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इजरायल के वैज्ञानिकों का पर्यावरण सुधार में बड़ा कदम







  • कार्बन डॉइऑक्साइड खाने वाला बैक्टेरिया तैयार हुआ 
  • जेनेटिक सुधार से मिली है वैज्ञानिक सफलता
  • इसके प्रयोग से जैव इंधन भी बन सकता है
  • व्यवहार में लाने से पहले और परीक्षण जरूरी
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः इजरायल के वैज्ञानिकों ने पर्यावरण की समस्या को दूर करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल कर ली है।

इनलोगों ने एक ऐसा बैक्टेरिया तैयार किया है, जो सिर्फ भोजन के तौर पर कार्बन डॉइऑक्साइड ग्रहण करता है।

प्रयोगशाला में इसके प्रारंभिक परीक्षण सफल रहे हैं। मजेदार स्थिति यह है कि इस श्रेणी के बैक्टेरिया के विकास का मूल ही कार्बन है।

यह बैक्टेरिया हवा से कार्बन डॉइऑक्साइड सोखकर अपना आकार बढ़ाता जाता है।

अब वह इसी आधार पर अपनी वंशवृद्धि कैसे कर पाता है, इस पर शोध चल रहा है।

इजरायल के वेइजमैन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस में शोधकर्ताओं ने यह काम कर दिखाया है।

मध्य इजरायल में स्थित इस प्रयोगशाला में यह विधि तैयार हुई है।

इसके बार में जो सूचनाएं एक वैज्ञानिक पत्रिका में दी गयी हैं, उसके मुताबिक ई-कोली बैक्टेरिया में जेनेटिक संशोधन कर इसे तैयार किया गया है।

ई-कोली बैक्टेरिया के बारे में हम पहले से ही इस बात को जानते हैं कि यह बैक्टेरिया दरअसल शक्कर को अपने भोजन के तौर पर ग्रहण करता है।

इस ई-कोली बैक्टेरिया का आचरण यह है कि वह शक्कर खाने के बाद कार्बन डॉइऑक्साइड को छोड़ता है।

इसी तकनीक पर उसके जीवन की गाड़ी आगे बढ़ती जाती है।

ज्ञानिकों ने उसकी संरचना का गहन अध्ययन करने के बाद अपना शोध कार्य प्रारंभ किया था।

इसमें जेनेटिक संशोधन करने के लिए इस ई-कोली बैक्टेरिया में एक और

बैक्टेरिया डाला गया था। दरअसल इसके जरिए वैज्ञानिक उसके भोजन की

पद्धति को उलट देना चाहते थे।

इस नये बैक्टेरिया की भोजन पद्धति को सुधारा गया

इस नये बैक्टेरिया जीन को भी इसके लिए सुधारना पड़ा था।

इसके आधार पर ही धीरे धीरे ई-कोली बैक्टेरिया की संरचना को बदला गया ताकि वह उल्टा भोजन पद्धति अपना ले।

प्रारंभिक चरण में इस बैक्टेरिया को शक्कर उपलब्ध कराये जाते थे।

लेकिन क्रमवार तरीके से उसकी मात्रा कम की जाती रही।

जेनेटिक सुधार की वजह से जैसे जैसे शक्कर की मात्रा कम की गयी, अपने भोजन के लिए वह कार्बन डॉइऑक्साइड ग्रहण करने की मात्रा को बढ़ाता चला गया।

शोध के अगले चरण में यह पाया गया कि इस जेनेटिक संशोधित बैक्टेरिया की अगली पीढ़ी का शक्कर के प्रति कोई आकर्षण नहीं था।

वे कार्बन डॉइऑक्साइड और फॉरमेट को ही भोजन के तौर पर ग्रहण करने लगे थे।

इस बदलाव की प्रक्रिया में करीब छह महीने लगे।

उसके बाद जेनेटिक सुधार के तौर पर तैयार बैक्टेरिया पूरी तरह कार्बन

डॉइऑक्साइड को ही भोजन बनाकर अपना जीवन आगे बढ़ाने में सफल हो

गया।

अब इस शोध की जानकारी रखने वाले वैज्ञानिकों का मानना है कि इस

बैक्टेरिया के हर तरीके से कारगर साबित होने के बाद पृथ्वी के प्रदूषण की एक

बहुत बड़ी समस्या का समाधान हो सकता है।

दूसरी तरफ कुछ वैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि इस नई प्रजाति के कार्बन

डॉइऑक्साइड खाने वाले बैक्टेरिया के पूरी तरह अस्तित्व में आने के बाद

इसका इस्तेमाल बॉयो फ्यूएल में भी किया जा सकता है।

जाहिर है कि इनके इस्तेमाल से तैयार इंधन में कार्बन डॉइऑक्साइड की मात्रा या तो शून्य होगी अथवा न्यूनतम रह जाएगी।

इजरायल के वैज्ञानिकों की खोज दुनिया बदल सकती है

इस शोध के बारे में मैक्स प्लैंक इंस्टिटयूट के वैज्ञानिक टोबियल इर्ब कहते हैं कि यह एक हार्ट ट्रांसप्लाट करने जैसा ही है।

जिस तरीके से पेड़ पौधे सूर्य की रोशनी से अपने फोटो सिंथेसिस के माध्यम से ऑक्सीजन तैयार करते हैं, ठीक उसी तरह यह बैक्टेरिया कार्बन डॉइऑक्साइड के माध्यम से जैव इंधन तैयार करने में मददगार साबित हो सकता है।

दूसरी तरफ इस शोध से जुड़ी संस्था के वैज्ञानिक रॉन मिलो कहते हैं कि उनलोगों ने करीब एक दशक तक इस पर काम किया है।

वर्ष 2016 में इस दिशा में प्रारंभिक सफलता नजर आयी थी।

तब एक अस्थायी बैक्टेरिया तैयार किया गया था, जो कार्बन डॉइऑक्साइड को सोख सकता था।

इस बार जेनेटिक इंजीनियरिंग का सहारा लेते हुए मिलो और उसकी टीम ने ई-कोली बैक्टेरिया से यह नई प्रजाति तैयार करने में सफलता पायी है।

इसमें एंजाइम की दो जोड़िया हैं, जो कार्बन डॉइऑक्साइड को आर्गेनिक कार्बन में बदल सकती है।

इस उपलब्धि के बारे में मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के बॉयो इंजीनियर

चेरिल केरफिल्ड कहते हैं कि प्रदूषण की रोकथाम की दिशा में यह शोध

मील का पत्थर साबित होने वाला है।

वर्तमान में इसे व्यवहार में लाने के पहले कई परीक्षणों से गुजरना है।

सलिए अगर यह अनुसंधान कागज पर तथा प्रयोगशाला में सफल भी रहा है तभी भी पूरी दुनिया में इसके इस्तेमाल में अभी और वक्त और अनुसंधान की जरूरत है।



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