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इसके डैनों का फैलाव बीस फीट था फॉसिल्स से पता चला

  • 40-50 मिलियन वर्ष पहले थी इनकी आबादी
  • उनकी लंबी चोंच के साथ मजबूत दांत भी थे
  • डायनसोर काल की समाप्ति के बाद खत्म हुए
  • अंटार्कटिका इलाके में वास करता था विशाल पक्षी
राष्ट्रीय खबर

रांचीः इसके डैनों का फैलाव विशाल था। प्राचीन अवशेषों पर लगातार चल रहे शोध का

नतीजा अब जाकर निकल पाया है। अति प्राचीन पृथ्वी की इस पक्षी के पंखों का फैलाव

करीब छह मीटर यानी बीस फीट हुआ करता था। वर्तमान में अलबाट्रोस प्रजाति की

पक्षियों के डैनों का फैलाव करीब साढ़े ग्यारह फीट हुआ करता है। फॉसिल्स के अवशेषों पर

हुए शोध से माना जा रहा है कि इस प्रजाति की पक्षी इस धरती पर करीब 40 से 50

मिलियन वर्ष पहले हुआ करती थी। जो बाद में क्रमिक विकास के दौर में कहीं विलुप्त हो

गयी है। इस प्रजाति की पक्षी का वैज्ञानिक नाम पेलांगोरनिथिड रखा गया है। यह

अंटार्कटिका के इलाके का वाशिंदा था। उसके दो फॉसिल्स 1980 में मिले थे। तब से इन

अवशेषों के आधार पर शोध चल रहा था। शोधकर्ताओं ने उसके पैर की हड्डी और जबड़े के

निचले भाग को सही तरीके से परिभाषित कर लिया है। इसके बाद ही कैलिफोर्निया

विश्वविद्यालय के शोधकर्ता इसकी कड़ियों को एक एक कर जोड़ रहे थे। बीच में यह काम

किन्हीं कारणों से बंद हो गया था। लेकिन पांच साल पहले फिर से पीटर क्लोस ने इसपर

अपनी टीम के साथ काम प्रारंभ किया था। जब उन्होंने काम प्रारंभ किया था तो वह छात्र

थे और वहां के म्युजियम के लोग उसे म्युजियम का चूहा कहा करते थे जो हमेशा वहां

मंडराता रहता था। इसी कोशिश में क्लोस ने सान डियागो के एशले पाउस्ट के साथ

मिलकर उन चीजों को खोज निकाला, जो पूर्व में किन्हीं कारणों से शोध करने वालों की

नजर से छूट गये थे। वैसे इस काम में बीजिंग के चीनी अकादमी के थॉमस स्टिधाम ने भी

उनका सहयोग किया।

इसके डैनों का विस्तार दोबारा शोध से स्थापित हुआ

नये सिरे से किये गये इसी प्रयास का नतीजा निकला कि वे इस फॉसिल्स के आधार पर

प्राचीन काल की नई प्रजाति की इस पक्षी को खोज पाये हैं। प्राचीन काल में अंटार्कटिका के

इलाके में बसने वाली यह पक्षी आकार में भी विशाल थी। इस आकार की एक और प्राचीन

पक्षी का पहले ही पता चल चुका है, जिसका नाम पेलांगगोरनिस सैंडेरसी है। उसके भी

पंखों का फैलाव 23-24 फीट हुआ करता था।

अब सब कुछ जान लेने के बाद यह अनुमान लगाया गया है कि यह पक्षी आकार में विशाल

होने की वजह से काफी वजनी भी था। इसका वजन करीब पांच सौ किलो हुआ करता था।

डायनासोर प्रजाति के उड़ने वाले पेट्रोसोरस के पंखों का फैलाव 33 फीट तक होने का पता

चल चुका है। इस शोध का यह भी नतीजा है कि पक्षियों की यह प्रजाति भी पृथ्वी से

डायनासोरों के विलुप्त होने के बहुत जल्दी अपने आप ही समाप्त हो गये।

डायनासोर के आस पास ही यह भी विलुप्त हुए थे

हो सकता है कि जिस उल्कापिंड के गिरने से पलभर में डायनासोर समाप्त हुए थे, उसी

वजह से पृथ्वी में हुए बदलाव को यह प्रजाति झेल नहीं पायी। उसकी शारीरिक संरचना को

नये सिरे से तैयार करने के बाद यह पाया गया है कि उसकी खोपड़ी करीब दो फीट लंबी

थी। लेकिन इस शोध के यह भी नतीजा है कि उस वक्त अंटार्कटिका का मौसम अभी के

जैसा नहीं था। वह एक गर्म इलाका था और समुद्रों से घिरा हुआ था। इसी वजह से यह

विशालकाय पक्षी समुद्र में भी मंडराया करते थे। लिहाजा उन्हें जमीन अथवा समुद्र से

भोजन प्राप्त करने में कोई दिक्कत नहीं होती थी। अपने पंखों की वजह से वे बड़ी आसानी

से बड़ी लंबी दूरी तक उड़ान भर सकते थे। अपनी लंबी चोंच से शिकार को पकड़ना भी

उनके लिए आसान था। उसके जबड़े की बनावट बताती है कि उसके अंदर करीब एक इंच

लंबे दांत थे जो शिकार को भोजन में तब्दील करने में उनकी मदद करते थे

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