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अदृश्य वस्तुओं को भी देख पायेगा यह वैज्ञानिक आंख

  • अंतरिक्ष का यह रहस्य अब तक अनसुलझा है
  • वैज्ञानिकों को ऐसे पदार्थों के होने का अनुमान है
  • फोटोन की गतिविधियों को दर्ज कर लेता है कैमरा
  • अंधेरा या डार्क मैटर की खोज में काम आयेगा कैमरा
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः अदृश्य वस्तुओं को देख पाना अब तक संभव नहीं हो पाया है। इसी वजह से

पृथ्वी के बाहर भी जीवन है अथवा नहीं, इसकी वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हो पायी है। कुछ इसी

तरह अंतरिक्ष में मौजूद डार्क मैटर यानी घने काले पदार्थ की भी पहचान नहीं हो पायी है।

लेकिन ऐसा कुछ है, इसके संकेत वैज्ञानिकों को लगातार मिलते रहे हैं।

अब वैज्ञानिकों ने वह उन्नत किस्म का कैमरा तैयार किया है, जो इसमें मददगार साबित

हो सकता है। इस कैमरे की मदद से वैज्ञानिक अदृश्य उन वस्तुओं की गतिविधियों को

समझ सकते हैं जो हमारी खुली आंखों से हमेशा ही ओझल रहते हैं। दरअसल खगोल

वैज्ञानिक पृथ्वी के बाहर की जीवन की संभावनाओं का पता लगाने का भरसक प्रयास कर

रहे हैं। अब उन्हें इस नई तकनीक से मदद मिलने की उम्मीद है।

नेशनल इंस्टिटियूट फॉर स्टैंडर्डेस एंड टेक्नोलॉजी (एन आइ एस टी) के वैज्ञानिकों ने इस

यंत्र को तैयार किया है। इसकी मदद से अब अन्य ग्रहों में भी होने वाली अदृश्य

गतिविधियों के बारे में वैज्ञानिक संकेत मिल सकते हैं। दरअसल यह पहले से ही

वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित है कि इंसान की आंखों बहुत कुछ नहीं देख पाती हैं। इस

किस्म के उच्च शक्ति संपन्न कैमरे से नजर नहीं आने वाले अथवा घने अंधेरे में होने

वाली गतिविधियों को पकड़ा जा सकेगा।

इस कैमरे के बारे में बताया गया है कि इसमें एक हजार से अधिक सेंसर लगे हुए हैं। इन

सेंसरों की मदद से किसी भी किस्म के फोटोन की गतिविधि को दर्ज किया जा सकेगा।

कई बार फोटोन की गतिविधियों को इंसान की आंख पकड़ भी नहीं पाती है। लेकिन इस

कैमरे के सामने घटित होने वाली किसी भी ऐसी घटना की सूचना यह सारे सेंसर मिलकर

देंगे।

अदृश्य वस्तुओं की गतिविधियों को पकड़ लेंगे इसके सेंसर

इनकी नजर से इन गतिविधियों का बचना मुश्किल होगा। प्रकाश किरण की एक भी

गतिविधि को दर्ज करने वाला यह कैमरा इसी वजह से अंतरिक्ष के खोज में बहुत काम

आने वाला है, ऐसी उम्मीद की जा रही है।

खगोल वैज्ञानिक मानते हैं कि अंतरिक्ष में वह डार्क मैटर भी मौजूद है, जो इंसानी आंखों

से ओझल है। लेकिन उसके होने की पुष्टि कई अवसरों पर हो चुकी है। हाल के दिनों तक

वैज्ञानिक ब्लैक होल को भी समझ पाने में असफल थे। अब रेडियो तरंगों के विचलन की

मदद से इसके होने और आकार प्रकार के बारे में कुछ जानकारी मिल पायी है। फिलहाल

इस तकनीक के विकसित होने के साथ साथ सौर मंडल में अनेक ब्लैक होल और उनकी

गतिविधियों के बारे में हर रोज नई नई जानकारी मिल रही है।

वैज्ञानिक पत्रिका ऑप्टिक्स एक्सप्रेस में इस कैमरे के बारे में जानकारी दी गयी है।

जिसमें यह बताया गया है कि किस तरीके से यह काम करता है। वैज्ञानिकों ने बताया है

कि इसमें नैनो वायर की मदद से लगे सेंसर ही फोटोन की हर छोटी बड़ी गतिविधि को

पकड़ लेते हैं। इसका वैज्ञानिक प्रयोग किया गया है, जिसमें यह सफल रहा है।

घने अंधेरे में भी जब फोटोन की सक्रियता होती है तो उसे यह कैमरा पकड़ लेता है।

इसी वजह से ऐसी उम्मीद की जा रही है कि अंतरिक्ष में कहीं अगर जीवन है तो उसके बारे

में भी यह सूचनाएं उपलब्ध करा सकेगा। साथ ही अंतरिक्ष में मौजूद डार्क मैटर के बारे में

नई जानकारी उपलब्ध करायेगा।

डार्क मैटर होने के बाद भी उसकी जानकारी नहीं मिली है

इसे तैयार करने से जुड़े वैज्ञानिकों के मुताबिक दरअसल हर छोटे बड़े फोटोन की

गतिविधि को पकड़ने में यह यंत्र सक्षम है। इसी वजह से जिस अंधेरे में इंसान की आंखों

कुछ देख नहीं पाती, वहां भी यह कैमरा पूरी तरह काम करता है। कैमरे के आकार के बारे

में बताया गया है कि यह बहुत ही छोटा है। यह हर तरफ मात्र 1.6 मिलीमीटर चौड़ा है।

इसके अंदर ही 1024 सेंसर लगाये गये हैं। सारे सेंकर 32 गुणा 32 की कतार में हैं। इस

संरचना की वजह से ही फोटोन की कोई गतिविधि इसकी नजर से नहीं बच पाती है।

इसे तैयार करते वक्त वैज्ञानिकों के सामने बड़ी चुनौती यह आयी थी कि इतने सारे सेंसरों

को एक साथ काम करने की स्थिति में इस उपकरण को गर्म होने से कैसे बचाया जा

सकता है।

इसे विकसित करने वाली संस्था एन आइ एस टी के वैज्ञानिक वरुण वर्मा ने बताया कि इस

चुनौती से बचने के लिए नासा की खगोल दूरबीन की तकनीकों का सहारा लिया गया।

पहले आठ आठ की कतार में तैयार किये गये 64 सेंसरों वाले कैमरे को ही इसी तरह 32-

32 की कतार में लाया गया। इसे तैयार करने में वैसे पदार्थों का इस्तेमाल किया गया तो

आम तौर पर गर्म नहीं होते हैं।

इसके सेंसर हल्की सी गतिविधि भी पकड़ लेते हैं

इस कैमरे का मुख्य उपयोग सेंसरों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर किस ग्रह अथवा

अंतरिक्ष के किसी भी पिंड में कौन सा धातु है, इसकी पहचान करना है। यह कैमरा अपने

आंकड़ों को कंप्यूटर विश्लेषण के लिए भेजकर यह सुनिश्चित करेगा कि कैमरे के सेंसरों

के सामने आने वाले दृश्य में कौन से धातु अथवा खनिज मौजूद हैं। इससे अंतरिक्ष की

संरचना के बारे में नई नई जानकारी मिल पायेगी।

इस कैमरे की वैज्ञानिक जांच कैलिफोर्निया इंस्टिटियूट ऑफ टेक्नोलाजी, पासाडेना के

जेट प्रापल्सन प्रयोगशालामें की गयी है। जिसमें यह पाया गया है कि यह कैमरा अंधेरे में

होने वाली गतिविधियों के संकेतों को भी पकड़ सकता है। इसलिए माना जा रहा है कि

किसी विशाल आकार के चीज के मौजूद होने के बाद उसके फोटोन की गतिविधियों के

आधार पर उसकी मौजूदगी का पता भी लगाया जा सकेगा। इससे वह वस्तु अथवा

आकार अदृश्य नहीं रह पायेगा।

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