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लगातार दो जोरदार मुक्के की तरह उल्कापिंड टकराया था इस धरती से




चांद टूटकर अलग हो गया इसी झटके में और दूर चला गया
घूंसा से दांत टूटकर बाहर निकलने जैसी स्थिति
दूसरी टक्कर अपेक्षाकृत कम प्रभावशाली ही थी
चांद की संरचना में दोनों के ही अंश मौजूद
राष्ट्रीय खबर

रांचीः लगातार दो जोरदार झटके इस धरती को लगे थे। शोधकर्ता वैज्ञानिकों का मानना है कि दो उल्कापिंड बहुत कम समय के अंतराल में पृथ्वी से आ टकराये थे। इन्हीं झटकों की वजह से प्राचीन धरती का ही एक टुकड़ा पहले गिरने वाले उल्कापिंड के बडे हिस्से से साथ टूटा था। टूटने के बाद वह दूसरे उल्कापिंड के झटके से पृथ्वी से अलग होकर अंतरिक्ष में चला गया।




बाद में वह पृथ्वी के ही गुरुत्वाकर्षण की वजह से पृथ्वी की परिक्रमा करते हुए अन्य कारणों से धीरे धीरे पृथ्वी की तरह ही गोलाकार होता चला गया। इसकी व्याख्या करते हुए वैज्ञानिकों ने बताया है कि कई अवसरों पर लोगों को अचानक मुंह पर मुक्का लगने से जैसे दांत टूटकर बाहर आ जाते हैं, ठीक वैसा ही चांद के बनने के दौरान हुआ होगा।

पहले उल्कापिंड जब पृथ्वी पर आ गिरा तो उसके एक हिस्से में दरार आ गयी थी। दूसरी तरफ पृथ्वी के अंदर धंसने के दौरान उल्कापिंड में भी दरार आया था। इसलिए जब दूसरा उल्कापिंड आ गिरा तो दोनों टूटे हुए हिस्से एक साथ मिलकर पृथ्वी से बाहर निकल गये। इस लिहाज से माना जा सकता है कि पृथ्वी का प्राकृतिक उपग्रह यानी चांद का बनना एक खगोलीय दुर्घटना की उपज थी।

शोधकर्ताओं के मुताबिक यह घटना आज से करीब 4.4 बिलियन वर्ष पहले की है। उस वक्त पृथ्वी भी अपने आदिकाल में ही था। कई किस्म के आंकड़ों की जांच कर लेने के बाद ही वैज्ञानिकों ने चांद की सृष्टि के बारे में यह बात कही है। यह बताया गया है कि पृथ्वी पर बहुत कम समय के अंतराल में गिरने वाले दोनों उल्कापिंड में पहला थेइया था। इसी का एक हिस्सा भी पृथ्वी के एक हिस्से के साथ टूटकर अलग हुआ था और दोनों मिलकर चांद बने थे।

लगातार दो जोरदार झटकों से दोनों ही ठोस टूटकर चांद बने

प्राचीन काल की इस घटना का काफी लंबे समय परीक्षण चल रहा है ताकि यह समझ में आ गये कि दरअसल पृथ्वी से अलग होकर चांद बनने की प्रक्रिया कैसी रही होगी। अनुमान है कि जो पहला उल्कापिंड पृथ्वी पर आ गिरा था वह मंगल ग्रह के आकार का था। इस टक्कर की वजह से उल्कापिंड और पृथ्वी दोनों में दरार आ गयी थी। उस वक्त पृथ्वी के बनने की प्रक्रिय चालू थी।




यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोआना के प्रोफसर एरिक एस्पोग ने कहा कि दरअसल चांद में मौजूद पृथ्वी के अंश होने से यह पहले से पता है कि यह पृथ्वी का ही एक टूटा हुआ हिस्सा है। लेकिन अब उसमें उल्कापिंड के भी अंश पाये जाने से यह पता चलता है कि दरअसल यह पृथ्वी और उल्कापिंड दोनों को मिलाकर ही तैयार हुआ है। जब यह दोनों हिस्से एक साथ ही पृथ्वी से बाहर चले गये थे, उस वक्त उनका आकार कैसा था, उस बारे में कोई अंदाजा नहीं हैं।

बाद में निरंतर गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से यह गोलाकार शक्ल लेता चला गया है। वैसे वैज्ञानिक यह मानते हैं कि इस किस्म की घटना तभी हो सकती है जब कोई उल्कापिंड अत्यंत तेज गति से पृथ्वी से टकराने के दौरान नुकीले स्तर पर अंदर घुस गया हो। इससे दोनों ही हिस्सों के टूटने की स्थिति बनती है और चांद के बनने के दौरान भी कुछ ऐसा ही हुआ है।

वैसे वैज्ञानिक मानते हैं कि अंतरिक्ष के लिहाज से यह टक्कर भी अपेक्षाकृत कम प्रभावशाली रही होगी वरना अधिक बड़ी टक्कर से तो सारे कण इधर उधर बिखर जाते। ऐसा सौर मंडल में अनेक स्थानों पर लगातार देखा जाता है। इसलिए पृथ्वी पर दूसरे उल्कापिंड के टकराने की घटना अपेक्षाकृत धीमी गति की रही होगी, ऐसा खगोल वैज्ञानिक मानते हैं।

प्राचीन स्थिति के बाद में बहुत बदलाव आये हैं

सूर्य के चारों तरफ घूमते सौर मंडल के बारे में वैज्ञानिकों ने पाया है कि दरअसल पृथ्वी भी शुक्र ग्रह के लिए एक कवच का काम करता है। सूर्य की खतरनाक किरणों का अधिकांश भाग धरती का वायुमंडल झेल लेता है।

इस वजह से शुक्र ग्रह तक ऐसी हानिकारक किरणों की बहुत कम मात्रा पहुंच पाया है। लेकिन इन दोनों ग्रहों की संरचना में अंतर होने की वजह से शोधकर्ता मानते हैं कि इस दूसरे ग्रह पर भी शायद अन्य खगोलीय पिंडों का प्रभाव पड़ा है, जो समय के साथ साथ अपेक्षाकृत कम गति से उससे टकराने के बाद शुक्र ग्रह का हिस्सा बनते चले गये हैं। इस क्रम में वह फिर से पृथ्वी से दूर और सूर्य के करीब चला गया है लेकिन उसे अब भी धरती के आवरण की मदद मिल रही है।



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