किसानों को राजनीतिक हथियार समझना भूल होगी

किसानों को नजरअंजा करना बड़ी भूल होगी

किसानों के प्रति नेताओं  का प्रेम फिर से उमड़ता नजर आने लगा है।

चुनाव करीब आ रहे हैं और जाहिर है कि सभी राष्ट्रीय दलों का किसान प्रेम फिर से उमड़ता दिख रहा है।

लेकिन इस बार के चुनाव में किसान को सिर्फ राजनीतिक हथियार समझना

राष्ट्रीय दलों के लिए एक बड़ी चुनावी भूल साबित होने जा रही है।

पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रमों ने किसानों को जिस तरीके से आहत और आंदोलित किया है,

उसका असली नुकसान दो बड़े राष्ट्रीय दल भाजपा और कांग्रेस को ही उठाना है।

भाजपा को यह नुकसान इसलिए उठाना है क्योंकि किसानों के मुद्दों पर पार्टी के

बड़बोले नेताओं ने जो कुछ कहा है, वह दक्षिण भारत में पार्टी को स्थायी नुकसान पहुंचा चुका है।

इसके अलावा भी उत्तराखंड और उत्तरप्रदेश के अलावा अन्य राज्यों से आये किसानों के साथ

दिल्ली में हुए लाठी चार्ज का नुकसान भी सत्तारूढ़ दल को ही उठाना है।

यह अच्छी बात है कि वर्तमान सरकार ने हाल ही में अनाज के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा कर

किसानों की तकलीफ कम करने का प्रयास किया है।

किसानों के मोर्चे पर जो फायदा भाजपा को हुआ था वह लाठीचार्ज में धुल गया

लेकिन इस प्रयास से जो राजनीतिक फायदा हुआ था, वह एक लाठी चार्ज ने धो दिया है।

इसलिए अनाजों को समर्थन मूल्य का जो चुनावी फायदा भाजपा को प्राप्त हो सकता था वह एक लाठी चार्ज की वजह से घट चुका है।

अब दूसरे दल यानी कांग्रेस की बात करें तो आजादी के बाद से निरंतर बिगड़ती किसानों की स्थिति

के लिए अब किसान भी सरकार की नीतियों की गलती को अच्छी तरह समझ चुके हैं।

अब तो खेत-खलिहानों तक स्मार्ट फोन की पहुंच हो चुकी है।

सोशल मीडिया का विस्तार इतना अधिक हो चुका है कि गांव के चौपाल पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर धड़ल्ले से चर्चा होती है।

इसलिए किसान अपनी बदहाली के लिए वर्तमान भाजपा सरकार के साथ साथ

पूर्व की कांग्रेस सरकार की नीतियों को भी कम जिम्मेदार नहीं मानती।

दरअसल देश में किसानों की समस्याओं को समग्र तौर पर समझने और उनके निराकरण के ठोस प्रयास ही नहीं हुए।

जिसका परिणाम से है आज भी लोग खेती से विमुख हो रहे हैं और देश के

कुछ खास इलाकों में कर्ज के बोझ से दबे किसान अब भी आत्महत्या कर रहे हैं।

भारतवर्ष निश्चित तौर पर कृषि प्रधान देश है।

इसके बाद भी शहरीकरण और औद्योगीकरण के चलते खेती का रकबा लगातार घटता जा रहा है।

किसानों की आत्महत्या के कारणों को समझना होगा

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो द्वारा जारी किए गए आँकड़ों के मुताबिक 1997 से लेकर

पिछले साल के अंत तक यानी तेरह वर्षों में दो लाख सोलह हजार पाँच सौ किसानों ने आत्महत्या की।

किसानों की आत्महत्या की त्रासदी यों तो पूरे देश में घटित हुई है, पर कुछ राज्यों में तो यह ज्यादा विकराल रूप में नजर आती है।

पाँच राज्यों- महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में किसानों की आत्महत्या की दर सबसे अधिक रही है।

अकेले 2009 में ही सत्रह हजार तीन सौ अड़सठ किसानों की आत्महत्या की घटनाएँ दर्ज हुईं।

इनमें से बासठ फीसदी मामले इन्हीं पाँच राज्यों के हैं। इनमें भी महाराष्ट्र की हालत तो सबसे ज्यादा खराब है।

इसलिए इस बार जब वहां किसान आंदोलन ने जोर पकड़ा तो स्थिति की गंभीरता को

समझते हुए अनेक नेता इस आंदोलन से साथ जुड़ गये

क्योंकि उन्हें इस बात का अच्छी तरह एहसास है कि किसानों से नाराजगी मोल लेने की स्थिति में

उनका राजनीतिक भविष्य ही समाप्त हो सकता है।सानों

यही चुनौती अब देश के दोनों बड़े दलों के सामने भी है।

किसानों का यह मुद्दा दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए इस बार चुनौती है

सवाल उठता है कि खेतीबाड़ी पर निर्भर लोग क्यों मौत को गले लगा रहे हैं और यह सिलसिला आखिर क्यों नहीं थम पा रहा है?

दरअसल खेती कभी मुनाफे का धंधा हुआ करती थी, लेकिन अब वह घाटे का कारोबार हो गई है।

हालत यह है कि जिस देश में 1.25 अरब के लगभग आबादी निवास करती है

और देश की 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर आधारित है,

उस देश में कृषि शिक्षा के विश्वविद्यालय और कॉलेज नाम-मात्र के हैं, उनमें भी गुणवत्तापरक शिक्षा का अभाव है।

शिक्षा का ही दूसरा पहलू जिसे प्रबंधन शिक्षा की श्रेणी में रखा जा सकता है, नाम-मात्र भी नहीं है।

राष्ट्रीय अथवा प्रदेश स्तर पर कृषि शिक्षा के जो विश्वविद्यालय हैं, उनमें शोध संस्थानों के अभाव में उच्चस्तरीय शोध समाप्त प्राय हैं।

हमारे पास फसल उगाने के लिए उन्नत बीज नहीं है, अच्छी खेती की नई तकनीक आम किसान की पहुंच से दूर है।

ऊपर से औद्योगिकीकरण के होड़ में किसानों की जमीन लूटने का कारोबार भी

देश को नये किस्म के अन्नयुद्ध की तरफ धकेल रहा है।

इन नीतियों से जो राजनीतिक दल जुड़े हुए हैं, उन्हें ही ऐसे कृषि विरोधी नीतियों का चुनावी घाटा तो उठाना ही पड़ेगा।

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