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इंटरनेट सेवा के लिए सैटेलाइट के इस्तेमाल की व्यापारिक लड़ाई तेज

  • जापान की कंपनी राकुटेन की घोषणा

  • चीन की कंपनी का चालक रहित गाड़ी का दावा

  • छोटी कंपनियों ने आते ही नींद उड़ा दी पुरानों की

  • भारत के मोबाइल बाजार का चेहरा भी बदल जाएगा

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः इंटरनेट सेवा को सैटेलाइट के माध्यम से देने की योजना पुरानी है। इस पर

काफी कुछ काम पहले से ही होता आ रहा है। लेकिन अब इस मैदान में छोटी कंपनियों ने

आते ही सारी पुरानी कंपनियों की नींद उड़ा दी है। सामान्य तौर पर स्थापित एवं बड़ी

कंपनियों को किसी छोटी कंपनी से कोई खतरा नहीं होता है। लेकिन जहां तक इंटरनेट

सेवा की बात है तो बाजार पर किसी छोटी कंपनी का कब्जा बढ़ना ही बड़ी कंपनियों के

अस्तित्व पर खतरा पैदा कर देता है।

कुछ ऐसी ही चुनौती जापान की राकुटेन कंपनी ने पेश की है। इस कंपनी ने अचानक ही

दावा कर दिया है कि उसने टेक्सास की एक कंपनी एएसटी एंड साइंस में अपना अधिकार

हासिल कर लिया है। यह अमेरिकी कंपनी मोबाइल आधारित ब्रॉड बैंड सेवा उपलब्ध

कराती है। इस कंपनी का स्वामित्व हासिल करने के साथ ही जापान की कंपनी ने यह

स्पष्ट कर दिया कि वह इसके जरिए अब फोर जी सेवा देना प्रारंभ करेगी लेकिन उसका

असली मकसद 5 जी सेवा शीघ्र प्रारंभ करने का है। इसके लिए अब ग्राहकों को सैटेलाइट

के जरिए यह मोबाइल सेवा उपलब्ध करायी जाएगी। इसी घोषणा ने दुनिया की तमाम

बड़ी कंपनियों की नींद उड़ा दी है। स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में इससे मोबाइल परिसेवा

के बाजार का परिदृश्य तेजी से बदल जाएगा। इसका असर भारतीय मोबाइल सेवा

प्रदाताओं पर भी पड़ना तय है।

राकुटेन कंपनी के चेयरमैन हिरोशी मिकितानी ने इस बारे में साफ कर दिया है कि वह

जापान के मोबाइल बाजार पर अपना आधिपत्य बढ़ाने के साथ साथ वैश्विक स्तर पर भी

प्रतिस्पर्धा में उतरना चाहते हैं। इसी वजह से ऐसा माना जा रहा है कि इस तैयारी की वजह

से अब एमेजन को भी जापान से नई चुनौती मिलने जा रही है।

इंटरनेट सेवा के साथ ही चालक रहित वाहन का कारोबार

इसी घोषणा के साथ साथ कोरोना वायरस से प्रभावित चीन की एक कंपनी गीलि

होल्डिंग्स ने भी सैटेलाइट के कारोबार में उतरने की घोषणा की है। दरअसल यह कंपनी

गाड़ियों के निर्माण से जुड़ी हुई है और वह बोल्वो जैसी कंपनियों के स्वामित्व को नियंत्रित

करती है। लेकिन गाड़ियों के कारोबार से बाहर निकलकर यह कंपनी अब सैटेलाइट

आधारित तकनीकी सेवा के क्षेत्र में आ रही है। कंपनी का असली मकसद इसके जरिए

चालक रहित वाहनों का विकास और उनकी सेवा को और बेहतर बनाना है। जाहिर है कि

इससे पूरी दुनिया का ऑटोमोबाइल क्षेत्र भी बदल जाएगा। चालक रहित वाहन बनाने की

पहल कई अन्य देशों में हुई है। अनेक देशों में सीमित क्षेत्रों के लिए उनका नियमित

इस्तेमाल भी किया जा रहा है। चीन की इस कंपनी का दावा है कि वह निचली सतह पर

पृथ्वी का चक्कर काटने वाली सैटेलाइटों से यह काम करने जा रहे हैं. इसके लिए 36 हजार

किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित सैटेलाइट अगले दो वर्षों में तैयार हो जाएंगे। उन्हें

अंतरिक्ष में स्थापित करने को मिलाकर करीब 200 मिलियन डॉलर प्रति सैटेलाइट का

खर्च आयेगा। लेकिन इससे सैटेलाइट आधारित सेवा की चेहरा ही बदल जाएगा। जाहिर है

कि इन दो कंपनियों की संरचना पहले से स्थापित कंपनियों के मुकाबले छोटी है। इस

लिहाज से उनका खर्च भी बड़ी कंपनियों के मुकाबले कम है। चंद लाख रुपये खर्च कर भी

अब पृथ्वी से एक सौ किलोमीटर की ऊंचाई पर सैटेलाइट स्थापित करने में डेढ़ घंटे से भी

कम का समय लगता है। ऐसे में तेज गति से कार्रवाई से दुनिया का बाजार बदल

जाएगा,यह तय है। बदलाव के इस दौर में छोटी कंपनियों की कम लागत का मुकाबला बड़ी

कंपनियों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बनकर सामने आ रही है।

बड़ी कंपनियों को सुधार के लिए समय और पैसे की जरूरत

विशेषज्ञ मानते हैं कि अकेले भारतीय मोबाइल बाजार के तेजी से विकसित होने की वजह

से दुनिया की तमाम कंपनियों की नजर अब भारत पर है। वे भारत की वजह से एशिया को

सबसे तेजी से विकसित होने वाला मोबाइल पर आधारित बाजार मान रहे हैं। लिहाजा

तमाम कंपनियों को मोबाइल आधारित हर प्रकार की परिसेवा देने के लिए एशिया के

बाजार पर खुद को उपलब्ध कराना जरूरी होता चला जा रहा है। जैसे जैसे तकनीक

विकसित हो रही है भारत में भी मोबाइल उपभोक्ता स्पीड की जरूरत को समझने लगे हैं।

ऐसे में भारतीय मोबाइल आधारित उद्योग भी आने वाले दिनों में अचानक से बदल

सकता है। वर्तमान में इस बाजार में जिओ का एकाधिकार सा होने के बाद भी जब यह सेवा

सैटेलाइट आधारित हो जाएगी तो भारतीय ग्राहकों को नये माध्यमों से भी मोबाइल सेवा

लेने का अवसर प्राप्त हो जाएगा। इसलिए 5 जी सेवा के चालू होने के दौरान ही भारत में

भी पहले की सोच से अलग बहुत कुछ बदल सकता है। इस बाजार में दरों की प्रतिस्पर्धा में

कौन कहां टिक पायेगा, यह तो अन्य कंपनियों की सैटेलाइट आधारित सेवा प्रारंभ होने के

बाद ही पता चल पायेगा


 

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