बुद्धू बक्सा का अजीब खेल सस्ता या महंगा

अगर टीवी देखने का पैसा दे रहे हैं तो विज्ञापन की छूट भी मिले
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बुद्धू बक्सा यानी टीवी पर दिखने वाले चैनलों का खेल अब तक दर्शक समझ नहीं पाये हैं।

दूरसंचार प्राधिकार यानी ट्राई बार बार इस बारे में लोगों को जानकारी देने का

प्रयास तो कर रहा है

पर टीवी चैनल वाले इस जानकारी को आगे बढ़ने से रोक रहे हैं।

टीवी चैनलों पर लगातार अपने लाभ के विज्ञापन दिखाकर लोगों को झांसे में लेने की कोशिश जारी है।

दूसरी तरफ अनेक शहरों में केबल ऑपरेटरों ने दर्शकों के पसंदीदा चैनल बंद कर

खास समूह का पैकेज लेने की बात कहते हुए अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है।

अजीब स्थिति यह है कि जो चैनल मुफ्त में दिखाये जाते हैं,

उनका प्रसारण भी या तो बंद हैं अथवा बाधित है।

फुर्सत में टीवी पर रिमोट रिमोट खेलने से यह खेल और स्पष्ट हो जाता है।

किसी चैनल में दृश्य दिखते हैं लेकिन वे स्थिर मुद्रा में हैं।

किसी बुद्धू बक्सा में टीवी जीवंत दृश्य दिखा रहा है तो उसकी आवाज बंद है।

कुछ में आपको सिर्फ आवाज सुनायी पड़ती है पर कुछ नजर नहीं आता।

इसके अलावा जिन चैनलों के दर्शक किसी खास इलाके में नहीं के बराबर है,

वैसे चैनलों का प्रसारण ठीक ठाक चल रहा है।

केबल वालों ने भी लोगों को बुद्धू बक्सा के पर्दे पर उलझाये रखने के लिए

कुछ ऐसे चैनलों को चालू कर रखा है, जिनसे दर्शकों को यह पता चले कि वे टीवी देख रहे हैं।

लेकिन उनकी अपनी पसंद के चैनल बंद है।

डिश टीवी के माध्यम से चैनल देखने वालों को इससे कम परेशानी है

लेकिन उन्हें भी अब तक अपनी पसंद का चुनाव करने का मौका नहीं दिया गया है।

मनोरंजन चैनलों पर लगातार किसी खास चैनल समूह के

सारे पैकेज बहुत सस्ते में लेने की धूम मची हुई है।

दूसरी तरफ इन तमाम की गतिविधियों को नियंत्रित करने वाली संस्था

ट्राई क्या कह रही है, इस बारे में चैनल पूरी तरह से चुप्पी साधे हुए हैं।

दरअसल यह अपने आप में बहुत बड़ा खेल है, जिसे दर्शकों के कंधे पर रखकर खेला जा रहा है।

इसका असली मकसक सिर्फ जनता की जेब से अधिक पैसे निकालना ही है।

बड़े चैनल समूहों ने मौके की नजाकत को भांपते हुए अपने चैनलों का एक समूह बना लिया है।

अब वे सिर्फ उन्हीं समूहों की दुकानदारी कर रहे हैं।

लेकिन नियम यह कहता है कि दर्शक जो चैनल पसंद हो,

सिर्फ वही देख सकता है और अगर वे भुगतान वाला यानी पे चैनल है,

तो उसके पैसे दे सकता है।

लेकिन चैनलों को पता है कि उनके सारे चैनलों की दर्शक संख्या एक जैसी नहीं है।

लिहाजा अपने कम पसंद वाली चैनलों की बिक्री के लिए

उन्होंने चैनलों का एक गुच्छा (बूके) बनाकर दर्शकों के सामने न सिर्फ परोसा है बल्कि हर पांच मिनट बाद उनका प्रचार भी करते जा रहे है।

केबल वालों ने अपने माध्यम से दर्शकों को चैनल देखना महंगा होने की बात

पहले ही बता दी थी।

अब एक ही शहर में एक ही ऑपरेटर द्वारा संचालित चैनलों में से

कई बंद होने की वजह से स्थिति बड़ी अजीब बनी हुई है।

दर्शकों के भरोसे कारोबार करने वाले दोनों ही पक्ष यह चाहते हैं कि

ट्राई के इस नये नियम की आड़ में दर्शकों से अधिक पैसे वसूले जा सके।

जबकि ट्राई ने अपनी तरफ से स्थिति को समझते हुए दर्शकों के फायदे के लिए बेस्ट फिट प्लान भी मंजूर कर दिया है।

ट्राई की कोशिश दर्शकों को न्यूनतम खर्च पर चैनल दिखाने की है।

ट्राई ने पहले ही साफ कर दिया है कि इस नियम के लागू होने पर

फालतू का चलने वाले चैनल अपने आप ही बंद हो जाएंगे, क्योंकि उनके पास दर्शक नहीं होंगे।

लेकिन बड़े चैनल समूहों द्वारा प्रारंभ किये गये दर्जनों चैनलों के बंद होने की स्थिति में

उन चैनलों का क्या होगा, यह समझने की बात है।

एक तरफ सरकार कोशिश कर रही है कि जो मुफ्त में दिखाये जाने वाले चैनल हैं,

उन्हें न्यूनतम दर पर दर्शकों तक उपलब्ध कराया जा सके।

दूसरी तरफ सरकार की इसी कोशिश का फायदा उठाते हुए

चैनल समूह अपनी कमाई में जुटे हुए हैं।

केबल ऑपरेटरों का तर्क है कि बिना चैनलों का बूके लिये हुए

दर्शकों को अपनी पंसद के चैनल देखने को नहीं मिलेंगे।

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