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कोरोना के नाम पर भय का कारोबार और निजी लाभ

कोरोना के नाम पर आपात व्यवस्था पर बेहिसाब खर्च हो रहा है। यह समय की मांग भी है

कि इस मामले में कोई कोताही न की जाए। लेकिन पूरे भारतवर्ष में अब यह धीरे धीरे

स्पष्ट होता जा रहा है कि इस वैश्विक आपदा को भी कुछ लोगों ने निजी कमाई का अवसर

बना लिया है। एक ही सामान के अलग अलग दरों पर बिकने का सीधा नतीजा है कि इसके

भुगतान का बड़ा हिस्सा जनता के हित में नहीं बल्कि कुछ लोगों की जेब भरने में हो रहा

है। यह अपने आप में राष्ट्रद्रोह है लेकिन इस मुद्दे पर कार्रवाई में पहल नहीं हो रही है

क्योंकि जांच होने पर शायद देश की चिकित्सा व्यवस्था में जो निजीकरण हावी है, वह पूरी

व्यवस्था को ही ध्वस्त कर देगा। वैसे भी पिछले छह महीने के घटनाक्रम तो यही बता रहे

हैं कि कोरोना को समझना दरअसल उन चार अंधों के द्वारा एक हाथी को टटोलने जैसा है,

जो उसके सही रुप और आकार को समझ ही नहीं पा रहे हैं। लेकिन भय के इस कारोबार

को रोका जाना चाहिए क्योंकि जो पैसा खर्च होने के नाम पर निजी जेबों में जा रहा है वह

भ्रष्टाचार की चरम सीमा है। राष्ट्रीय आपदा के दौर में भी अगर कोई निजी लाभ को

तरजीह दे तो कमसे कम उसे राष्ट्रभक्त को नहीं कहा जा सकता। वैसे भी आज के दौर की

राजनीति में राष्ट्रभक्त की परिभाषा बदलने की बड़ी कोशिश हुई थी लेकिन यह बुखार

जितनी जल्दी आया था, उससे अधिक जल्दी उतर भी गया।

जान और माल दोनों का नुकसान महसूस हो रहा

फिर भी एक पुरानी कहावत इनदिनों बिल्कुल शत प्रतिशत सही साबित हो रही है, वह

कहावत है जान माल का नुकसान। कोरोना महामारी में जान माल का नुकसान हम सभी

महसूस कर पा रहे हैं। वैसे इसके बाद भी भारत अपनी तमाम परेशानियों और खामियों के

बाद भी मृत्यु दर को कम रखने में सफल रहा है, यह कोई कम बात नहीं है। शायद समय

से पूर्व लॉक डाउन लगाया जाना इसके लिए सबसे कारगर रहा है। लेकिन मूल मुद्दा तो

कोरोना के नाम पर भय के कारोबार का है। सबसे पहले निजी अस्पतालों की स्थिति पर

गौर करें तो वहां भर्ती कोरोना मरीजों के ईलाज के बारे में मरीज के परिजनों को कोई

जानकारी ही नहीं होती है। अगर मरीज की मौत हो गयी तो लाश के साथ साथ ही ईलाज

के राज भी दफन कर दिये जा रहे हैं। पहले से संक्रमण से बचने के नाम पर परिजनों को

वहां जाने की इजाजत नहीं है। जब मास्क और पीपीई किट के नाम पर निर्धारित मूल्य से

दो गुना या तीन गुणा दाम वसूला जा रहा है तो समझा जा सकता है कि दरअसल खेल

क्या चल रहा है। कोविड केयर सेंटर और क्वारेंटीन सेंटरों में भी इंतजाम के नाम पर

सरकारी धन की लूट हो रही है, यह धीरे धीरे स्पष्ट होता जा रहा है। दूसरी तरफ इसके

नकारात्मक आर्थिक व वित्तीय प्रभाव से निपटना भी एक बड़ी चुनौती है।

कोरोना के नाम पर जनता को और गरीब बनाया जा रहा

लॉकडाउन में काम धंधों, यातायात और कारोबारों के कमोबेश ठप पड़ने से उत्पादन,

रोजगार, आमदनी और उपभोग में बड़ी गिरावट आयी है। यह बेहद संतोषजनक है कि 29

राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में यह दर राष्ट्रीय औसत से नीचे है तथा इनमें से पांच में यह

दर शून्य है और 14 में एक प्रतिशत से नीचे है। संक्रमण से मुक्त होकर स्वस्थ होने की दर

में भी निरंतर सुधार हो रहा है।यह आंकड़ा अब लगभग 63 प्रतिशत हो चुका है। केंद्र और

राज्य सरकारों ने जांच की गति भी तेज कर दी है और यह उम्मीद की जा रही है कि जल्दी

ही रोजाना जांच की संख्या अपेक्षित स्तर पर पहुंच जायेगी। वैसे भारत ही नहीं, कोरोना

काल में दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं के हिसाब बिगड़ चुके हैं, ऐसे में आर्थिकी को तुरंत

पटरी पर लाना संभव नहीं है, क्योंकि आयात-निर्यात के समीकरणों को ठीक होने में समय

लगेगा। वृद्धि दर घटने के कारण जीडीपी और देश पर कुल कर्ज के अनुपात में भी बढ़ोतरी

होगी। हमारे पास समुचित विदेशी मुद्रा भंडार है, जो विदेशी कर्जों के किस्त व ब्याज की

चुकौती के लिए पर्याप्त है। आयात में कमी के कारण व्यापार संतुलन बेहतर होने से भी

वित्तीय स्तर पर तात्कालिक राहत मिलने की उम्मीद की जा सकती है। घरेलू कर्जे को

लेकर चिंता की कोई वजह नहीं है क्योंकि उनका मालिकान भी घरेलू है। वैसे एक अच्छा

संकेत यह भी है कि केंद्र और राज्य सरकारों के ब्याज के खर्च में कमी आयी है। लेकिन

कोरोना के नाम पर गरीबों को राशन देने और राशन दुकानों से मुफ्त राशन आवंटन का

गोरखधंधा भी हम देख रहे हैं।


 

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