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प्यार से बोलो जय माता दी सिर्फ अब कोरोना का रोना है

प्यार से ही जय माता दी बोलने की परंपरा है। इसे जय जय श्री राम जैसे कर्कश ध्वनि से

भय संचार करने के नये रामभक्तों की तरह तो कतई नहीं बोला जाता। गांव देहात में आज

भी जब लोग एक दूसरे को जै राम जी की या राम राम भाई कहते हैं तो उससे प्यार

टपकता है। नवरात्रि के दिन के दिन चल रहे हैं। घट पूजा के साथ दुर्गा माता की प्रतिमाएँ

स्थापित सारे भारत दिशा निर्देशों का पालन करते हुए हो गयी हैं। यहां हम प्रसिद्ध

वैज्ञानिक भारत के 11वे राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल्ल कलाम और प्रसिद्ध दार्शनिक युग दृष्टा

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की अवधारणा एकात्म मानववाद में समानता का अध्ययन

कर रहे हैं। पिछले दिनों हमनें दोनो महापुरुषों की पुण्यतिथि मनाई हैं। संयोग से नवरात्रि

माता की आराधना का पर्व भी शुरू हो गया है। वैसे सरदार पटेल की विशाल प्रतिमा

स्थापित कर हमने एक मिशाल कायम की है, लेकिन क्या का हम उनकी नीतियों और

आदर्शों को अपना पायें हैं, इस विषय पर आज तक चिंतन नहीं हुआ। इसी प्रकार डाक्टर

एपीजे अब्दुल्ल कलाम और पंडित दीनदयाल उपाध्याय केवल राजनीतिक आवश्यकता है

या उनके विचारों पर योजना बनाकर कोई काम हुआ हैं, हमारे नेता क्या वास्तव मे उनके

बताये मार्ग पर चल रहे हैं, राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए इस बात पर चिंतन जरूरी है।

प्यार से जयकारा की आवश्यकता पथभ्रष्टों के लिए भी

केवल सांस्कृतिक विरासत का ढींढोरा पीटने से देश को न तो आर्थिक रूप से सक्षम बनाया

जा सकता है और न हीं सर्वांगीण विकास के मार्ग पर आगे बढाया जा सकता है। हमारे

नेता जिन्हें हम अपना कर्णधार और खेवनहार मानते हैं, सिर्फ वोट बैंक कैसे बनाया जा

सकता है और सत्ता येन-केन प्रकारेंण केसे प्राप्त की जा सकती है, इसी अवधारणा में दक्ष

हैं और यहीं उनका लक्ष्य हैं। कम से कम पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जमाने में कोई

अपराधी चुनाव का टिकट पाने की हिम्मत हीं नहीं कर सकता था, और आज हर तरह का

अपराधी बलात्कारी हो, व्याभिचारी या अत्याचारी अग्रिम पंक्ति में हैं। चाहे सरदार पटेल

हो, एपीजे अब्दुल कलाम हो या पंडित दीनदयाल इनके नाम का उपयोग राजनैतिक

तात्कालिक लाभ के लिए ही होता है इन्हें आदर्श बनाकर राजनीति का मापदंड नहीं बनाया

जाता है। युग दृष्टा डाक्टर एपीजे अब्दुल कलाम को विश्वास था कि युवाओं के योगदान

से भारत साल 2020 तक एक विकसित देश बन जाएगा, उन्होंने ये खयाल ‘इंडिया 2020:

विज़न फॉर न्यू मिलेनियम’ में दर्ज किये थे। यह दस्तावेज बताता है कि भविष्य में देश के

सामने आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए कैसे योजना बनाकर कार्य किया

जाए।

डॉ एपीजे अब्दुल कलाम के विजन डाक्यूमेंट को भी भूला दिया

1996 में डाक्टर एपीजे अब्दुल कलाम इस संगठन के अध्यक्ष थे और 1996-97:में

अध्यक्षता मे ‘विज़न डाक्युमेंट 2020 तैयार किया गया था। इनमें उन्होंने स्पष्ट कहा था

कि क्या हम बच्चों और युवाओं के लिए सार्थक कदम उठाएंगे या उन्हें उनके नसीब के

सहारे छोङकर अभिजात्य वर्ग के लिए ही काम करेगे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के

एकात्म मानववाद के एपीजे एक प्रबल उदाहरण थे। एकात्म मानववाद को पंडितजी एक

सैद्धांतिक स्वरूप में नहीं अपितु आस्था के स्वरूप में लेते थे, इसे उन्होंने राजनैतिक

सिद्धांत के रूप मे नहीं बल्कि हार्दिक भाव के रूप मे जन्म दिया था। संपूर्ण राष्ट्र एक

परिवार हो इस भावना को आत्मा में आसीन करना और तब परमात्मा की ओर देखना यह

उनकी एकात्मता का मूल मंत्र है। उनका मानववाद वासुदेव कुटुंबकम की अवधारणा का

वास्तविक दस्तावेज था। उनके अनुसार मानववाद वह है जो प्राणवान आत्मा से निसर्गित

होकर निर्झर होकर एक शक्ति पूंज के रूप मे सर्वत्र राष्ट्र में मुक्त भाव से बहे, अर्थात

अपनी क्षमता से और प्राणपण से उत्पादन करें और राष्ट्र को समर्पित भाव से अर्पित कर

दें। जब हम नवरात्रि पर मातृ शक्ति का स्मरण व सुमिरण करते हैं, तब हमें इस बात को

भली भांति स्वीकार करना चाहिए कि मानवीयता का पहला शब्द ही माँ है।

पंडित दीनदयाल की विचारधारा को भी भूला दिया क्या

समस्त राजनैतिक विचारधाराओं और अवधारणाओं को परे रखते हुए यदि हम समग्र

चिंतन करें तो निश्चित रूप से हमें ये बात समझ में आ जाएगी कि भारत की धरती में

जन्में इन दो महापुरुषों में मातृत्व भाव निष्ठा व ईमानदारी के साथ था। एक ने भारत को

कैसे विकसित देश बनाया जा सकता है के बारे धर्म और राजनीति से ऊपर उठकर बात की

तो दूसरे ने एकात्म मानववाद की अवधारणा से मानवीयता को ही प्रमुख धर्म और कर्तव्य

बताया। 2020 हाथ से फिसल रहा है, लगता नहीं हैं कि एपीजे का गुणगान करने वाले

सत्ताधीश उनकी बातो को गले उतार रहे हैं। सिर्फ कोरोना का रोना हैं, बाकी तो खोना ही

खोना है। जय माता दी।

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