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आंकड़ों की चोरी पर और ध्यान देना जरूरी

आंकड़ों के आधार पर आपके व्यक्तित्व और आचरण का आकलन करना बहुत आसान

होता है। ऐसे में अगर किस को आपके इन आंकड़ों की उपलब्धता करा दी जाए तो उसके

मुकाबले आपकी ताकत वैसे ही कम हो जाती है क्योंकि आपके सामने खड़ा व्यक्ति आपके

बारे में पहले से ही बहुत कुछ जानता है। इसलिए चीन के एप पर भारत सरकार द्वारा

प्रतिबंध लगाये जाने के बाद भी खास तौर पर चीन की तरफ से यह खतरा अभी कतई नहीं

टला है। नई जानकारी के मुताबिक चीन की डेटा एनालिटिक्स कंपनी शेन्हुआ डेटा

इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलजी ने करीब 10,000 भारतीय नागरिकों से जुड़े आंकड़े जुटाए हैं। इन

लोगों में कई बड़ी हस्तियां भी शामिल हैं। सवाल है कि कोई कंपनी किस तरह ऐसे आंकड़े

जुटाती है और उनका विश्लेषण करती है? सच तो यह है कि इनमें से बहुत सारा डेटा

सार्वजनिक या निजी होता है। आज का कोई भी व्यक्ति लगातार डेटा पैदा करता रहता है।

आंकड़ों का उत्पादन साइबर गतिविधियों से खुद होता है

सर्वोच्च न्यायालय ने 2017 में निजता को मौलिक अधिकार बताया था लेकिन भारत में

निजी डेटा की निजता को सुरक्षा देने वाला कानून अब तक नहीं बना है। इस बारे में

प्रस्तावित कानून में सरकार को अपनी मर्जी से हर तरह का डेटा जुटाने की खुली छूट दी

गई है, लिहाजा इसके कानून बन जाने पर भी सरकारी निगरानी के खिलाफ नागरिकों को

कोई सुरक्षा नहीं मिल पाएगी। अधिकतर लोगों ने सोशल मीडिया साइट पर अपनी

प्रोफाइल बनाई हुई हैं। इसके अलावा लोगों की ईमेल आईडी भी होती हैं जिनमें से

ज्यादातर गूगल की जीमेल पर हैं। ऐसा बहुत सारा डेटा कानूनी तरीके से और आसानी से

जुटाया जा सकता है। ये डेटा संग्राहक (कलेक्टर) किसी के कामकाजी जीवन, आर्थिक

स्थिति, शैक्षणिक पृष्ठभूमि, मनोरंजन संबंधी पसंद, दोस्तों, राजनीतिक रुझान और

सामाजिक दृष्टिकोण जैसे तमाम पहलुओं के बारे में जानकारी जुटा सकते हैं। किसी

व्यक्ति की किसी जगह पर मौजूदगी संबंधी जानकारी भी उपयोगी होती है। निजता

संबंधी प्रस्तावित कानून में भी इसे निजी डेटा नहीं माना गया है। फूड डिलिवरी सेवा और

टैक्सी कैब जैसे कई कारोबार स्थान संबंधी जानकारियों पर आधारित होते हैं। आपके फोन

का एक विशिष्ट अंतरराष्ट्रीय मोबाइल उपकरण पहचान (आईएमईआई) नंबर होता है।

मोबाइल और सोशल  मीडिया चोरी के आसान रास्ते

दो सिम वाले फोन में दो आईएमईआई नंबर होते हैं। इस तरह किसी भी हैंडसेट को सिम के

साथ ट्रैक किया जा सकता है। हरेक सिम का भी विशिष्ट नंबर होता है। आईएमईआई और

सिम के नंबर क्लोन किए जा सकते हैं लेकिन वह न तो आम है और न ही कानूनी। अगर

आपका फोन ऑन होते ही सबसे नजदीकी मोबाइल टावर से संपर्क स्थापित करता है। इस

तरह आपके दूरसंचार सेवा प्रदाता को आपकी मौजूदगी वाले क्षेत्र के बारे में पता चल जाता

है। अगर फोन में जीपीएस ऑन है तो आपकी वास्तविक लोकेशन भी पता चल जाती है।

आरोग्य सेतु ऐप लोकेशन की जानकारी का ही इस्तेमाल करता है। ब्लूटुथ ऑन होने पर

भी लोकेशन पता चल जाता है। ऐंड्रॉयड ऑपरेटिंग प्रणाली में वाई-फाई नेटवर्क तलाशने

पर लोकेशन डेटा भी दर्ज हो जाता है। इसका मतलब है कि वाई-फाई ऑन रखने से हम

अपनी लोकेशन भी बता देते हैं। इन आंकड़ों को कई तरह से हासिल किया जा सकता है।

गुमनाम डेटा यानी आंकड़ों का बाजार बहुत बड़ा है

ऐसे गुमनाम डेटा का बहुत बड़ा बाजार है। थोड़ी अतिरिक्त जानकारी की मदद से गुमनाम

डेटा को अक्सर गुमनामी से बाहर निकाला जा सकता है और चिह्नित लोगों के साथ उसे

संबद्ध किया जा सकता है। कई हैंडसेट में विनिर्माता द्वारा क्लॉउड बैकअप सेवा भी दी

जाती है। वह क्लॉउड सर्वर लॉगिंग की जगह हो सकता है। उबर और जोमैटो जैसे कई ऐप

लोकेशन मांगते हैं। अगर आप फोन सेटिंग्स में जाएं तो पता चलेगा कि कई ऐप लोकेशन

डेटा का इस्तेमाल करते हैं। अगर लोकेशन डेटा को एक डिजिटल मानचित्र से जोड़ें और

कुछ अन्य सूचनाएं भी मिल जाएं तो हम किसी फोन उपभोक्ता की 24 घंटे की

गतिविधियों के बारे में बेहद सटीक अनुमान लगा सकते हैं। इसके अलावा लेनदेन संबंधी

डेटा भी होता है। अगर डेटा कलेक्टर ने शॉपिंग ऐप तक पहुंच हासिल कर ली तो वह

लेनदेन संबंधी जानकारियां भी ले सकता है। अब इस किस्म की आंकड़ों की जासूसी के

लिए आर्टिफिशियल इंटैलिजेंस का प्रयोग किया जाता है। डिजिटल मार्केटिंग के एक बड़े

हिस्से में लक्ष्य तक पहुंचने के लिए ऐसे विशाल डेटा का इस्तेमाल होता है। गूगल आपके

ईमेल और ऑनलाइन सर्च से मिले पैटर्न के हिसाब से विज्ञापन भी भेजता है। कुल

मिलाकर हमारे निजी आंकड़ों पर लगातार निगरानी हो रही है। अब चीन के मामले में

दूसरी कंपनियां उन्हें क्या कुछ उपलब्ध करा रही है, इसका पता चलना कठिन है। लेकिन

जिस तरीके से पिगासूस के जरिए जासूसी भारत में भी हुई है, उसे रोकने की दिशा में ठोस

कदम उठाया जाना चाहिए क्योंकि यह भावी अंतर्राष्ट्रीय बाजार की लड़ाई का एक बहुत

कारगर हथियार बनता जा रहा है।


 

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