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गैर जिम्मेदाराना आचरण से फिर अपना ही नुकसान




गैर जिम्मेदाराना आचरण इसलिए कि कोरोना संक्रमण को झेलते और समझते हुए इतने दिन बीत जाने के बाद भी हम अपनी आदतों में बदलाव नहीं कर पाये हैं। भीड़ के इलाको में बिना काम के जाना और मास्क पहनने को अपना तौहीन समझना ही इसकी सबसे बड़ी निशानी है।




कई बार यह सोचने पर विवश होना पड़ता है कि क्या हमारी मानसिकता ही गुलामी वाली बनी हुई है। ऐसी मानसिकता की चर्चा इसलिए कि जब तक हमें डंडे का भय नहीं होता हम सब कुछ जानते हुए भी गैर जिम्मेदाराना आचरण करने लगते हैं। ऐसा आचरण सिर्फ कोरोना का नहीं है, आम जनजीवन में अक्सर ही ऐसा होता हुआ नजर आ ही जाता है।

अब यह समझने वाली बात है कि फिर से कोरोना संक्रमण बढ़ने की वजह से देश का जो आर्थिक नुकसान फिर से हो रहा है, वह आखिर किसका नुकसान है। देश की जो अर्थव्यवस्था धीरे धीरे पटरी पर लौट रही थी, वह फिर से ठहर सी गयी है।

एम्स के निदेशक डॉ रणदीप गुलेरिया ने लोगों को भरोसा देने के साथ साथ यह बात कही थी कि अगर देश की एक प्रतिशत आबादी को भी अस्पताल में दाखिल कराना पड़ा तो यह भारत जैसे देश के लिए नई समस्या होगी। इतनी अधिक संख्या के मरीजों के लिए अतिरिक्त स्वास्थ्य सुविधाएं फिर से तैयार करना कोई खेल नहीं है।

इसके लिए जो पैसा खर्च होगा उसके लिए हमारा अपना गैर जिम्मेदाराना आचरण ही जिम्मेदार है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल यह कहते हैं कि लोग अगर मास्क पहनेंगे तो लॉकडाउन लगाने जैसा कड़ा फैसला नही लेना पड़ेगा।

गैर जिम्मेदाराना आचरण की वजह से केजरीवाल ने चेतावनी दी

आप सरकार बाहर से ऑक्सीजन प्लांट और टैंकर आयात करेगीः केजरीवालयानी वह भी मान रहे हैं कि बार बार समझाने के बाद भी लोगों का गैर जिम्मेदाराना आचरण करना अब तक बंद नहीं हुआ है। स्पष्ट है कि देश में कोविड-19 संक्रमण इसी तरह बढ़ते रहे तो स्वास्थ्य सुविधाओं पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि अब तक अच्छी बात यह रही है कि जिन क्षेत्रों में संक्रमण के मामले अधिक दिख रहे हैं वहां संक्रमित लोगों के अस्पताल में भर्ती होने की दर 1.2 से 2.0 प्रतिशत रही है।




देश में रविवार को पिछले 24 घंटों के दौरान कोविड-19 संक्रमण के 1.60 लाख से अधिक मामले आए। दुनिया के अन्य देशों में ओमीक्रोन के असर के लिहाज से बात करें तो दक्षिण अफ्रीका में अस्पतालों में मरीजों के भर्ती होने की दर करीब 3 प्रतिशत रही थी। भारत में डॉक्टरों को लगता है कि यहां यह दर 1.5 से 2 प्रतिशत के बीच रह सकती है।

फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट में पिछले वर्ष इस वायरस की दूसरी लहर के दौरान दिल्ली मे जब 1,500 मामले आए थे तो उनके अस्पताल में 80 लोग भर्ती हुए थे। इस बार दिल्ली में 15,000 से मामले अधिक होने पर भी अस्पताल में केवल 12 मरीज हैं। मुंबई के नगर निकाय ने भी इसी ओर इशारा दिया है।

इस बारे में एक अधिकारी ने कहा, दूसरी लहर के दौरान जब मुंबई में 91,108 सक्रिय मामले थे तो उस समय ऑक्सीजन की सुविधा वाले बिस्तर 85 प्रतिशत तक भर गए थे और आईसीयू बेड भी कम पड़ने लगे थे। इस बार हालत उतनी खराब नहीं है। फिलहाल ऑक्सीजन की सुविधा वाले केवल 27 प्रतिशत बेड भरे हैं और आईसीयू बिस्तर 30 प्रतिशत तक भरे हैं।

मरीजों की संख्या और बढ़ी तो बड़ी परेशानी होगी

यह स्थिति तब है जब सक्रिय मामले 91,000 से अधिक हो चुके हैं। भारत में अब रोजाना डेढ़ लाख से अधिक मामले आ रहे हैं। ऐसी आशंका है कि संक्रमण के मामले बढ़कर प्रति दिन कम से कम 5 लाख तक हो सकते हैं। इसका मतलब हुआ कि रोजाना 10,000 लोगों को अस्पतालों में भर्ती कराने की जरूरत होगी।

यह एक बड़ी संख्या है और इससे निपटने के लिए हमारे पास पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। हैदराबाद में डाक्टर कहते हैं कि अगर पड़ोसी जिलों से मरीज आने शुरू हो जाएंगे तो शहर के अस्पतालों पर दबाव बढ़ सकता है। वैसे तो प्रत्येक शहर संक्रमण के तेजी से बढ़ते मामलों से निपटने के लिए प्रयास कर रहे हैं मगर शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं में असंतुलन थोड़ा अधिक हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर और पश्चिम भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं पर दबाव अंसतुलित और अलग-अलग रह सकता है। इसलिए हमें यह समझना चाहिए कि हमारा अपना गैर जिम्मेदाराना आचरण हमें ही फिर से आर्थिक नुकसान के दौर में पहुंचा रहा है। बात सिर्फ इतनी सी है कि मास्क पहनने और भीड़ वाले इलाकों में बेवजह नहीं जाने की शर्त का पालन हम नहीं कर पा रहे हैं।



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