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तकनीकी गलती सुधारकर आगे बढ़े इसरो




तकनीकी कुछ तो खामी रही होगी, जिसकी वजह से मात्र दो किलोमीटर के करीब

से हमारे चंद्रयान का इसरो के नियंत्रण कक्ष से सम्पर्क टूट गया।

इसे लेकर दो बातों को समझ लेना ज्यादा समझदारी है।

पहला तो इस किस्म के अनुसंधान में विफलताओं के माध्यम से ही सफलता का रास्ता निकलता है।

दूसरा कि जिन वैज्ञानिकों ने इसे तकनीक को विकसित करने में अपना जीवन खपा दिया है

उनकी विशेषज्ञता पर दूसरे बहस करेंए यह मुर्खता की पराकाष्ठा है।

जितना कुछ इसरो ने बताया है उसमें हर बार यह बात शामिल रही है कि

वे वहां से मिले आंकड़ों का अध्ययन और विश्लेषण कर रहे हैं।

इसलिए इस जटिल तकनीकी प्रक्रिया को पूरा करने की जिम्मेदारी उनपर ही छोड़ दी जाए

तो यह समझदारी होगी।

वरना आज के दौर में सोशल मीडिया यूनिवर्सिटी में एक से एक विद्वान भरे पड़े हैं।

अनेक ऐसे विद्वानों को अशुद्ध लिखने तक की छूट है।

ऐसे वेशर्म लोगों को अपनी भाषा और व्याकरणगत अशुद्धियों के बारे में पता तक नहीं होता

लेकिन वे हर ऐसे मुद्दों पर अपनी नाक अवश्य घुसेड़ते रहते हैं। चंद्रमा का अभियान प्रारंभ से ही आसान लक्ष्य नहीं था।

दरअसल प्रचलित मार्ग से अलग हटकर चांद के दूसरे छोर पर उतरने का फैसला कोई आसान काम नहीं था।

इसके बाद पृथ्वी से यान को सही तरीके से रवाना करने के बाद उसे चांद के ऊपर

दो किलोमीटर तक ले जाना उससे भी बड़ा कठिन काम रहा।

इस लिहाज से हम मान सकते हैं कि चांद तक की दूरी में सिर्फ अब दो किलोमीटर भर का ही फासला बचा है।

क्यों इस अंतिम चरण में गड़बड़ी हुईए यदि उसका पता चल गया और उस

तकनीकी गड़बड़ी को सुधार लिया गया तो हमारा अगला चंद्र अभियान सफल होगा।

लेकिन इसके बारे में सार्वजनिक तौर पर विशेषज्ञता जाहिर करने के पहले सभी को यह भी जान लेना चाहिए

कि चंद्र अभियान के प्रयासो में अब तक का वैश्विक सफलता का आंकड़ा 40 प्रतिशत ही रहा है।

इसलिए प्रयोग के माध्यम से खामियों को समझने और उन्हें दूर करन की जिम्मेदारी जिन कंधों पर हैं

उनपर हमें विश्वास करना चाहिए। हां सार्वजनिक तौर पर हम यह अवश्य विचार कर सकते हैं कि

अगर यान दो किलोमीटर की ऊंचाई से अचानक अपने रास्ते से भटक गया तो उसके कौन कौन से कारण रहे होंगे।

जो इस बारे में सामान्य जानकारी रखे बिना भी विशेषज्ञ जैसी टिप्पणियां दे रहे हैंए उन्हें समझ लेना चाहिए कि

इसरो ने इस चंद्रयान 2 का अभियान प्रारंभ होने के पहले ही सारी बातों की जानकारी विस्तार से दे दी थी।

यह बताया गया था कि इस चंद्रयान की पूरी संरचना कैसी हैए उसके कौन कौन से हिस्से किस काम के लिए लगाये गये हैं।

इन हिस्सों को कैसा तैयार किया गया है। इस बात की सराहना होनी चाहिए कि विक्रम लैंडर से हमारा संपर्क टूट जाने के बाद भी

सबसे कम ईंधन की मदद से चांद तक पहुंचने का नया कीर्तिमान तो हमारे वैज्ञानिकों ने स्थापित कर दिया है।

पृथ्वी और चंद्रमा के बीच पांच बार कक्षा बदलते हुए ईंधन बचाने की यह तकनीक भावी अंतरिक्ष अभियानों में भी काम आयेगी।

जाहिर है कि इस तकनीक को अब दुनिया के दूसरे देश में आजमायेंगे

क्योंकि अंतरिक्ष अभियान का एक बड़ा आर्थिक और तकनीकी मसला इस ईंधन के ले जाने का बोझ भी होता है।

इसी परेशानी को दूर करने के लिए पूरी दुनिया में इस बात पर शोध हो रहा है कि

कैसे कम ईंधन खर्च कर अथवा बिना पारंपरिक ईंधन खर्च किये इस किस्म के अभियान को जारी रखा जाए।

जिस ऊंचाई पर से चंद्रयान 2 का लैंडर यानी विक्रम वैज्ञानिकों की नजर से बाहर चला गयाए वह उसके पहले से ही अपने नियंत्रण पर था।

इस बात को भी वैज्ञानिकों ने स्पष्ट कर दिया था कि अंतिम पंद्रह मिनट तक

इस लैंडर पर नियंत्रण कक्ष का कोई नियंत्रण नहीं होगा।

यान अपने निर्धारित मार्ग पर आगे बढ़ता हुआ नजर आया है।

इसलिए अब वैज्ञानिक इस बात की जांच करेंगे कि उस यान का कौन सा हिस्सा इस यान का संपर्क टूटने का कारण बना।

इतना तो तय है कि उस ऊंचाई से गिरने के बाद भी यह उपकरण चंद्रमा की सतह पर ही गिरा है।

इसके आराम से उतरने की प्रक्रिया में कौन कौन सी गड़बड़ी हो सकती हैए इसे वैज्ञानिक हम लोगों से बेहतर समझ सकते हैं।

वह उपलब्ध आंकड़ों के विश्लेषण से इस बात का पता लगा ही लेंगे कि अगले अभियान के दौरान

किन बातों पर सावधानी रखने की जरूरत है।

हमें वैज्ञानिकों पर भरोसा रखना चाहिए कि उन्होंने स्वदेश में विकसित तकनीक के आधार पर

इतना कुछ कर दिखाया है। शाबास इसरो और शाबास इसरो के वैज्ञानिकों।

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