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चांद पर नजर आ रहा है आतिशबाजी सा नजारा, देखें वीडियो




रांचीः चांद पर नजर आने वाले आतिशबाजी का नजारा वैज्ञानिकों को नजर आता रहा है। पहली बार इन घटनाओं को आम आदमी के लिए भी सार्वजनिक किया गया है। चांद पर ऐसी आतिशबाजी वहां गिरने वाले उल्कापिंडों की वजह से नजर आती है। इसके आधार पर वैज्ञानिक इस नतीजे पर भी पहुंचे है कि चंद्रमा पर हर दिन ऐसा होता रहता है।




देखिये कैसे खगोलीय पिंडों के टकराने से होती है रोशनी

चांद पर अनेक गड्डे भी बड़े उल्कापिंडों की टक्कर से पैदा हुए हैं। अंतरिक्ष में मंडरात पिंडों में अनेक सीधे चांद की सतह पर आ गिरते हैं। इसी दौरान जो टक्कर होती है, उसी से आतिशबाजी का ऐसा नजारा बनता है। खुली आंखों से यह भले ही नजर नहीं आये लेकिन खगोल दूरबीनों से इन्हें देखा जाता है।

वैसे आतिशबाजी का नजारा प्रस्तुत करने वाले अधिकांश खगोलीय पिंड छोटे आकार के होते हैं। इस वजह से टक्कर के बाद तेज रोशनी की बौछार के अलावा ज्यादा कुछ नहीं होता। हो सकता है कि इस टक्कर की वजह से कोई शोर भी उत्पन्न होता हो लेकिन उसे सुनने का कोई साधन फिलहाल नहीं है।

इन तमाम घटनाक्रमों के एक सिरो में पिराकर हेजेग्रायार्ट नामक यूट्यूब चैनल ने एक एनिमेशन फिल्म भी अपलोड कर दी है, जो देखने में बिल्कुल आतिशबाजी का नजारा प्रस्तुत करती है। इस वीडियो को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि वहां छोटे से लेकर मध्यम आकार के उल्कापिंड गिरने की वजह से तेज रोशनी फैल रही है।




वैसे खगोल वैज्ञानिकों ने स्पष्ट कर दिया है कि इनमें से अधिकांश टक्कर चांद के उस छोर पर होती है, जो पृथ्वी की तरफ से नजर नहीं आता है। सैटेलाइटों के जरिए चांद के दूसरे छोर को देखने वाले उपकरण इन घटनाओं को देख पाते हैं।

एक सामान्य अनुमान के मुताबिक चांद पर हर दिन करीब एक लाख से अधिक ऐसे खगोलीय पिंड गिरते रहते हैं जिनकी वजह से आतिशबाजी का ऐसा नजारा वहां बनता रहता है।

चांद पर नजर आने का यह सिलसिला हर दिन का है

एक सामान्य अनुमान के मुताबिक हर दिन करीब 6100 पौंड वजन के पत्थर वहां से टकराते हैं लेकिन उनमें से अधिकांश बहुत ही छोटे होते हैं। इस क्रम में यह बता दें कि चंद्रमा दरअसल पृथ्वी का ही टूटा हुआ एक टुकड़ा है।

पृथ्वी की संरचना आज से करीब 4.54 बिलियन वर्ष पहले हुई थी जबकि उसके एक बिलियन वर्ष बाद चांद किसी बहुत बड़े उल्कापिंड की टक्कर की वजह से धरती से टूटकर अलग होकर अंतरिक्ष में चला गया था। वर्तमान में वह धरती से 2 लाख चालीस हजार मील की दूरी पर है। जिसके एक हिस्से को हम सूर्य की रोशनी की वजह से चमकते हुए देख पाते हैं। दूसरी हिस्सा अंधेरे में डूबा रहता है।



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