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क्या सरकार के भीतर भी किसान आंदोलन पर मतभेद है ?




क्या सरकार के अंदर को किस्म की विचारधाराएं एक साथ काम कर रही हैं, यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किसानों को दिये गये संदेश के बाद के घटनाक्रम उनकी बातों से कतई मेल नहीं खाते हैं। प्रधानमंत्री ने मन की बात में कहा था कि वह आंदोलनरत किसानो से मात्र एक फोन कॉल की दूरी पर हैं। इसके बाद धरना दे रहे किसानों के बहाने पूरे इलाके में जिस तरीके से घेराबंदी की गयी, वह बात चीत करने वाला तेवर तो नहीं हैं। सीमेंट के बैरिकेड, लोहे का सरिया और किसी को आगे बढ़ने से रोकने के अन्य उपायों के जरिए केंद्र सरकार का यह वर्ग स्थानीय लोगों को किसानों के खिलाफ भड़काने की इस कोशिश में भी नाकामयाब हो चुका है। इस किस्म की घेराबंदी से स्थानीय नागरिकों को होने वाले परेशानी की वजह भी लोग केंद्र सरकार को ही मान रहे हैं। इससे तय है कि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से नीचे गिरता जा रहा है। वैसे इस बात का उल्लेख भी प्रासंगिक है कि किसान आंदोलन से नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ नीचे आने के बाद भी विरोधी दलों में से किसी का भी नेता इस घटती हुई लोकप्रियता के करीब भी नहीं पहुंच पाया है। झूठ की फैक्ट्री की बदौलत इससे पूर्व के कई आंदोलनों को ध्वस्त करने का श्रेय केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को दिया जाता रहा है। लेकिन इस बार अगर बाजी उल्टी पड़ी तो क्या होगा, इसे समझा जा सकता है। हो सकता है कि पार्टी के अंदर भी जो कुछ उथल पुथल का दौर चल रहा है, उसमें नरेंद्र मोदी को भले ही कुछ ना हो लेकिन अमित शाह के राजनीतिक भविष्य पर खतरा मंडराने लगा है। 26 जनवरी की घटना के तुरंत बाद कुछ सरकार भक्त चैनलों ने बार बार यह झूठ फैलान की कोशिश की कि किसानों ने तिरंगे का अपमान किया और खालिस्तानी झंडा फहरा दिया। दिल्ली पुलिस के सब्र की तारीफ करने वाले यह नहीं बता रहे हैं कि पुलिस की लाठी से कितने लोगों को चोटें आयी हैं। पंजाब के एक सौ से अधिक लोग अब तक गायब क्यों हैं, उनमें से कितनों को गिरफ्तार किया गया है। सोचा था कि फिर से जेएनयू, दिल्ली दंगा और अन्य घटनाओं की तरह झूठ परोसकर जनता को गुमराह करने में कामयाबी मिल जाएगी। लेकिन इस बार तो सोशल मीडिया के चंद खबरों ने ही सारे ऐसे टीवी चैनलों के मात दे दिया है। अब किसानों के धरनास्थलों के घेरकर जिस तरीके से लोहे का सरिया और कांटेदार तार लगाये गये हैं, उससे स्पष्ट है कि दिल्ली पुलिस को यह निर्देश अमित शाह की तरफ से ही आया है। पुलिस के लोग इस किस्म के आचरण के लिए कोई जिम्मेदारी अपने ऊपर नहीं लेते हैं और किसके आदेश पर ऐसा किया गया है, उस सवाल पर चुप्पी साध लेते हैं। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने सही कहा है कि जहां पर भरोसे का पुल बनाया जाना चाहिए था वहां पर किसानों की राह के साथ साथ आम जनता की राह में कांटे बिछाये जा रहे हैं। इससे दोनों पक्षों के बीच अविश्वास और बढ़ेगा, यह तय है। किसानों को सरकार ने जितना भोला और नासमझ समझा था, वह सोच पूरी तरह गलत प्रमाणित हो चुकी है। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि आखिर सरकार के भीतर ही दो किस्म के फैसले क्यों लिये जा रहे हैं। किसान आंदोलन से संबंधित मामला अब सरकार के भीतर नरेंद्र मोदी और अमित शाह तक सिमट गया है। किसानों से वार्ता करने वाले मंत्रियों की कोई हैसियत नहीं हैं, यह भी स्पष्ट हो चुका है। पार्टी में अमित शाह के बड़े कद के नेता फिलहाल चुप्पी साधे हुए हैं। इनमें किसानों के सीधे तौर पर जुड़े नेता राजनाथ सिंह भी हैं। राजनाथ सिंह को इसलिए भी सीधे सीधे दरकिनार नहीं किया जा सकता क्योंकि लालकृष्ण आडवाणी के विरोध के बाद भी उन्होंने ही नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री के लिए आगे किया था। अब अमित शाह के इस सीन में आने के पहले से ही इस बात का पता लोगों को था कि श्री शाह की कार्यशैली कैसी है। यह पहला मौका है जब किसानों के आंदोलन के विकराल स्वरुप की वजह से सरकार के भीतर भी नये सिरे से बहस चल पड़ी है। भले ही औपचारिक तौर पर कोई बयान नहीं आ रहा हो लेकिन सरकार के भीतर जनता की नब्ज की समझ रखने वाले यह अच्छी तरह समझ रहे हैं कि उनके लिए अगला चुनाव जीतना कठिन होता जा रहा है।



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