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सड़क पर चलने का दर्द देर से महसूस क्यों माई लॉर्ड

सड़क पर चलने वाले मजदूरों का दर्द महसूस करने में माननीय न्यायालय को इतनी देर

लगी, यह अपने आप में बड़ा सवाल बना रहेगा। अदालत को मानवीय संवेदनाओं के बीच

कानून की परिधि में न्याय करने की संवैधानिक जिम्मेदारी सौंपी गयी है। इससे पहले जब

यह मामला अदालत के विचारार्थ गया था तो अदालत की टिप्पणी पूरे देश को हैरान कर

गयी थी। अदालत ने कहा था कि अपनी मर्जी से जो लोग रेलवे ट्रेक या सड़क पर चल रहे

हैं, उनके बारे में अदालत की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती है। अदालत की यह टिप्पणी देश

में चल रहे वैश्विक संकट कोरोना के इस संकटकाल में किसी बड़े आघात से कम नहीं थी।

शायद अदालत को भी राष्ट्रीय स्तर पर उसके फैसले की हो रही आलोचना का एहसास

काफी विलंब से हुआ। जिसका नतीजा था कि कल इस फैसले में संशोधन कर मजदूरों के

हक में आदेश पारित किये गये। सड़क पर चलते मजदूरों के जाने पर कोर्ट ने गुरुवार को

अंतरिम आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि ट्रेनों और बसों से सफर कर रहे प्रवासी मजदूरों से

किसी तरह का किराया ना लिया जाए। यह खर्च राज्य सरकारें ही उठाएं। कोर्ट ने आदेश

दिया कि फंसे हुए मजदूरों को खाना मुहैया कराने की व्यवस्था भी राज्य सरकारें ही करें।

इस मसले पर अगली सुनवाई अब 5 जून को होगी। जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस एसके

कौल और जस्टिस एमआर शाह की बेंच ने गुरुवार को मामले पर सुनवाई की। केंद्र की

ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में दलीलें रखीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि

ट्रेन और बस से सफर कर रहे प्रवासी मजदूरों से कोई किराया ना लिया जाए।

सड़क पर भागने को मजबूर थे मजदूर

अदालत ने साफ साफ अब जाकर यह कहा है कि मजदूरों पर होने वाला यह सारा खर्च

राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारें उठाएं। स्टेशनों पर खाना और पानी राज्य

सरकारें मुहैया करवाएं और ट्रेनों के भीतर मजदूरों के लिए यह व्यवस्था रेलवे करे। बसों में

भी उन्हें खाना और पानी दिया जाए। देशभर में फंसे मजदूर जो अपने घर जाने के लिए

बसों और ट्रेनों के इंतजार में हैं, उनके लिए भी खाना राज्य सरकारें ही मुहैया करवाएं।

मजदूरों को खाना कहां मिलेगा और रजिस्ट्रेशन कहां होगा। इसकी जानकारी प्रसारित की

जाए। राज्य सरकार सड़क पर चलते मजदूरों के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को देखें और यह

भी निश्चित करें कि उन्हें घर के सफर के लिए जल्द से जल्द ट्रेन या बस मिले। सारी

जानकारियां इस मामले से संबंधित लोगों को दी जाएं। कोर्ट ने कहा कि घर जाने की

कोशिश कर रहे प्रवासी मजदूर जिन मुश्किलों का सामना कर रहे हैं, उन्हें लेकर हम

परेशान हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि राज्य सरकारें उनके लिए कदम उठा रही हैं।

अदालत का फैसला देर आया पर दुरुस्त आया

लेकिन, रजिस्ट्रेशन, ट्रांसपोर्टेशन और खाना-पानी देने के मामलों में कुछ खामियां भी

देखने को मिली हैं। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि

राज्य सरकारों से को-ऑर्डिनेट कर प्रवासी मजदूरों को स्पेशल ट्रेनों और बसों से उनके

राज्यों में पहुंचाया जा रहा है। 1 मई से 27 मई तक 91 लाख मजदूरों को घर पहुंचा दिया

गया। इस जवाब पर कोर्ट ने टिप्पणी की- क्या यात्रा में उन्हें भरपेट खाना खिलाया गया?

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- क्या प्रवासियों से किसी भी मौके पर टिकट के पैसे मांगे गए? सवाल

ये है कि राज्य सरकारें टिकटों के पैसे कैसे चुका रही हैं। अगर प्रवासियों से पैसे ले रहे हैं तो

क्या उन्हें यह रकम वापस की जा रही है? ट्रेन के इंतजार के दौरान उन्हें खाना मिल रहा या

नहीं? कोर्ट ने कहा- प्रवासियों को खाना मिलना ही चाहिए। सॉलिसिटर जनरल ने जवाब

दिया कि खाना दिया जा रहा है। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि हर रोज करीब 3.36 लाख

प्रवासियों को उनके राज्यों में पहुंचाया जा रहा है। सरकार ऐसे सभी प्रवासियों को उनके

घर पहुंचाएगी।

स्वतः संज्ञान पर सुना गया था यह मामला

अदालत ने हर दलील को सुनने के बाद कहा जरूरतमंद लोगों को फायदा नहीं मिल

पाया। अदालत ने इस मामले को खुद ही नोटिस में लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि

मजदूरों की हालत खराब है। उनके लिए सरकार ने जो इंतजाम किए हैं वे नाकाफी हैं। कोर्ट

ने इस मामले में केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर 28 मई तक जवाब मांगा

था। लेकिन इसके बाद भी कोर्ट के आदेश की आलोचना उसके पूर्व दृष्टिकोण को सवालों

के घेरे में इसलिए निरंतर रखा जाएगा क्योंकि इस संकटपूर्ण स्थिति में अदालत अपने

मानवीय दृष्टिकोण का परिचय नहीं दे पायी है। तमाम किस्म की प्रतिकूल परिस्थितियों

के बाद भी यह अच्छी बात हो रही है कि समाज के अंतिम कतार पर खड़े लोगों के प्रति

संविधान के तहत गठिन व्यवस्थाओं का क्या कुछ नजरिया है, यह अच्छी तरह समझने

का मौका मिला है। दूसरी तरफ संकट की इसी स्थिति में आम आदमी अपने सहयोगी

भारतवासी के प्रति क्या रुख अपनाता है कि यह भी हमें समझने का अवसर मिला है।


 

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