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इसरो ने आदित्य एल 1 नामक सूर्य अभियान की तैयारियां की

  • अगले साल में भारतीय अंतरिक्ष यान रवाना होने की उम्मीद

  • चंद्रयान 2 की तमाम उपलब्धियां इसमें काम आयेंगी

  • यान में सात अलग अलग उपकरण होंगे

  • गुरुत्वाकर्षण के बल से आगे बढ़ेगा यान

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः इसरो ने अपने अंतरिक्ष अभियान का दायरा बढ़ाने का

काम और तेज किया हैं। चंद्रयान 2 की अंतिम चरण में विफलता के

बाद भी शेष अभियान को सफल माना गया है। इसी आधार पर अब

अपनी पूर्व घोषणा के मुताबिक इसरो सूर्य अभियान भी प्रारंभ करने

जा रहा है। इस अभियान को आदित्य एल 1 का नाम दिया गया है।

जिसके बारे में अनुमान है कि यह अभियान अगले वर्ष के प्रारंभ होने

की उम्मीद है। इस अभियान के तहत इसरो भी सूर्य का नजदीक से

निरीक्षण करने की योजना पहले ही बना चुका है। मालूम हो कि नासा

ने पहले ही सूर्य के अभियान पर अपना पार्कर सोलर प्रोव भेज रखा है।

इसरो को सूर्य अभियान पर काम करने की प्रेरणा भी चंद्रयान 2 की

तकनीक से मिली है। दरअसल इस चंद्रयान के विक्रम लैंडर के उतरने

की घटना की विफलता के अलावा शेष सारा अभियान सही चला था।

इसके तहत इसरो के वैज्ञानिकों ने ईंधन बचाकर चांद तक पहुंचने की

अपनी विधि को भी सही साबित कर दिखाया है। इसी तकनीक के

आधार पर वे अपेक्षाकृत कम खर्च पर अब सूर्य अभियान पर जाना

चाहते हैं।

उल्लेखनीय है कि इसरो इसके साथ ही चंद्र अभियान को भी फिर से

प्रारंभ करने की तैयारियां प्रारंभ कर चुका है। इस नये चंद्र अभियान के

लिए सारे उपकरणों को एक साथ रखने की योजना बनायी गयी है और

लैंडर को मूल अंतरिक्ष यान की डिजाइन में ही जोड़ दिया गया है।

इसरो ने यान के सात अंगों को अलग अलग काम

इस आदित्य एल 1 अभियान के बारे में बताया गया है कि यह चार सौ

किलोग्राम का एक सैटेलाइट होगा। इसे भी भारत के अपने

पीएसएलवी के माध्यम से अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। वैज्ञानिकों के

मुताबिक सूर्य की गतिविधियों पर निगरानी के लिए उसमें सात अलग

उपकरण होंगे। इन उपकरणों का अलग अलग काम होगा। जिसके

माध्यम से वैज्ञानिक सूर्य के केंद्र, वहां के विकिरण, सूर्य की आंधी और

आग की लपटों के बारे में आंकड़े एकत्रित करेंगे। खास तौर पर सूर्य के

केंद्र यानी कोरोना से निकलने वाली लपटों को और बेहतर तरीके से

समझने के लिए अलग से इंतजाम इसमें किये गये हैं।

इसरो के इस सूर्य अभियान के लिए अलग अलग विभागों के बीच

जिम्मेदारियों का बंटवारा कर दिया गया है। इसके साथ ही अंतरिक्ष

अनुसंधान पर काम करने वाले कई अन्य संस्थानों को भी इस

अभियान से जोड़ा गया है। देश के कई प्रमुख वैज्ञानिक प्रतिष्ठान इस

अभियान में अलग अलग जिम्मेदारी संभालेंगे। इनके जिम्मे वहां से

मिलने वाले आंकड़ों के आधार पर उनका विश्लेषण कर वैज्ञानिक

नतीजे पर पहुंचने का होगा। चंद्रयान 2 के अभियान की तकनीक को

ही इसमें और सुधारा गया है। ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्योंकि

चांद और सूर्य की दूरी में काफी अंतर है। पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी मात्र

3.84 लाख किलोमीटर हैं जबकि सूर्य हमारी पृथ्वी से 14 करोड़ 90

लाख किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। नासा का पार्कर सोलर प्रोव भी

इसके काफी करीब तक पहुंचने में चक्कर काटते हुए आगे बढ़ रहा है।

इसरो का यान भी इसी तरीके से सूर्य के करीब पहुंचेगा लेकिन इसरो

की अपनी तकनीक की वजह से इस यात्रा को तय करने में ईंधन की

खपत कम होगी।

सूर्य की जानकारी से सौरमंडल का भी ज्ञान बढ़ेगा

भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिक भी सूर्य के बारे में अधिक जानकारी

हासिल करना चाहते हैं क्योंकि इसके बारे में नये तथ्यों का पता चलने

के बाद पूरे सौरमंडल की संरचना और विकास को समझना अपेक्षाकृत

आसान हो जाएगा। इस अंतरिक्ष यान को सूर्य तक भेजने के लिए भी

खास तकनीक आजमाने की योजना है। इसके तहत सूर्य की तरफ

आगे बढ़ने के क्रम में यह कभी भी सूर्य को अपनी नजरों से ओझल

नहीं होने देगा। यहां तक कि सूर्य ग्रहण जैसी स्थिति में भी यह अपने

खास तैयारी की वजह से उसे नियमित देखता रहेगा। इसरो की यह

यात्रा भी पांच चरणों में होगी। ठीक इसी तरह चंद्रयान 2 को भी चांद के

करीब तक भेजा गया था। इस तकनीक में यान मौजूद गुरुत्वाकर्षण

बल के आधार पर ही सफर तय करता जाता है। इसी वजह से ईधन की

खपत तुलनात्मक तरीके से कम हो जाती है।

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