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इंटरनेट की जासूसी और सरकारी संरक्षण लोकतंत्र के लिए खतरा

इंटरनेट की जासूसी ने इसे तैयार करने की अवधारणा को ही गलत साबित करना प्रारंभ

कर दिया है। यह अब सूचना देने का काम कम कर रहा है जबकि ग्राहक की सूचनाएं 

एकत्रित करने का काम ज्यादा कर रहा है। हम जिसका सबसे अधिक इस्तेमाल करते हैं,

वह गूगल भी अपने उपयोगकर्ता के आंकड़ों को नियमित तौर पर एकत्रित करता रहता है।

लेकिन इस किस्म के सूचना संग्रह करने वाले ग्राहको को पहले से बताकर ही इसकी

जानकारी दे देते हैं। लेकिन असली परेशानी वैसी घटनाओं को लेकर है, जिनमें ग्राहक या

इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले को यह पता ही नहीं होता कि इंटरनेट की जासूसी के

दायरे में उसके निजी आंकड़े भी चुराये जा रहे हैं। इस पूरी प्रक्रिया को सरकारी संरक्षण देने

के मामले ही असली स्थिति बिगड़ी है। इसका उल्लेख इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि

अमेरिकी अदालत ने इस्रायल की कंपनी एनएसओ के जासूसी साफ्टवेयर पिगासूस के

खिलाफ व्हाट्सएप को मामले चलाने की अनुमति देने को लेकर है। दरअसल व्हाट्सएप

ने यह शिकायत की थी उसके सोशल मीडिया साफ्टवेयर का नाजायज लाभ उठाते हुए

पिगासूस ने अनेक लोगों की मोबाइलों में अनधिकृत पैठ बनायी। इस साफ्टवेयर की

खासियत यह है कि यह मोबाइल के इस्तेमाल करने वालों की हर गतिविधि की जानकारी

चुपके से एकत्रित करती जाती है। यहां तक कि वह व्यक्ति किस स्थान पर है और किसे

क्या संदेश भेज रहा है, इसके भी आंकड़े एकत्रित होते रहते हैं।

इंटरनेट की जासूसी अनेक कानूनों में दंडनीय

यह स्पष्ट तौर पर लोगों की निजता का हनन है और साइबर प्रावधानों के तहत गलत है।

लेकिन पिगासूस को बनाने वाली कंपनी का तर्क है कि उसने आतंकवादी गतिविधियों और

आपराधिक गतिविधियों को रोकने के लिए ही इसे तैयार किया है। साथ ही इस साफ्टवेयर

को किसी निजी व्यक्ति अथवा संस्था को बेचा ही नहीं गया है। इस दलील का सीधा अर्थ है

कि इस साफ्टवेयर का इस्तेमाल सिर्फ सरकारी एजेंसियों ने किया है। इससे यह बात

प्रमाणित होती है कि लोगों की जिंदगी में झांकने में सरकारी एजेंसियां भी पीछे नहीं है।

लेकिन वे इस काम को कानूनी तौर पर नहीं करती बल्कि सत्ता के हितों की रक्षा के लिए

इसका लगातार गलत इस्तेमाल करती हैं। झारखंड की बात करें तो पूर्व कैबिनेट मंत्री और

वर्तमान में जमशेदपुर पूर्वी के विधायक सरयू राय ने इस बारे में रघुवर दास की सरकार में

कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन कर अनधिकृत कार्यालय स्थापित कर टेलीफोन टैप करने

का मामला भी उठाया था। ऐसे मामलों में सरकारी एजेंसियों के लिए जिम्मेदार लोगों की

पहचान तो हो चुकी है लेकिन अब तक यह राज पर्दे के पीछे है कि आखिर विभाग के लोगों

ने ऐसा गलत काम किसके आदेश और इशारे पर किया था।

झारखंड में भी उछला था टेलीफोन टैपिंग का मामला

स्पष्ट है कि इस किस्म की तकनीक का असली मकसद में कम और अपने राजनीतिक

विरोधियों को सबक सीखाने में ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है। यह कमसे कम भारत जैसे

लोकतांत्रिक देश के संवैधानिक ढांचा के लिए बहुत बड़ा खतरा बनता जा रहा है। दरअसल

इस किस्म की गैरकानूनी जासूसी को निगरानी और जांच के दायरे से मुक्त रखने का

निर्णय भी मनमानी करने की छूट देता है। कुछ यही हाल अपराध की रोकथाम के लिए

ब्रिटिश काल मे स्थापित सीक्रेट सर्विस फंड के दुरुपयोग का भी है। चूंकि इसकी जानकारी

सार्वजनिक नहीं होती इसलिए दरअसल यह पैसा असली काम में खर्च हुआ भी या नहीं,

उसका पता भी नहीं चल पाता है। जिस तरीके से धीरे धीरे सूचना तकनीक का दुनिया में

दबदबा बढ़ रहा है, उससे साफ होता जा रहा है कि इसमें अभी कुछ नये और कठोर कानून

लागू करने की आवश्यकता है। वरना इंटरनेट की जासूसी की छूट देकर हम अपने अंदर ही

राजनीतिक रक्तबीज पैदा होने के अवसर प्रदान कर रहे हैं।

यहां कुछ भी गोपनीय नहीं, यह हर विशेषज्ञ जानता है

इंटरनेट में वैसे भी कुछ भी गोपनीय नहीं होता, यह हर विशेषज्ञ जानता है। इसका

इस्तेमाल करने वाले भी अगर ध्यान दें तो उन्हें पता होता है कि उनकी कौन की जानकारी

कब और कैसे एकत्रित की जा रही है। लेकिन बिना जानकारी के गैर कानूनी तरीके से

सूचना एकत्रित किये जाने की छूट देना लोगों के निजी जीवन में ताक-झांक करने के

अलावा भी दूसरे खतरे पैदा कर रहा है। इस स्थिति को बदलने की पहल किसी न किसी

स्तर पर होनी ही चाहिए। सरकारी एजेंसियों को जिस मकसद से यह अधिकार दिये गये

थे, उनका पालन नहीं हो रहा है। उल्टे इन अधिकारों का नाजायज इस्तेमाल देश की

लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही कमजोर करने में लगा है। इस किस्म की गैर कानूनी जासूसी

को रोकने के साथ साथ कानून सम्मत जासूसी के लिए भी अब जिम्मेदारी तय करने का

वक्त आ गया है। कोई कहीं भी और कभी भी किसी की जासूसी करे तो यह यह जिम्मेदारी

भी तय होनी चाहिए कि इस जासूसी का औचित्य का है और उसके गलत इस्तेमाल का

आदेश देने वाले अधिकारी को क्या दंड दिया जाना चाहिए।


 

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