नक्सलवाद पर राज्य सरकार का दावा क्या झूठ है

नक्सलवाद पर राज्य सरकार का दावा क्या झूठ है

नक्सलवाद के बारे में खुद मुख्यमंत्री और राज्य पुलिस के मुखिया कई बार दावा कर चुके हैं।



दोनों का दावा है कि राज्य में नक्सलवाद लगभग समाप्त हो गया है।

इन दावों के बीच दो अलग अलग घटनाओं की सूचना इस बार की बंदी के दौरान दर्ज की गयी है।

पहली घटना गिरिडीह के रेल ट्रैक उड़ाने की है जबकि दूसरी में नक्सलियों ने लोहरदगा क्षेत्र में ट्रकों को जला दिया है।

एसपी अमरजीत बलिहार की हत्या में शामिल नक्सलियों को सजा दिये जाने के विरोध में

नक्सलियों ने इस दो दिवसीय बंदी का आह्वान किया था।

इन दो घटनाओं से अलग राज्य पुलिस द्वारा फिर से नक्सलियों पर ईनाम जारी होने की सूची को अद्यतन किया गया है।

इन परस्परविरोधी तथ्यों की वजह से फिर से यह सवाल उठ खड़ा होता है कि

क्या वाकई दिग्दर्शन का मामला भ्रष्टाचार का था और बकोरिया कांड में वाकई निर्दोष लोग ही मारे गये थे।

अजीब स्थिति यह है कि हर बार पुलिस किसी ईनामी नक्सली को या तो गिरफ्तार करती है

अथवा वह हथियार डालता है तो उसके पास से शायद ही अत्याधुनिक हथियार बरामद होते हैं।

यह सिलसिला कुंदन पाहन के आत्मसमर्पण के वक्त भी देखा गया था।

आज तक कुंदन पाहन के हथियारबंद दस्ते के अन्य नक्सलियों का क्या हुआ,

उनके हथियार कहां गये या फिर लेवी के तौर पर उनके द्वारा वसूले गये करोड़ों रुपये कहां गये,

इस बारे में पुलिस की तरफ से कोई अतिरिक्त जानकारी कभी नहीं दी गयी।

इससे सवाल यह खड़ा होता है कि क्या वाकई नक्सली उन्मूलन पर कोई काम हो रहा था

अथवा इस मद में खर्च दिखाकर पैसों की बंदरबांट हो रही है।

नक्सलवाद पर कुछ काम हो रहा है या सिर्फ पैसों की बंदरबांट हो रही है

यह पहले से ही स्पष्ट हो चुका है कि वर्तमान दौर में पुलिस के सीक्रेट सर्विस फंड का राजनीतिक दुरुपयोग हो रहा है।

चूंकि यह सुरक्षा से जुड़ा हुआ मुद्दा होता है इसलिए इसे नजरअंदाज किया जाता है।

लेकिन जब राज्य में नये सिरे से नक्सली घटनाएं होती हैं तो यह सवाल भी जायज है कि

आखिर इस करोड़ों की रकम का दरअसल हो क्या रहा है।

इतनी अधिक रकम खर्च होने के बाद भी अपराध और नक्सलवाद नियंत्रण के मुख्य काम में अपेक्षित सफलता क्यों नहीं मिल पा रही है।

संदेह इसलिए भी बढ़ता है क्योंकि बकोरिया और दिग्दर्शन दोनों ही मामलों मे

पुलिस के खिलाफ जांच की सुस्ती नये सवाल खड़े कर रही है।

अब तो यह बाद स्पष्ट हो चुकी है कि बड़े अधिकारियों के खिलाफ जांच को इसलिए लटकाया जाता है

ताकि वे आराम से सेवानिवृत्त होने के बाद सारा लाभ ले सकें।

लेकिन सवाल जनता के पैसों के दुरुपयोग का है।

हर बार में जनता को जब सब्र रखने की सलाह दी जाती है तो जनता के पैसे के खर्च की भी पारदर्शिता जरूरी है।

अभी अगर राज्य में इतनी अधिक संख्या में ईनामी नक्सली मौजूद हैं

तो दिग्दर्शन के माध्यम से जिन्हें इस आत्मसमर्पण नीति का लाभ दिया गया, वे लोग कौन थे।

क्या यह आरोप सही है कि उस पूरे मामले में दरअसल फर्जी लोगों को खड़ा कर सरकारी रकम की बंदरबांट की गयी है।

जांच की गाड़ी जहां की तहां रूकी होने की वजह से यह संदेह और पुख्ता होता है कि

इसकी चपेट में उच्चाधिकारी ही आने वाले हैं, जिन्हें सत्ता का संरक्षण प्राप्त है।

बकोरिया और दिग्दर्शन मामले की जांच कब पूरी होगी

दूसरी तरफ बकोरिया कांड में अनेक गैर सरकारी संगठनों का आरोप है कि इस पूरे प्रकरण में पुलिस का सारा दावा ही गलत है।

कई संगठनों द्वारा मामले की अलग अलग जांच कर अलग अलग जांच रिपोर्ट भी दी गयी है।

इन सभी का निष्कर्ष यही है कि वहां निर्दोष मारे गये थे।

इसलिए अब जब राज्य में नक्सलवाद समाप्त होने का दावा किया जाता है

तो नक्सली घटनाओं के घटित होने से नये सिरे से वे सारे सवाल फिर से जीवित हो जाते हैं, जो इससे प्रत्यक्ष तौर पर जुड़े हुए हैं।

कुछ महीनों पहले बूढ़ा पहाड़ पर नक्सली अभियान चलने की घोषणा हुई थी।

उसके बारे में तरह तरह के दावे किये गये थे।

मधुवन और पारसनाथ से नक्सलियों को खदेड़ दिये जाने की घोषणा हुई थी।

लेकिन वास्तविकता और बाद के घटनाक्रम इन दावों की पोल खोल रहे हैं।

सरकार नहीं तो समाजसेवी संगठनों को ही अपने स्तर पर इन तमाम तथ्यों को एकसाथ जांच लेना चाहिए।

क्योंकि स्पष्ट और सिद्ध तथ्य यही है कि झूठ की बुनियाद पर खड़ी इमारत कभी स्थायी नहीं होती।

इस इमारत के धराशायी होने का खतरा सबसे अधिक उनलोगों को होता है,

जो इसकी दीवार के साये में खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं।



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