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केंद्र सरकार नहीं अब नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता दांव पर




केंद्र सरकार नहीं अगर सरकार का चेहरा अगर कहें तो वह नरेंद्र मोदी ही है। अकेले

उनके चेहरे और उनकी लोकप्रियता के दम पर दो लोकसभा चुनावों में भाजपा की

नैय्या पार लगी है। वैसे सिर्फ पार लगी है कहना भी गलत होगा क्योंकि प्रचंड

बहुमत यह भी साबित करता है कि उनके आस पास भी कोई दूसरा नेता नहीं फटक

रहा है। अब भाजपा के इसी चेहरे पर दांव लगा है। इस बात को समझना सरल है कि

कृषि बिल के पीछे नरेंद्र मोदी की सोच ही काम कर रही है। किसी और की सोच रही

होती तो शायद अब तक समाधान का कोई न कोई रास्ता निकल आया होता।

लेकिन किसान आंदोलन के प्रारंभ हुए एक महीना बीत जाने के बाद भी केंद्र सरकार

की तरफ से वह संवेदनशीलता नहीं दिख रही है, जिसकी अपेक्षा कमसे कम

मतदाताओं को नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता से थी। हर विषय पर त्वरित टिप्पणी

करने वाले श्री मोदी इसी कृषि बिल पर लगातार अपनी बात रख रहे हैं लेकिन दूसरी

तरफ से किसान जो तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं, उसकी काट भाजपा के किसी नेता के

पास नहीं है। भाजपा की तरफ से लगभग हर स्तर पर किसान बिलों के समर्थन में

हर संभव प्रयास किया जा रहा है। इसके बाद भी कड़ाके की ठंड में किसानो का इस

तरीके से दिल्ली की सीमा पर बैठा रहना देश के आम मतदाताओं के बहुमत को अब

नागवार लग रहा है। कई दौर की वार्ता के बाद अब सरकार ने अपनी तरफ से पहल

करना भी छोड़ दिया है। उसके उलट अब भाजपा नेता हर स्तर पर कृषि बिलों के

फायदे गिना रहे हैं।

केंद्र सरकार नहीं नरेंद्र मोदी पर जनता ने भरोसा किया है

लेकिन इस पूरी राजनीतिक रणनीति के बीच भाजपा की तरफ से सबसे बड़ी यह

गलती यह हो रही है कि वह आम भारतीय जनमानस की सोच से दूर होती जा रही

है। आम भारतीय नागरिक सरकार की तरफ से इस किस्म की बेरुखी की उम्मीद

नहीं करता। अब तो लोग अन्ना हजारे के आंदोलन के समय कांग्रेस सरकार के

मंत्रियों के तेवर से वर्तमान सरकार के मंत्रियों के आचरण का तुलनात्मक अध्ययन

कर रहे हैं। दिल्ली के युवाओं को यह भी याद आ रहा है कि दिल्ली में अपनी सरकार

के विरोध में प्रदर्शन करते युवाओं को खुद राहुल गांधी ने अपने आवास के बाहर हो

रहे प्रदर्शन के दौरान चाय पिलायी थी। भारतीय समाज इन छोटी छोटी बातों के

आधार पर ही किसी के बारे में बडी राय कायम करता है। इस पूरे प्रकरण में अब

सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी की छवि पर दाग रहा है। वैसे भी भाजपा के पास तुरुप

का इक्का अगर कहें तो नरेंद्र मोदी ही है। उन्हें अलग कर दिया जाए तो फिर से

भाजपा की अपनी ताकत कांग्रेस के मुकाबले शायद कम हो जाएगी क्योंकि तब

वैचारिक स्तर पर कांग्रेस के नेताओं के आगे टिकने वाले नेताओं की कमी भाजपा

में है।

संबित पात्रा टाइप के प्रवक्ता अभी काम नहीं आयेंगे

इस किस्म के आंदोलनों के दौर में संबित पात्रा किस्म के वक्ता जनता को प्रभावित

करने की ताकत नहीं रखते। किसानों की मांग है कि तीनों कृषि कानूनों को वापस

लिया जाए। केंद्र सरकार ने कुछ संशोधनों का प्रस्ताव भी रखा जिनमें न्यूनतम

समर्थन मूल्य (एमएसपी) प्रणाली को जारी रखने का लिखित आश्वासन देने की

बात शामिल है, परंतु किसानों ने इन्हें ठुकरा दिया। प्रदर्शनकारी किसानों की मांग है

कि एमएसपी की कानूनी गारंटी दी जाए। यह गतिरोध ऐसा कड़ा रुख रखने से

समाप्त नहीं होगा। उधर सरकार ने किसानों को एक बार फिर चर्चा के लिए

आमंत्रित किया है।किसानों की चिंताएं दूर करने के तरीके हैं, बशर्ते किसान भी

बातचीत के लिए तैयार हों। चाहे जो भी हो, निजी मंडियों के लिए कारोबार शुरू हो

जाने के बाद भी सरकार एमएसपी की व्यवस्था खत्म नहीं कर सकेगी। राष्ट्रीय

खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत जरूरतों को पूरा करने के लिए उसे 5.5 करोड़ टन

अनाज खरीदने की आवश्यकता होगी। सरकार देश की 67 फीसदी आबादी को

सब्सिडी वाला खाद्यान्न मुहैया कराती है और अधिकांश सरकारी खरीद पंजाब और

हरियाणा में की जाती है। यकीनन सरकार को कृषि कानून पारित करने में इतनी

जल्दबाजी नहीं करनी थी। केंद्र सरकार को उन राज्यों से भी बात करनी चाहिए जो

उसके साथ नहीं हैं।

कानून को लागू करने में इतनी जल्दबाजी ही संदेहास्पद

ऐसे राज्यों को यह विकल्प दिया जाना चाहिए कि वे चाहें तो फिलहाल इन कानूनों

को लागू न करें। यह चक्र व्यवहार्य नहीं है, भले ही इसे किसी नजरिये से देखा जाए।

बहरहाल, विविधता लाने की अलग कीमत है और इसमें जोखिम भी हैं। ऐसे में

राज्य सरकारों को सहायता उपलब्ध कराने के क्षेत्र में अधिक पहल करनी होगी।

चूंकि कृषि राज्य का विषय है इसलिए उन्हें इसे पूरी व्यवस्था को स्थायी बनाने की

राह तलाशनी होगी



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