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यह ममता की जीत नहीं बंगाल के महिलाओं का जनादेश

  • महिलाओं के अधिक मतदान का असर अब स्पष्ट है

  • आधी आबादी को भाजपा के कटाक्ष पसंद नहीं आये

  • इसका असर अब दिल्ली तक होना तय हो गया है

  • ताकत से हर चीज को रौंद देने की प्रवृत्ति विफल

रजत कुमार गुप्ता

रांचीः यह ममता बनर्जी की जीत नहीं हैं। यह दरअसल भाजपा के नेताओं के प्रचार के

दौरान किये जाने वाले कटाक्षों का पश्चिम बंगाल की महिलाओं द्वारा दिया गया जबाव

है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में कभी गाड़ी पर नाव और कभी नाव पर गाड़ी एक स्वाभाविक

प्रक्रिया है। पश्चिम बंगाल के धुआंधार चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी और खास कर

अमित शाह यह भूल गये थे कि वे पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार कर रहे हैं, जहां आज भी

भाषा और संस्कृति के प्रति ग्रामीण समाज तक अत्यधिक संवेदनशील है। वैसे भी भाजपा

की तरफ से इस राज्य में जरूरत से ज्यादा ताकत लगाना भी जरूरी था क्योंकि ममता का

किला ध्वस्त करने के बाद निकट भविष्य में उन्हें कहीं और से चुनौती मिलने की कोई

आशंका नहीं होती। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल जो कुछ कर सकते थे तो उन्हें निहत्था

करने के लिए राज्यपाल को सभी अधिकार देने का कानून भी इस कोरोना महामारी के

दौरान लागू कर दिया गया है। कुल मिलाकर यह माना जा सकता है कि अपना विरोध

अथवा मतभिन्नता को लोकतंत्र का हिस्सा समझने से परहेज करना भाजपा के वर्तमान

नेतृत्व की सबसे बड़ी खामी है। अब पश्चिम बंगाल की महिलाओं ने बंगाल की बेटी के

पीछे खड़े होकर अपनी आधी आबादी की ताकत का खुला प्रदर्शन कर दिया है।

ममता बनर्जी ने पहले भी अपने चुनाव प्रचार के दौरान कई बार इस बात को दोहराया था

कि परिवर्तन पश्चिम बंगाल में नहीं बल्कि अब दिल्ली में नजर आयेगा। घटनाक्रम कुछ

ऐसे बन रहे हैं कि अब भाजपा के अंदर से भी मतभिन्नता की आवाज अगर सुनाई पड़े तो

इस पर किसी को आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए।

किसान आंदोलन के समय से ही भाजपा बेपटरी है

किसान आंदोलन से लेकर बंगाल और अन्य राज्यों के चुनाव के दौरान पार्टी की एकजुटता

के लिए खड़े नेता अपना राजनीतिक भविष्य भी देख रहे हैं। इनमें से अधिकांश को किसान

आंदोलन से हुए नुकसान की चिंता सताने लगी है। यह तय हो गया है कि भाजपा विरोधी

खेमा में अब ममता बनर्जी भी एक ताकतवर नेता के तौर पर स्थापित हो चुकी हैं। शरद

पवार लगातार उनके साथ खड़े रहे हैं। शायद श्री पवार ने ही कांग्रेस नेतृत्व को पश्चिम

बंगाल के चुनाव से दूरी बनाकर चलने का सुझाव दिया हो लेकिन मराठा क्षत्रप की चालों

को समझ पाना इतना आसान नहीं है।

यह ममता की जीत नहीं पर भाजपा का कठिन समय

असम में भाजपा की जीत के बाद भी पार्टी के अंदर सब कुछ ठीक ठाक है, ऐसा दावा नहीं

किया जा सकता है। वहां के कद्दावर नेता हिमंत बिस्वा सरमा ने संकेत दिया है कि असम

के विधायक दल के नेता का फैसला पार्टी की संसदीय बोर्ड की बैठक में होगा। इसलिए

असम में आने वाले दिनों में भी भाजपा के अंदर सब कुछ सही चलेगा, इसकी गारंटी अभी

नहीं दी जा सकती है। इन बड़े चुनावों के बीच उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव के परिणामों

से समाजवादी पार्टी के फिर से ऊपर आने के आसार नजर आने लगे हैं। हर बार ताकत से

हर विरोध को कुचल देने की अमित शाह की आदत का असर खत्म हो रहा है और यह

माना जा सकता है कि इसी वजह से नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ भी तेजी से नीचे

आये हैं। अब देखना है कि यह ममता की जीत के बदले भाजपा के खिलाफ सुनाया गया

पश्चिम बंगाल की आधी आबादी का जनादेश है, जिसका आने वाले समय में पूरे देश पर

और खास कर दिल्ली में इस कोरोना संकट के दौर में क्या कुछ असर पड़ने जा रहा है।

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