बॉक्स के आकार का है। इसे वहां के तरंगों, खनिज की संरचना एवं तापमान के आंकड़े एकत्रित करने के लिए उतारा जा रहा है।

साथ ही यह तीसरा यान वहां की चुंबकीय शक्ति का भी नियमित आकलन करेगा।

ताकि उसके आधार पर इसकी संरचना के बारे में और जानकारी मिल सके।

इससे दस दिन पूर्व उतारे गये दोनों यान नियमित तौर पर वहां से तस्वीरें और आंकड़े भेज रहे हैं।

इन सभी यानों को उछलने की क्षमता से युक्त कर भेजा गया है।

जिसका मकसद पूरे उल्कापिंड का घूम घूमकर आंकड़े एकत्रित करना है।

वहां का गुरुत्वाकर्षण बहुत कम होने की वजह से यह यान एक बार में करीब 50 फीट ऊंची छलांग लगा सकते हैं

तथा हवा में 15 मिनट तक तैर सकते हैं। इसी तकनीक के आधार पर वे एक स्थान से दूसरे स्थान तक का सफल तय करेंगे।

सभी में अपने अपने काम के लिए सेंसर के साथ साथ कैमरे भी लगाये गये हैं।

ताकि वैज्ञानिक इन कैमरों की नजर से भी उल्कापिंड की वास्तविक स्थिति को अपनी आंखों से भी देख सकें।

अपने सभी काम पूरा करने के बाद अपने रोबोटिक बांह की मदद से

यह यान वहां की मिट्टी के नमूने एकत्रित कर वर्ष 2020 में पृथ्वी पर वापस लौट आयेगा।

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