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दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था क्या वाकई बेहतर है

दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक बात साबित है कि इसके प्रचार में इस बार के

विधानसभा चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी ने जिन

दो मुद्दों को लेकर अपना चुनाव प्रचार के अभियान को आगे बढ़ाया था, उनमें स्वास्थ्य

व्यवस्था में बेहतर उनकी पूर्व घोषणाओं में शामिल था। दूसरा मुद्दा शिक्षा का था तो इस

पर अब बहस करने की जरूरत नहीं है कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों की स्थिति का

आकलन कर अगर दूसरे राज्य भी उसी रास्ते पर चले तो शिक्षा के कारोबार पर निजी

कब्जा अगले दस वर्षों में पूरे देश से समाप्त किया जा सकता है। लेकिन यह भी कड़वा

सच है कि इस निजी शिक्षा व्यवस्था पर अधिकांशतः नेताओं का ही प्रत्यक्ष या परोक्ष

कब्जा है। अनेक राज्यो में तो निजी संस्थान नेताओं के नाम पर ही खुले हुए हैं। लेकिन

मूल विषय पर लौटते हुए इस बात पर विचार करते हैं कि दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था में

कोरोन की चुनौती को भी एक महत्वपूर्ण मापदंड के तौर पर देखा जाना चाहिए। अभी की

सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि अब दिल्ली में कोरोना के मरीजों की संख्या अस्पतालों

में घट रही है। जिस बात को लेकर संशय की स्थिति थी उसे भी दिल्ली ने दूर कर दिखाया

है। दरअसल यह माना नहीं जा रहा था कि कोरोना के मरीज अपने अपने घर पर सावधानी

से रहते हुए भी ठीक हो सकते हैं। लेकिन दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था में ऐसा हुआ है।

दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था आप पार्टी का वादा भी था

दिल्ली को लेकर अनेक किस्म की आशंकाएं इसलिए भी थी कि स्थानीय संक्रमण के

पचास प्रतिशत से अधिक मामलों में यह पता ही नहीं चल पाया था कि यह संक्रमण लोगों

को किस जरिए हुआ है। इस वजह से ऐसा माना जा रहा था कि दिल्ली में कोरोना मरीजों

की संख्या अभी और तेजी से ऊपर जाने वाली है। खुद उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने

कहा था कि यहां जुलाई महीने के अंत तक साढ़े पांच लाख कोरोना के मरीज पाये जा

सकते हैं। जाहिर तौर पर इससे दिल्ली में एक आतंक का माहौल तो बन ही गया था। इस

आतंक के माहौल के बनने के पीछे भी राजनीति थी। अनेक अवसरों पर यह लगातार

महसूस होता रहा है कि भाजपा को दिल्ली की दूसरी हार भी अब तक पच नहीं रही है। उप

राज्यपाल के कंधे पर बंदूक रखकर भाजपा जो कुछ कर रही है, वह दिल्ली तो क्या पूरा

देश समझ रहा है। दूसरी तरफ भाजपा शासित नगर निकायों में क्या कुछ घपला घोटाला

है, उसके भी सबूत लगातार बाहर आ रहे हैं। लेकिन राजनीतिक विद्वेष की वजह से

दिल्ली को लेकर जो कुछ प्रचारित किया गया और केंद्र सरकार के स्तर पर दिल्ली की

स्वास्थ्य व्यवस्था में जो अड़ंगे लगाये गये, वह शुद्ध तौर पर घटिया राजनीति थी। इसके

बाद भी अगर अब अस्पतालों में कोरोना के मरीज कम हुए हैं तो इस मॉडल को ही देश में

कम उन राज्यों में तुरंत आजमाया जाना चाहिए, जहां अब भी संक्रमण तेजी से फैल रहा

है।

जांच के आंकड़े भी वहां के औसत से काफी बेहतर हैं

वहां के आंकड़ों की बात करें तो अब वहां सक्रिय मरीजों की संख्या अब घटकर 13,681

रह गयी है। वरना पिछले दो सप्ताह में हर रोज यहां दो हजार से अधिक मरीज पाये जाने

से अस्पतालों में मरीजों के लिए जगह कम पड़ गयी थी। दिल्ली सरकार द्वारा वैकल्पिक

अस्पतालों का प्रबंध समय पर कर लिये जाने की वजह से उतनी परेशानी नहीं हुई। लेकिन

अब तो कोरोना का ईलाज करने वाले अस्पतालों में कोरोना मरीजों के लिए तैयार किये

गये बेड खाली नजर आने लगे हैं। आंकड़े भी इस स्थिति में सुधार होने का संकेत देते हैं। 1

जुलाई को वहां के 15,892 बेड भरे हुए थे। अब वहां मात्र 3210 लोग ही अस्पताल में

दाखिल हैं। दिल्ली में खास बात यह रही कि अनेक मरीजों ने घर पर नियम से रहते हुए भी

कोरोना से खुद को मुक्त करने में कामयाबी हासिल कर ली है। देश में कोरोना टेस्ट का

औसत आंकड़ा काफी पीछे होने के बाद भी दिल्ली में हर दिन बीस हजार जांच कर प्रति

दस लाख में 47828 जांच का रिकार्ड कायम कर अनेक विकसित देशों को इस मामले में

पीछे छोड़ दिया है। लेकिन कुछ चिकित्सा विशेषज्ञ अब भी इस जांच की विधि और उसकी

रिपोर्ट की शुद्धता पर संदेह कर रहे हैं। इसलिए राजनीति अपने जगह पर रहे अभी देश के

इस गंभीर संकट को देखते हुए दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था के इंतजामों को अन्य इलाकों

में भी तेजी से लागू किया जाना चाहिए। स्थिति नियंत्रण से बाहर जाने के पहले ही ऐसा

कर लिया जाना एक समझदारी भरा फैसला होगा।


 

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