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अजीब दास्तां है ये कहाँ शुरू कहाँ खतम

अजीब दास्तां है। दोनों तरफ की मोर्चाबंदी के बीच दोनों ही अपनी बात को जायज और

सही ठहरा रहे हैं। सरकार कहती है कि यह किसानों के भले के लिए है। दूसरी तरफ सरकार

के हिसाब से जिन्हें सबसे अधिक फायदा अब तक मिला है, वे किसान कह रहे हैं कि यह

पूंजीपतियों के हाथों खेती को बेच देने की साजिश है। अब सुप्रीम कोर्ट भी संभल संभलकर

कदम आगे बढ़ा रहा है। केंद्र के दूसरे सारे मंत्री अब विफल साबित हो चुके हैं। किसान

नेताओं को अनपढ़ गंवार अथवा बिना जानकारी के आंदोलन करने वाला समझने वाले

माननीय कृषि मंत्री भी अब आसानी से पार नहीं पा सके हैं। दूसरी तरफ अपनी पूरी फौज

को कृषि कानूनों के पक्ष में मैदान में उतारने के बाद अंततः प्रधान सेवक नरेंद्र मोदी को

यह कहना पड़ा है कि चाहे कुछ हो जाए यह कानून वापस नहीं होंगे। आखिर यही तो

कंफ्यूजन है। कंफ्यूजन इस बात का है कि आखिर दोनों में से सही कौन है।

इस असमंजस के बीच ही आईबीएन 24 के पत्रकार आकर्षण उप्पल पर हमले की भी

सूचना आयी है। यह सूचना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी पत्रकार ने यह लिखा था कि

नरेंद्र मोदी के करीबी समझे जाने वाले अडानी समूह ने चुपके चुपके सैकड़ों एकड़ जमीन

खरीदी है। करनाल में अज्ञात लोगों द्वारा इस पत्रकार पर हमला किया गया है। अडानी

समूह के द्वारा खरीदी गयी जमीन पर रेलवे लाइन बिछाने का उल्लेख भी इस पत्रकार ने

कर दिया था। अब सर पर गंभीर चोट की वजह से वह ईलाज करा रहा है। घटना के

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक हमलावर उसे पास के नहर में फेंक देना चाहते थे। भीड़ जुटना

प्रारंभ हो गयी तो हमलावर आनन फानन में भाग निकले

अजीब दास्तां हैं कि दूसरी तरफ से तुरंत खंडन भी आ गया

दूसरी तरफ अडानी समूह ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर यह सफाई दी है कि खेती के

कारोबार में जाने का उसका कोई इरादा नहीं है। ऐसे में कौन सही है और कौन गलत यह

समझना हर इंसान की अपनी बुद्धि पर निर्भर है। लेकिन इतना तो तय है कि अगर गांव में

कहीं आग लगी है और उसे बूझाने में आपने हाथ नहीं बंटाया तो एक दिन वही आग

आपकी झोपड़ी तक आ जाएगी। तब बैठकर गाते रहना कि आग लगी हमरी झोपड़िया में,

हम गावै मल्हार।

काफी पुरानी फिल्म है। उतनी पुरानी फिल्म भी नहीं है क्योंकि इसी साल मैं भी पैदा हुआ

था और मैं अभी जवान हूं। नाम है दिल अपना और प्रीत पराई। इसी फिल्म के इस गीत को

लिखा था शैलेंद्र ने और सुरों में ढाला था शंकर जयकिशन की जोड़ी ने। इस गीत को स्वर

दिया था लता मंगेशकर ने। गीत के बोल इस तरह हैं।

अजीब दास्तां है ये कहाँ शुरू कहाँ खतम
ये मंज़िलें है कौन सी न वो समझ सके न हम
अजीब दास्तां…

ये रोशनी के साथ क्यों धुआँ उठा चिराग से
ये रोशनी के साथ क्यों धुआँ उठा चिराग से
यह ख़्वाब देखती हूँ मैं के जग पड़ी हूँ ख़्वाब से
अजीब दास्तां…

किसीका प्यार लेके तुम नया जहाँ बसाओगे
किसीका प्यार लेके तुम नया जहाँ बसाओगे
ये शाम जब भी आएगी तुम हमको याद आओगे
अजीब दास्तां…

मुबारकें तुम्हें के तुम, किसीके नूर हो गए
मुबारकें तुम्हें के तुम, किसीके नूर हो गए
किसीके इतने पास हो के सबसे दूर हो गए
अजीब दास्तां…

पूरी दुनिया पर गौर करें तो ट्रंप भइया निपट चुके हैं

तो इस गाने के साथ साथ पूरी दुनिया की सैर भी करते चले। ट्रंप भइया तो लगता है कि

निपट चुके हैं। अब जिनलोगों ने वोट दिया है, वे ही मान चुके हैं कि यह अब चूका हुआ

कारतूस यानी हमलोगों की बोली में फुस्सी बम है। बेचारे अब भी कूद फांद रहे हैं।

बंगाल में दंगल की पूरी तैयारी है और वहां का दंगल मार कुटाई वाला होने जा रहा है। ट्रेलर

दिखने लगा है तो आज के बाद असली फिल्म भी चालू हो जाएगी। अपना मोटा भाई वहां

मोटी ताकत के साथ वहां पहुंच रहे हैं। जाहिर है कि वह अपनी तिकड़मों से अपनी घेराबंदी

की जांच कर सब कुछ ठीक कर आयेंगे। लेकिन मसला पुराने और नये भाजपाइयों के बीच

के इगो क्लैश का है। कहीं इसी चक्कर में भाजपा का डब्बा गुल ना हो जाए। बिहार में भी

लोजपा ने इसी तरीके से जदयू का डब्बा गुल कर दिया है। अब तो नीतीश कुमार भी बंगाल

में दांव लगाने जा रहे हैं। देखते हैं कि उनकी कोशिशों का क्या नतीजा निकलता है। कुल

मिलाकर असली मुद्दा किसान आंदोलन का ही है। यह पहला अवसर है जब भाजपा पूरी

ताकत लगाने के बाद भी किसानों को इस कड़ाके की ठंड में टस से मस नहीं करा पा रही

है। झारखंड में अपने नये मुखिया जी टाइट हैं लेकिन बार बार होमगार्ड का नाम लेकर वे

धंधेबाजों को क्यों टेंशन में डाल रहे हैं, यह समझ से परे है।

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